ब्लॉग छत्तीसगढ़

11 June, 2016

छत्तीसगढ़ में लोक संगीत के नागरी प्रस्तुति का बीजारोपण

प्रतिवर्ष की भांति 1948 में राजनांदगांव में गुजराती समाज के द्वारा दुर्गोत्सव मनाया जा रहा था। उस समय बीड़ी के व्यापारी मीरानी सेठ के घर के सामने दुर्गा रखा हुआ था। दुर्गा पंडाल में इस वर्ष भी शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम रखा गया था जिसमें रायपुर के प्रसिद्द संगीतकार अरुण सेन आमंत्रित थे। कार्यक्रम के बीच में सुगम और फ़िल्मी संगीत भी रखा गया था ताकि दर्शक शास्त्रीय संगीत से बोर न हों। इसमें खुमानसाव को फिल्मी संगीत की प्रस्तुति के लिए बुलाया गया था। इस कार्यक्रम में खुमान साव ने कुछ फिल्मी गीत प्रस्तुत किए जिसमें 'घर आया मेरा परदेसी' जैसे गाने प्रस्तुत किए गए। कार्यक्रम सुनने वालों ने खुमान संगीत को बहुत पसंद किया। उसी दिन खुमान साव ने यह निश्चय किया कि महानगरों की भांति राजनांदगांव में भी एक आर्केस्ट्रा पार्टी का निर्माण किया जाए। इस कार्यक्रम से ही छत्तीसगढ़ में आर्केस्ट्रा पार्टी की परिकल्पना ने पहली बार पंख पसारा।

इसी वर्ष दुर्गा पक्ष के बाद ही खुमान साव ने खुमान एण्ड पार्टी के नाम से आर्केस्ट्रा पार्टी का गठन किया। उस समय महिलाएं आर्केस्ट्रा में नहीं गाती थीं। जो पुरुष गायक पार्टी में थे उनमे सुंदर सिंह ठाकुर जो बाद में ट्राइबल के सीओ हुए वे सहगल के गीत गाते थे। जयराम शुक्ल जो किशोरीलाल शुक्ला के भतीजे थे और बाद में तहसीलदार हुए वे और संतोष शुक्ला अन्य फिल्मी गीत गाते थे।

खुमान साव के आर्केस्ट्रा पार्टी ने तब धूम मचा दिया था। पूरे छत्तीसगढ़ में 'खुमान एण्ड पार्टी' की मांग आने लगी थी। उनकी पार्टी में धीरे-धीरे लोग जुड़ते गए और 1948 से 50 तक खुमान आर्केस्टा का पूरे छत्तीसगढ़ में काफी धूम रहा। जब संगीत कलाकार बढ़ते गए तब उन्होंने 1952 में 'शारदा संगीत समिति' की स्थापना की जिसमें भी वो संगीत देने लगे। कलाकारों के बढ़ने के बाद 1959 में उन्होंने 'सरस्वती संगीत समिति' का गठन किया और आर्केस्ट्रा पार्टी अनवरत चलती रही। 1954 में जब वे जनपद स्कूल राजनांदगांव में शिक्षक नियुक्त हो गए उसके बाद उन्होंने अंतिम आर्केस्ट्रा पार्टी का जो संचालन किया उसका नाम 'राज भारती संगीत समिति' था, जिसे बाद में उनके शिष्य नरेंद्र चौहान जी चलाने लगे। 1962 में प्रसिद्द लोकसंगीतकार गिरजा सिन्हा और भैयालाल हेडाऊ के साथ मिल कर भी उन्होंने एक संगीत समिति का गठन किया जिसमे फ़िल्मी गीतों के साथ ही छत्तीसगढ़ी गीत भी प्रस्तुत किये जाने लगे। इस प्रकार से छत्तीसगढ़ में लोक संगीत के नागरी प्रस्तुति का बीजारोपण हुआ।
(खुमान साव पर संजीव तिवारी द्वारा लिखे जा रहे कलम घसीटी के अंश)
फेसबुक पर यह प्रस्‍तुति-

25 May, 2016

भट्ट ब्राह्मण कैसे

यह आलेख प्रमोद ब्रम्‍हभट्ट जी नें इस ब्‍लॉग में प्रकाशित आलेख 'चारण भाटों की परम्परा और छत्तीसगढ़ के बसदेवा' की टिप्‍पणी के रूप में लिखा है। इस आलेख में वे विभिन्‍न भ्रांतियों को सप्रमाण एवं तथ्‍यात्‍मक रूप से दूर किया है। सुधी पाठकों के लिए प्रस्‍तुत है टिप्‍पणी के रूप में प्रमोद जी का यह आलेख -
लोगों ने फिल्म बाजीराव मस्तानी और जी टीवी का प्रसिद्ध धारावाहिक झांसी की रानी जरूर देखा होगा जो भट्ट ब्राह्मण राजवंश की कहानियों पर आधारित है। फिल्म में बाजीराव पेशवा गर्व से डायलाग मारता है कि मैं जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय हूं। उसी तरह झांसी की रानी में मणिकर्णिका ( रानी के बचपन का नाम) को काशी में गंगा घाट पर पंड़ितों से शास्त्रार्थ करते दिखाया गया है। देखने पर ऐसा नहीं लगता कि यह कैसा राजवंश है जो क्षत्रियों की तरह राज करता है तलवार चलता है और खुद को ब्राह्मण भी कहता है। अचानक यह बात भी मन में उठती होगी कि क्या राजा होना ही गौरव के लिए काफी नहीं था, जो यह राजवंश याचक ब्राह्मणों से सम्मान भी छीनना चाहता है।
पर ऊपर की आशंकाएं निराधार हैं वास्तव में यह राजवंश ब्राह्मणों का है और इस राजवंश की स्थापना भी दक्षिणा से हुई है। मराठा साम्राज्य के संस्थापक मराठा शासक शिवाजी भोसले के 1674 में छत्रपति की उपाधि ग्रहण करने के समय उनके क्षत्रिय होने पर विवाद हुआ था तब काशी के महान पंडित विश्वेक्ष्वर भट्ट (जिन्हें गागा भट्ट भी कहा जाता है) ने शास्त्रार्थ कर शिवाजी को क्षत्रिय प्रमाणित किया था और उनका राज्याभिषेक करवाया था। उस समय विश्व की सबसे बड़ी दक्षिणा पं.गागा भट्ट को दी गई थी। यह दक्षिणा ही अपने आप में एक छोटे राज्य के बराबर थी। दक्षिणा से स्थापित हुआ यह देश का पहला छोटा ब्राह्मण राज्य था। मराठा राज्य के आधीन रहते हुए इसी छोटे राजवंश ने अपने को विकसित किया। तत्कालीन समय में उत्तर भारत से भट्ट ब्राह्मणों का बड़ी संख्या में महाराष्ट्र माइग्रेशन हुआ। इसी राजवंशी ब्राह्मणों में सन 1700 से 1740 के बीच बाजी राव पेशवा मराठा सेनापति हुए जो अपनी बहादुरी के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। उन्होंने 41 लड़ाइयां लड़ीं जिसमें एक में भी वे पराजित नहीं हुए। इसी राजवंश ने आगे चलकर अपना विस्तार किया और उसकी एक शाखा में आगे चलकर बुंदेलखंड के राजा गंगाधर राव नेवालकर की पत्नी (1828-1858) झांसी की रानी लक्ष्मी बाई हुईं जिन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध सन 1857 की लड़ाई लड़़ी और वीरगति को प्राप्त हुईं। आज पूरा विश्व उन्हें नारी सशक्तिकरण का प्रतीक मानता है। उनकी विद्वता की मिसाल यह थी कि उन्होंने न केवल अंग्रेजों को सामान्य शास्त्रार्थ में परास्त किया था बल्कि खुद अंग्रेजों की अदालत में भी उनके शासन को चुनौती दी थी।
अब हम अपने मूल प्रश्न पर आते हैं कि आखिर भट्ट ब्राह्मण कैसे जिन पर कई लेखों में विपरीत टिप्पणियां अंकित हैं। संस्कृत-हिन्दी कोश (वामन शिवराम आप्टे) में भट्टों की उत्पत्ति के बारे में एक सूत्र दिया गया है-क्षत्रियाद्विप्रकन्यायां भट्टो जातो..नुवाचकः। इसकी व्याख्या में आगे पढ़ने पर पता चलता है कि विधवा ब्राह्मणी और क्षत्रिय पिता से उत्पन्न जाति भट्ट हुई। अगर इसे सत्य मान लिया जाए तो इस संयोग से उत्पन्न जाति ब्राह्मण नहीं बल्कि क्षत्रिय होगी। जबकि ऐसा कदापि नहीं है सभी भट्ट स्वयं को ब्राह्मण कहते हैं और तदानुसार आचरण भी करते हैं। वास्तव में भट्टों की उत्पत्ति के लेख से दुर्भावना पूर्वक छेड़छाड़ की गई है। ऊपर दिए गए सूत्र का क्रम परिवर्तित किया गया है जिसके कारण भ्रम की स्थिति निर्मित हुई है और जिससे उसके बाद की कड़ियां नहीं जुड़ती हैं। भट्ट ब्राह्मण वंश में पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होने वाली जानकारी में यह क्रम ब्राह्मण पिता और क्षत्रिय माता का है। इसके ऐतिहासिक प्रमाण भी हैं। वंशानुगत जानकारी के अऩुसार प्राचीन काल में युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में क्षत्रिय मारे जाते थे। उनकी युवा विधवाओं को ब्राह्मणों को उपपत्नी के रूप में दे दिया गया था। इस तरह इस जाति का प्रादुर्भाव युद्धों की त्रासदी से हुआ है। यह परंपरा किस सदी तक जारी रही इस बारे में जातीय इतिहास मौन है। जबकि उपरोक्त छेड़छाड़़ के बाद जो स्थितियां बन रहीं है इसका कोई प्रमाणिक ऐतिहासिक घटनाक्रम से कोई जुड़़ाव नहीं है। इतिहास में कभी भी ऐसी कोई घटना दर्ज नहीं है जिसमें युवा ब्राह्मणों की बड़ी संख्या में मृत्यु हुई हो और बड़ी संख्या में युवा ब्राह्मणियां विधवा हुई हों जिन्हें क्षत्रियों ने पत्नियों के रूप में स्वीकारा हो तथा नई जाति विकसित हुई हो। वैसे भी प्राचीन भारतीय समाज में प्रतिलोम विवाह वर्जित थे। इसके अलावा मान भी लें कि एकआध घटनाएं किसी कारणवश हुईं भी हों तो उससे कम से कम जाति विकसित नहीं हो सकती है।
शब्दकोश में भट्ट के अन्य अर्थों में 1 प्रभु ,स्वामी (राजओं को संबोधित करने के लिए सम्मान सूचक उपाधि)2 विद्वान ब्राह्मणों के नामों के साथ प्रयुक्त होने वाली उपाधि 3 कोई भी विद्वान पुरुष या दार्शनिक 4 एक प्रकार की मिश्र जाति जिनका व्यवसाय भाट या चारणों का व्यवसाय अर्थात राजाओं का स्तुति गान है। 5 भाट, बंदीजन।
उपरोक्त अर्थ में देखते हैं कि एक ही शब्द के अर्थ में चार जातियों को एक साथ लपेट दिया गया है भट्ट, भाट, चारण और बंदीजन। भट्ट स्वयं को कुलीन ब्राह्मण घोषित करते हैं वे सम्पन्न हैं उनमें डाक्टर, इंजीनियर,वैज्ञानिक से लेकर मंत्रियों तक के पद पर लोग सुशोभित हैं, दूसरी तरफ चारण जाति मुख्यतः राजस्थान में रहती है। ये चारण जाति स्वयं को क्षत्रिय कुल से संबंधित बताती है, इसके अलावा वे स्वयं को विद्वान बताते हैं तथा उनका अपना इतिहास है। बंदीजन नामक जाति वर्तमान में दिखाई नहीं पड़ती है और रहा सवाल भाट का तो वह पिछड़ी जाति में शामिल पाई जाती है तथा कहीं-कहीं इसके याचक वर्ग से होने के तो कहीं पर उनके द्वारा खाप रिकार्ड रखने की जानकारी मिलती है। यह जाति छोटे-मोटे व्यवसाय धंधे करती है। इसके अलावा इसके पास बड़ी जमीनें भी नहीं हैं। भाट स्वयं के ब्राह्मण होने का कोई दावा तक प्रस्तुत नहीं करते हैं। अब सवाल उठता है कि जब भट्ट का मतलब विद्वान ब्राह्मणों की उपाधि है तो फिर उस नाम की जाति निम्नतर कैसे हो गई। वास्तव में भट्टों को षड़यंत्रपूर्वक भाट में शामिल बता कर अपमानित करने का प्रयास किया जाता है ताकि उन्हें बदनाम कर उनके समाज में वास्तविक स्थान से पद्-दलित किया जा सके।
भट्टों की जातीय अस्मिता को कैसे तोड़ा मरोड़ा गया है इसका प्रमाण स्वयं शब्द कोश में ही मिलता है। शब्दकोश में भट्टिन शब्द के अर्थ देखें 1 (अनभिषिक्त) रानी, राजकुमारी,(नाटकों में दासियों द्वारा रानी को संबोधन करने में बहुधा प्रयुक्त)2 ऊंचे पद की महिला 3 ब्राह्मण की पत्नी।
उसी प्रकार शब्दकोश का एक और शब्द को लें ब्राह्मणी अर्थ है-1 ब्राह्मण जाति की स्त्री 2 ब्राह्मण की पत्नी 3 प्रतिभा (नीलकंठ के मतानुसार बुद्धि).3 एक प्रकार की छिपकली 4 एक प्रकार की भिरड़ 6 एक प्रकार की घास।
ऊपर के दोनों शब्दों से ज्ञात होता है कि भट्टिन ऐसी रानी है जो वर्तमान में राजकाज से बाहर है या राजकुमारी है और वो ब्राह्मण की पत्नी है। जबकि ब्राह्मणी का सीधा अर्थ ब्राह्मण की पत्नी से है। अब आप भट्टिन का कितना भी अर्थ निकालने की कोशिश करिए भट्टिन भट्ट की पत्नी नहीं है अगर वह भट्ट की पत्नी है तो पदच्युत रानी नहीं है न राजकुमारी है और न आपके भट्ट की उत्पत्ति सूत्र के अनुसार ब्राह्मण की पत्नी है। जबकि आप किसी भी ब्राह्मण की पत्नी को आज भी भट्टिन नाम से नहीं पुकार सकते हैं।
इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि भट्ट ब्राह्मणों के पारंपरिक वाचिक इतिहास में जो भट्टों की उत्पत्ति की बात कही जाती है वह सतप्रतिशत सत्य है और शब्दकोश में जो भट्टिन शब्द के अर्थ आए हैं वास्तव में वो प्राचीन काल के ब्राह्मण की दूसरी-पत्नी के संबंध में है। इस प्रकार राजवंशी भट्टिन से उत्पन्न जातक ही भट्ट कहलाए। चूंकि भट्टों का मातृपक्षा राजवंशी रहा है इसलिए यह जाति स्वयं के नाम के साथ राज सूचक शब्द राव लगाना अपनी शान समझती है। इस तरह कहा जा सकता है कि भट्ट अपनी उत्पत्ति से ही कुलीन, सम्पन्न व राजवंशी ब्राह्मण जाति है जिनका भाटों से दूर-दूर का संबंध नहीं है। केवल दो ब्राह्मण समुदायों के बीच चले सत्ता संघर्ष के कारण इस तरह का भ्रम फैलाया गया है।
आइए देखते हैं भट्टों के विरुद्ध वो ऐतिहासिक कारण क्या हैं जिनके कारण उन्हें अपमानित करने के लिए भ्रम फैलाया गया। वास्तव में प्राचीन काल में विधवा राजकन्याओं और ब्राह्मण पिता से उत्पन्न राजवंशी ब्राह्मण जाति ने बाद में पिता की वृत्ति में अपना उत्तराधिकार मांग लिया। तब समाजिक बंटवारे में उन्हें पुरोहिती कर्म से पृथक करते हुए वेदों का अध्ययन, ज्योतिष, धर्मशास्त्रों का प्रचार और केवल शिव तथा शिव-परिवार के मंदिरों में पुजारी बनने का अधिकार दिया गया। इसके वर्तमान उदाहरण में नेपाल के पशुपतिनाथ के प्रमुख पुजारी परिवार विजेन्द्र भट्ट तथा इंदौर के खजरानें गणेश मंदिर भट्ट पुजारियों का नाम लिए जा सकते है। महाराष्ट्रीय देशस्थ भट्ट ब्राह्मणों का गणेश उपासना के प्रति आकर्षण भी इसी ऐतिहासिक सामाजिक व्यवस्था का परिणाम है। इस परंपरा के अन्य अवशेष देखें तो उज्जैन महाकाल मंदिर में भी भट्ट ब्राह्मणों की पुरोहितों की भीड़ में तख्तियां भी देखीं जा सकती हैं। इसके अतिरिक्त इस बात की जानकारी पुरानी पीढ़ी से या फिर कई पुराने रिकार्ड से भी मिल सकती है।
भट्ट ब्राह्मणों का समाज में योगदान
राजवंशी भट्ट ब्राह्मणों ने वेदों के अध्ययन के अलावा आगे चलकर वेदों की मीमांसा (वैदिक वाक्यों में प्रतीयमान विरोध का परिहार करने के लिये ऋषि-महर्षियों द्वारा की गई छानबीन ) में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जिन प्रमुख आचार्यो ने टीकाओं या भाष्यों की रचना की उनमें हैं-
1. सूत्रकार जैमिनि, 2. भाष्यकार शबर स्वामी 3. कुमारिल भट्ट 4. प्रभाकर मिश्र 5. मंडन मिश्र,6. शालिकनाथ मिश्र 7. वाचस्पति मिश्र 8. सुचरित मिश्र 9. पार्थसारथि मिश्र, 10. भवदेव भट्ट,11 भवनाथ मिश्र, 12. नंदीश्वर, 13. माधवाचार्य, 14. भट्ट सोमेश्वर, 15. आप देव,16. अप्पय दीक्षित, 17. सोमनाथ 18. शंकर भट्ट, 19. गंगा भट्ट, 20. खंडदेव, 21. शंभु भट्ट और 22. वासुदेव दीक्षित शामिल हैं।
इस तरह हम देखते हैं कि 22 में से 6 भट्ट आचार्यों ने वेदों की मीमांसा की है।
भट्ट ब्राह्मणों के महापुरुषों की उपस्थिति ईसा पूर्व 5 वीं शताब्दी से मिलनी शुरू हो जाती है जिसमें सर्वप्रथम आते हैं- आर्यभट्ट( 476-550 सीई)-नक्षत्र वैज्ञानिक जिनके नाम से भारत का प्रथम उपग्रह छोड़ा गया। वाग्भट्ट(6वीं शताब्दी)-आयुर्वेद के प्रमुख स्तंभ दिनचर्या, ऋतुचर्या, भोजनचर्या, त्रिदोष आदि के सिद्धान्त उनके गढ़ हुए हैं। बाण भट्ट (606 ई. से 646 ई.)-संस्कृत महाकवि इनके द्वारा लिखित कादंबरी संस्कृत साहित्य की प्रथम गद्य रचना मानी जाती है। कुमारिल भट्ट( 700 ईसापूर्व )-सनातन धर्म की रक्षा के लिए जिन्होंने आत्मोत्सर्ग किया। भवभूति (8वीं शताब्दी)- संस्कृत के महान कवि एवं सर्वश्रेष्ठ नाटककार। आचार्य महिम भट्ट(11 वीं शताब्दि)-भरतमुनी के नाट्यशास्त्र के प्रमुख टीकाकार आचार्य। चंद बरदाई (1149 – 1200)-पृथ्वीराज चौहान के मित्र तथा राजकवि जिन्होंने चौहान के साथ आत्मोत्सर्ग किया। जगनिक (1165-1203ई.)-विश्व की अद्वतीय रचना आल्हा के रचयिता जिन्होंने ऐतिहासिक पात्रों को देवतातुल्य बना दिया। , भास्कराचार्य या भाष्कर द्वितीय (1114 – 1185)- जिन्होंने अंक गणित की रचना की। वल्लभाचार्य(1479-1531)- पुष्टिमार्ग के संस्थापक तथा अवतारी पुरुष। सूरदास( 14 वीं शताब्दी)- साहित्य के सूर्य, साहित्य में वात्सल्य रस जोड़ने का गौरव। राजा बीरबल(1528-1586)-असली नाम महेश दास भट्ट मुगल बादशाह अकबर के नौ रत्नों में प्रमुख। गागा भट्ट(16 वीं शताब्दी)- छत्रपति शिवाजी महराज के राजतिलक कर्ता। पद्माकर भट्ट(17 वीं शताब्दी)-रीति काल के ब्रजभाषा के महत्वपूर्ण कवि। तात्या टोपे (1814 - 1859)-1857 क्रांति के प्रमुख सेनानायक। बाल गंगाधर तिलक ( 1856-1920)-प्रमुख नेता, समाज सुधारक और स्वतन्त्रता सेनानी। पं. बालकृष्ण भट्ट(1885-1916)-भारतेंदु युगीन निबंधकारों में विशिष्ट स्थान। श्री राम शर्मा आचार्य( 1911-1990)- गायत्री शक्तिपीठ के संस्थापक। पं.राधेश्याम शर्मा ( दद्दा जी, 20 वीं शताब्दी)-पथरिया मध्यप्रदेश निवासी पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व. विद्याचरण शुक्ल के गुरु जिनके नाम से उनके फार्म हाउस का नाम है।

आज पूरे भारत में भट्ट ब्राह्मणों की उपस्थिति कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गुजरात से लेकर बंगाल तक है। ब्राह्मणों में भट्टों जाति सबसे बड़ी है। रही बात राजनैतिक स्थिति की तो कई राज्यों में भट्ट ब्राह्मणों को बिना मंत्रिमंडल में शामिल किए मंत्रिमंडल की कल्पना भी नहीं की जा सकती है उसमें उत्तराखंड, गुजरात, पं.बंगाल शामिल हैं जबकि महाराष्ट्र में स्थिति इसके ठीक उलट है वहां भट्ट ब्राह्मणों का मंत्रिमंडल में वर्चस्व होता है और बाकी की जातियां विरोध में ऩजर आती हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि भट्ट जन्म से ही कुलीन एवं सम्पन्न ब्राह्मण थे और हैं। हमे गर्व है कि हम भट्ट हैं जिनका इतना चमकदार इतिहास है।


-प्रमोद ब्रम्‍हभट्ट
रायपुर
प्रमोद ब्रम्‍हभट्ट जी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, वर्तमान में रायपुर के प्रतिष्ठित दैनिक अखबार 'जनता से रिश्‍ता' से जुड़े हैं।

इनसे आप फेसबुक पर यहॉं संपर्क कर सकते हैं। 

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