ब्लॉग छत्तीसगढ़

14 November, 2017

सलाम बंडू, कुकूर!!

बात सन 1983 के किसी जड़काले की है, मध्य प्रदेश माध्यमिक परीक्षा मंडल की अंतिम मैट्रिक परीक्षा की अंकसूची में छपे शब्दों में बसी खुशबू बरकार थी। भिलाई स्टील प्लांट में श्रमिकों की भर्ती के लिए जिला रोजगार कार्यालय दुर्ग द्वारा समय वरीयता के अनुसार समय-समय पर बुलावा पत्र गांवो के लड़कों को मिल रहे थे। इसके लिए न्यूनतम योग्यता मैट्रिक थी और रोजगार कार्यालय में जीवित पंजीयन आवश्यक था।
अंकसूची मिलने के बाद उसकी दस-बारह फ़ोटो कापी निकलवा कर कोनी बिलासपुर में फिटर आईआईटी और बेमेतरा में बी.काम. के लिए फार्म भरने और दोनों जगह प्रवेश मिल जाने के बाद ऊहापोह में मैं, बी.काम. में प्रवेश ले चुका था।
दीपावली की लम्बी छुट्टी के बाद गांव में ही लल्लू दाऊ ने दुर्ग जाकर रोजगार कार्यालय में पंजीयन करा लेने का प्लान बनाया। हम सरकारी रूप से बेरोजगार दर्ज होने के लिये सुबह घी में बोरकर अंगाकर पताल धनिया मिर्च धड़के और सायकल से दुर्ग के लिए निकल पड़े। हमारा गांव शिवनाथ नदी के किनारे पर बसा हुआ है।
हमारे गांव से लगभग दो किलोमीटर दक्षिण पूर्व में खारुन और शिवनाथ का संगम है। शिवनाथ यहां दक्षिण पश्चिम से बहती हुई आती है, जिसके तट पर किरितपुर नाम का गांव है। खेत के मेढ़ों से होकर जाने से किरितपुर भी हमारे गांव से लगभग दो किलोमीटर दूर है। धान के कट जाने के बाद खेतों के बीच मेढ़ काटकर बनाये गए गाड़ा रावन से सायकल उचकते हुए निकलती है। सुविधाजनक पहुँच मार्ग नही होने के बावजूद इन दोनों गांवो के बीच यही सुगम मार्ग है। इससे होते हुए हमने शिवनाथ पार में पहुचे। नदी में पानी घुटनें भर रही होगी, हमने सायकल रोककर लफ़र्रा बेलबॉटम को मोड़कर जांघ तक चढ़ाया। जैसे ही हमने सायकल के स्टैंड को हटाया, कूँ-कूँ की आवाज पर हमने पीछे देखा। हमारे गांव का बंडू कुकूर पूछ हिलाते खड़ा था।
हँसी के साथ हमने उसे गाली दिया- 'तैं कहाँ इँहा घुमरत हस साले।'
वह पूँछ हिलाते हुए सायकल के चक्के पर लोटने लगा।
लल्लू ने फिर गाली दिया- 'भाग भोसडी के, हमर पीछू कहाँ आबे।'
वह गुर्राने लगा। हम उसे नजरअंदाज कर पानी मे उतर गए, बेडौल बिच्छल पत्थरो और तेज बहाव में कभी सायकल तो कभी जाँघ तक चढ़े पैंट को बचाते हमने नदी पार कर लिया। पानी के बाद उस पार के ऊंचे करार तक रेत फैली हुई थी। रेत में सायकल को ठेलते हुए आगे ले जाना मेहनत का काम है, करार तक पहुँचते-पहुँचते अंगाकर रोटी पच गया। ऊँचे करार पर सायकल चढ़ाने के पहले हम शक्ति संचय के लिए वहां रुक गए। पीछे मुड़ कर देखा कितना सफर तय हुआ। बंडू कुकूर पानी-पत्थर-बूटा कूदता हुआ फिर हमारी ओर दौड़ता हुआ आ रहा है।
लल्लू ने फिर गाली देते हुए कहा- 'ये हमन ल पदोही तइसे लागथे दाऊ।'
अब उसने गोंटा उठाकर उसकी ओर उछाल दिया- 'भाग साले।'
गोंटा से बचते हुए वह कूँईं करता फिर हमारे पास। हमने उसे खूब गाली दिया, समझाया भी कि हम दुर्ग जा रहे हैं, डेढ़ सौ किलोमीटर दूर। उसने सुना, पर वह ठान के बैठा था, चलेगा हमारे साथ।
सरदा आ गया, कबीरपंथी चौका आरती की आवाज लाऊड स्पीकर में गूंजने लगी। बस्ती में हम जैसे ही घुसे भौ-भौं करते कुत्तों का दल हमारी ओर दौड़ने लगा। हमे ब्रेक लगाना पड़ा, बंडू कुकूर हम दोनों के सायकल के बीच पूछ दुबकाये बैठ गया। लल्लू ने फिर गाली दिया- 'मर भोसडी के, हमू मन ल मारबे।'
हमारे हात हूत से गांव के कुत्ते दूर में ही गुर्राते रुक गए पर भागे नहीं। सरदा से हमे डामर वाली सड़क मिल गई थी। उन दिनों ट्रफिक कम थी, हम दोनों के सायकल के बीच मे वह सुरक्षित आगे दौड़ने लगा। शाम तक हम कुसमी पहुँच गए, साथ मे बंडू भी था।
पूरे रास्ते मे घेरी-बेरी रुक-रुक कर बंडू कुकूर को वापस गांव खेदारते रहने के कारण हम देर से कुसमी पहुँचे। सामान्य अवस्था मे हम अब तक दुर्ग पहुँच गए होते। शाम को अनजान शहर में जाने के बजाय लल्लू दाऊ ने सुझाव दिया कि रात कुसमी में ही रुका जाय और दूसरे दिन सुबह से दुर्ग के लिए निकला जाय।
उन दिनों हमारे चाचा का बेटा राजू, कुसमी में अपने नाना के घर मे रह कर कर पढ़ाई कर रहा था। कुसमी में हमारा आना जाना लगा रहता था और हम वहां कुछ दिन बिलमते भी थे।
मैंने भी सोचा कि इसी बहाने इस बंडू कुकूर से पीछा छूटेगा। सुबह इसे चकमा देकर दुर्ग के लिए निकल लेंगें। वापसी में इसे लेते हुये गांव आ जाएंगे।
रात कुसमी में रुके, सुबह उठ कर तरिया में नहाने गए, बंडू भी गया। मैने लल्लू से कहा- 'येला कइसे चूतिया बनाबों दाऊ, ये साले हमर पीछा नई छोड़य।'
बंडू मुझे बोटबोट से निहार रहा था जैसे उसने मेरी बात सुनी ही नहीं।
कटकटात जाड़ में दु डुबकी मार के घर पहुँचे, घर मे थोड़ा बहुत बिलमें ताकि बंडू भुला जाए। जब वह सुनहरी घाम में घर से लगे कोठार में फैले धान के पैर में मस्तियाने लगा। हम सायकल उठाये और दुर्ग की ओर भागे।
बेरला के पहले किटप्लाई वाले परसरामपुरिया के फार्म के पास पहुँचे ही थे कि बंडू हँफरते, जीभ निकाले पहुँच गया।
'जौहर होंगे रे।'
लल्लू ने चिल्लाया।
अब वह साथ छोड़ेगा नही और उसे झेलना पड़ेगा। नए शहर में जाने की उत्सुकता, मोटर, गाड़ी, ट्रेन, सेक्टर, फैक्ट्री, मैत्री बाग, रंग-रंग के टुरी की बातें सब सटक गया था। दिल दिमाग मे बंडू कुकूर था, इसे कैसे बचाएंगे, कहाँ कैसे रखेंगे।
वह हमारी चिंता से बेखबर हमारे पीछे दौड़ता रहा, कभी कभी रोड के चढ़ाव में वह हमसे आगे बढ़ जाता और हमारे आते तक सड़क में पसर जाता, हमे देखता, यूँ कह रहा हो अड़बड़ धिरन्त हव जी तुमन।
रास्ता पूछते-पूछते अहिवारा, जामुल, भिलाई से दुर्ग पहुँचते तक हमने रोजगार पंजीयन के संबंध में दो-चार बार ही बातें की बाकी बंडू कुकूर दिल दिमाग मे छाया रहा।
स्टेडियम में सुबह सात बजे से लाइन लगी है हम यहां नौ बजे पहुँचे हैं, साढ़े दस बजे काउंटर खुलेगा जहाँ फार्म मिलेगा। उसे भरकर अंकसूची के फोटोकॉपी के साथ दूसरे काउंटर में जमा करना है। ढाई बजे दूसरा काउंटर खुलेगा। शाम पांच बजे कार्ड बनकर मिलने लगेगा। यदि सब काम फटा फट हुआ तो पहट बेरा तक हम लहुट जाएंगे। रात में सर-सर सर-सर सायकल चलाते दस-ग्यारा बजे तक गांव।
'शहर में सायकल को बने चेत करके रखना बेटा।'
निकलते वक्त मां ने कहा था। कहाँ रखें, यहाँ तो सायकलों की भीड़ है। स्टेडियम के गेट के सामने सायकलों के बीच मे हमने अपनी सायकलों को घुसाया, ताला लगाया, हैंडल में टंगे झोले को निकाल कर लाइन में लग गए। बंडू कुकूर को शायद पता था, हम देर से लौटेंगे और सायकल के बिना कहीं नही जाएंगे, सो वह वहीँ पसर गया। तुमन आवव जी मैं इही जघा अगोरत हँव।
हम लाइन पे लाईन लगते गए शाम साढ़े पांच बज गए, बाबू ने एलान किया कि बचें हुए लोगों का रोजगार कार्ड कल मिलेगा।
'हम अड़बड़ दुरिहा ले आये हवन सर, पिलीज हमर कारड ल दे दव!'
रुवांसी होकर मैन कहा था।
'क्या नाम है?'
'संजीव तिवारी'
'त्रिविध नारायण दुबे'
हमने संयुक्त रूप से कहा।
थोड़ी देर वह फाइलों-कागजों को तमडता रहा फिर कहा- 'नहीं, कल ही मिलेगा।'
सूरज ढल चुका था, पीले रौशनी वाले बल्ब जल गए थे। हमने एक दूसरे के ओथराये मुह को देखा और झोला कंधे में लटकाए भीड़ से बाहर निकलने का उदीम करने लगे। हमारे जैसे बहुत सारे लोग थे जिनको कार्ड मिल नहीं पाया था।
'अब कइसे करबो दाऊ'
लल्लू ने पूछा, मेरे पास कोई जवाब नहीं था। दो बच्चों ने कहा कि चलो रेलवे टेंसन वहीँ रात में रुकेंगे, यहां से पास में ही है।
हम सायकल के पास आए, वहां अंधेरे में ईक्का-दुक्का सायकलें ही बची थीं, बंडू हमारे पहुँचते ही कूँ-कूँ करते हुए मस्तियाने लगा। लल्लू ने एक भरपूर लात उसे मारी।
'भोसड़ा के तोरे कारन फदग गेन।'
कायँ-कायँ चिल्लाते हुए वह कातर निगाहों से हमे देखने लगा। उसके पूछ लगातार हिल रहे थे।
हम रेलवे स्टेशन के सायकल स्टैण्ड में घुसे ही थे कि शहरी मुस्टंड कुत्तों के झुंड नें बंडू को घेर लिया। हम सायकल से उतरे उन्हें भगाने की कोशिश भी किया, पर वे उसे नहीं छोड़े। उस ग्रुप के मजबूत कुत्ते ने सिर हिला हिला कर बंडू को काटा। एकाध मिनट के बाद वह उनके चुंगुल से बचकर हमारी ओर भागा, उसके जख्मो से खून बहने लगे थे।
कुत्तों ने बंडू को कई जगह से काटा था, वह लड़खड़ा रहा था, अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पा रहा था। लल्लू के निग़ाहों में भी करुणा और पीड़ा तैर गई। गांव में होते तो दु हत्था लठ्ठ लेकर उन कुत्तों को कुदा-कुदा कर मारते, यहां सायकल के हैंडल के मूठ को मुट्ठियों में जोरदार दबाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं था।
रात घिर आई थी और हमे रेलवे स्टेशन में रुकने का इंतजाम देखना था, हम जानते नहीं थे कि स्टेशन में कहां रुक कर सोया जा सकता है। बंडू को इस हालत में छोड़ा नहीं जा सकता था, मैं खामोशी से उसे अपने चोटों को जीभ से चाटते देख रहा था।
'चल छोड़ दाऊ, अब येला एकर किस्मत म छोड़।'
लल्लू ने कहा था, लल्लू मेरा भतीजा था किंतु मेरे से उम्र में बड़ा था। मुझमे अपनी उम्र के हिसाब से आवश्यक परिपक्वता नहीं थी, मेरी सुई बंडू पर ही अटकी हुई थी।
हम कहाँ अपनी सायकल रखे, कहाँ, कैसे सोये, मुझे कुछ पता नहीं। प्लेटफार्म पर बेमेतरा, बेरला, नवागढ़ के बहुत सारे लड़के थे जिनका रोजगार पंजीयन हो नहीं पाया था। सब अपनी-अपनी जगह पोगरा कर पंछा जठा कर लेटे थे। 50-60 किलोमीटर सायकल ओटने के कारण हम पर थकावट हावी हो रही थी। लल्लू मुझे प्लेटफार्म पर बिठा कर होटल से चार समोसा लाया, हम खाये, प्लेटफार्म के नल से ससन भर पानी पिया। आंखों में बंडू लिए सो गए, ट्रेन जब गुजरती तब बंडू फिर दिमाग मे आता पर थकावट नींद को पोटारे रहती।
सुबह बंडू कहीं नजर नहीं आया।
'छोड़ दाऊ, चल जल्दी दतवन कर।'
लल्लू मुझे स्टेशन के सामने घूमते देखकर कहा, उसके हाथ मे बंबूल के दो दातून थे जिसे वह गाँव से ही अपने झोले में ले आया था।
हम फिर स्टेडियम पहुँचे, बेरोजगारों के भीड़ में उबुक चुबुक होते, आखिर लगभग बारा बजे हमें नीले रंग का पोस्टकार्ड साइज रोजगार पंजीयन कार्ड मिल गया।
लल्लू ने कहा कि अभी समय है मैत्री गार्डन घूम लेते हैं। मैं बिना प्रतिरोध उसके साथ मैत्री गार्डन की ओर बढ़ गया। पूछते-पूछ्ते हम वहाँ पहुचे। लल्लू धारी दार बाघ और बब्बर शेर सहित सभी जानवर को उत्सुकता से और देर तक रुक कर देखता था। मुझे असकट लग जाता, मुझे सब जानवर बंडू जैसे लगते।
'चल दाऊ अड़बड़ भूख लागत हे, गाँव जाए बर तको मंझन होही।'
मेरे उकताहट को समझते हुए लल्लू अब जल्दी जल्दी जानवरों पर नजर मारते बाहर निकल आया। बाहर ठेले में दो प्लेट चना चरपटी दहेल के जो पैडिल पे पांव धरे कि दिया बत्ती तक अपने गाँव।
समय के साथ साथ बंडू वाला वाकया मैं भूल गया। बेमेतरा से 1986 में बी.कॉम. किया और साइंस कॉलेज व सुराना कालेज दुर्ग से 1988 में एम.कॉम.। इस बीच दोस्त बताते कि पांच हजार खर्च करने पर रोजगार कार्यालय से बीएसपी के लिए काल लेटर निकल जाता है फिर नौकरी पक्की। पांच हजार इहि जघा हे जी, चलो सकेलता हूँ।
इस सकेलने के जद्दोजहद में रोजगार पंजीयन कार्ड धूमलहा हो गया, कई कई बार फ़ोटो कापी कराने, धरने निकालने में फट भी गया पर रोजगार नहीं मिला।
पिछले अठ्ठाइस सालों से मैं दुर्ग में रहता हूँ,  आज सोचता हूँ कि बंडू मेरे साथ गाँव से यहाँ क्यूँ चला आया था? जबकि गाँव मे वह मेरे साथ इतना घुला-मिला भी नहीं था। वह स्कूल जाते समय सिमगा के पुल तक हमारे साथ भी नही जाता था। यदि वह जाता तो झोले से रोटी निकाल कर खाते हुए हम कुछ टुकड़े उसकी ओर उछाले भी रहते जिसके नमक के चलते वह हमारे साथ चलता। गाँव की थोड़ी बहुत जान पहचान बस।
शायद वह तैंतीस साल पहले बता देना चाहता था कि यहीं लड़ना है तुम्हे, बेरोजगारी से, भूख से, ताकि शहरी लोगों का झुंड तुम्हे हटक न सके।
सलाम बंडू, कुकूर!!
-संजीव तिवारी

09 November, 2017

छत्तीसगढ़ सम असम

-संजीव तिवारी
भारत में छत्तीसगढ़ से पृथक ऐसे कुछ क्षेत्र भी हैं जहां छत्तीसगढ़ के लोग रहते हैं। ऐसे क्षेत्रों में झारखंड के टाटानगर की सोनारी बस्ती और नागपुर की छत्तीसगढिया बस्ती का नाम हमने लोगों से सुना है। दिल्ली और जम्मू में भी छत्तीसगढ़िया श्रमिकों की बस्ती है। इसके अतिरिक्त पूरे देश मे ईट भट्टा और भवन निर्माण के कार्यों में श्रमरत छत्तीसगढ़िया श्रमिकों की टोली आपको मिलेंगें। सुनी-सुनाई बातों और प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर हम अनुमान लगाते हैं कि अन्य प्रदेशों में कार्यरत या निवासरत इन छत्तीसगढ़ियों की संख्या सौ-पचास से लेकर दस-बीस हजार तक हो सकती है। हमारे इस भ्रम का पटाक्षेप तब होता है जब हम लगभग दो हजार किलोमीटर दूर पूर्व में असम पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। वहां निवासरत छत्तीसगढ़ियों के अनुसार असम के बराक वैली और ब्रम्हपुत्र वैली में लगभग बीस लाख छत्तीसगढ़िया निवास करते हैं। असम में सैकड़ो गांव है जहां छत्तीसगढ़ियों की बाहुल्यता है। सैकड़ो गांव ऐसे हैं जो रेवेन्यू रिकार्ड में किसी न किसी छत्तीसगढ़िया व्यक्ति या समुदाय के नाम से है। इन गांवों में छत्तीसगढ़ की भाषा, परम्परा और सम्पूर्ण संस्कृति जीवंत है।
पिछले साल संस्कृति विभाग के द्वारा पहुना संवाद नामक एक आयोजन किया गया जिसमें असम में निवासरत छत्तीसगढ़ वंशियों का तीस सदस्यीय दल रायपुर आया था। इन्होंने अपने पुरखों की, छत्तीसगढ़ से असम तक की यात्रा और वहां के संघर्षपूर्ण जीवन का अनुभव यहां के पत्रकारों और साहित्यकारों से बांटा था। इस आयोजन के समाचार जब प्रकाशित-प्रसारित हुए तब यहां के लोगों को पता चला कि असम में छत्तीसगढ़ियों की एक बड़ी जनसंख्या निवास करती है। उनकी भाषा और संस्कृति पूर्णतया छत्तीसगढ़िया है और उन्होंने इस प्रदेश की गौरवशाली परम्परा को लगभग डेढ़ सौ साल से जीवित रखा है।
डेढ़ सौ सालों से चाय बागान में सोना उपजाते हैं छत्तीसगढ़िया
असम में छत्तीसगढ़ियों का आप्रवासन चाय बागानों के निर्माण के साथ ही आरंभ हुआ। यह वह दौर था जब छत्तीसगढ़ में लगातार अकाल पड़ रहे थे। बेकारी, भुखमरी और महामारी के कारण कमजोर तबके के लोगों का यहां रहना मुश्किल हो गया था। ऐसी स्थिति में यहां के श्रमिक बड़ी संख्या में बाहर कमाने खाने के लिए निकले। आसाम के चाय बागानों में श्रमिकों की आवश्यकता थी, इन बागानों के एजेंट इन्हें बहला-फुसला कर असम ले आये। हम सब जानते ही हैं कि, छत्तीसगढ़ की पहली महिला सांसद मिनी माता का जन्म असम में ऐसे ही आप्रवासी परिवार में हुआ था। असम निवासी छत्तीसगढ़ वंशियों का कहना है कि उनके दादा-परदादा लगभग 1860 के दसक में असम आये थे। उन्हें बहुत कष्टप्रद तरीके से सड़क मार्ग, रेलमार्ग और जल मार्ग से असम लाया गया। उस समय आवागमन के साधनों की कमी थी। श्रमिकों को ठूंस-ठूंस कर बोगियों में समान की तरह भर दिया जाता था। रास्ते मे उनकी मौत तक हो जाती थी तब उन्हें नदी में फेंक दिया जाता था। अंग्रेजों के द्वारा इन श्रमिको को चाय बागानों में बंधुवा मजदूर की तरह काम कराया जाता था। इन्हें भयानक यातनायें दी जाती थी। अपनी जमीन से कई-कई योजन दूर आ जाने के बाद ये वापस अपने जन्मभूमि की ओर लौटने की बात सोच ही नही पाते थे। ऐसे ही लोगों का परिवार बढ़ता गया। इनमे से कुछ लोगों ने चाय बागानों में काम करते-करते आस-पास के जंगल को काट कर खेती करना आरंभ किया। धीरे-धीरे और लोग जंगल काट कर खेत बनाने लगे, चाय बागानों के आस-पास छत्तीसगढ़ियों की बस्ती बसने लगी।
चाय बागानों के निर्माण के शुरुआती दौर में अंग्रेजों के द्वारा श्रमिको को जबरदस्ती लाया जाता था। बाद के दौर में चाय बागानों में श्रमिकों की भर्ती की दो पद्धति प्रचलित हुई, अरकटिया और गिरमिटिया। इन दोनों पद्धतियों से एजेंट श्रमिको को चालानी लेकर आते थे। छत्तीसगढ़ से पूर्व में गये श्रमिकों के रिश्तेदारों या उनके गांव वालों को यह सब्ज़बाग दिखाया जाता था कि असम में पैसों का पेड़ होता है जिसे साल में दो बार हिलाने से पैसा झरता है। यहाँ के भोले ग्रामीण जिनके पास रोजगार की समस्या होती थी वे इनके मायाजाल में फस जाते थे। गिरमिटिया मजदूर लंबे वर्षों के अनुबंध पर और अरकटिया किसी निश्चित अवधि के बाद स्वेक्षा अनुबंध पर काम करते थे। यहां से असम गए अधिकांश श्रमिक वापस नही लौट पाते थे और वहीं अपनो को तलाशते, किसी छत्तीसगढ़िया बस्ती में खेती-मंजूरी करने लगते थे। छत्तीसगढ़ से असम में श्रमिकों का आप्रवासन 1950 के दसक तक चलता रहा है। आज असम में हजारों गांव ऐसे हैं जहाँ अधिसंख्यक छत्तीसगढ़िया निवास करते हैं।
अशोक तिवारी ने किया मानवशास्त्रीय अध्ययन
पिछले जुलाई में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह जी के मंशा के अनुरूप मानवविज्ञानी और संस्कृति विशेषज्ञ श्री अशोक तिवारी जी के नेतृत्व में इस आलेख के लेखक को भी अध्ययन यात्रा हेतु असम जाने का अवसर प्राप्त हुआ। अशोक तिवारी जी असम के छत्तीसगढ़ वंशियों पर काफी लंबे समय से मानवशास्त्रीय अध्ययन कर रहे हैं। यात्रा के दौरान हमने गौहाटी से डिब्रूगढ़ तक लोवर और अपर असम के लगभग डेढ़ सौ गांवो के लोगों से प्रत्यक्ष संपर्क किया। उनके बीच जाकर उनके रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज, संस्कृति-परम्परा और बोली-भाषा का मानव शास्त्रीय पद्धति से अध्ययन किया। हमने पाया कि आज से डेढ़ सौ साल पहले छत्तीसगढ़ से कट जाने के बाद भी इन्होंने छत्तीसगढ़ को अपने बीच जीवित रखा है। असम के इन गांवों में जाकर आपको कतई महसूस नही होगा कि आप दो हजार किलोमीटर दूर असम में हैं, आपको लगेगा कि छत्तीसगढ़ के ही किसी गांव में हैं। असम में आज भी छत्तीसगढ़ वंशियों के घरों में यदि आप चले जाइए, तब वहां आपका स्वागत छत्तीसगढ़ की परंपरा के अनुसार दरवाजे पर ही पानी से भरे कांसे के लोटे के साथ होगा। यह छत्तीसगढ़ की परंपरा रही है कि घर में कोई मेहमान आता तो उसे दरवाजे में ही पानी भरा लोटा दिया जाता था। यह परंपरा लम्बी यात्रा में थके और प्‍यासे मुसाफिर को पानी पिलाने से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। छत्तीसगढ़ में यह परंपरा अब विलुप्त है किंतु असम में यह नजर आया। ऐसे ही छत्तीसगढ़ के कई मूल परम्परायें यहां नजर आई जिसमें कांसे के बर्तन में भोजन, जांता, ढ़ेंकी और छत्‍तीसगढ़ी भाषा का सहज प्रयोग।
इंतजार है उन्हें छत्तीसगढ़ के स्नेह का
असम में छत्तीसगढ़ से गए विभिन्‍न जाति के लोग निवासरत हैं जिनमें साहू, सतनामी, लोधी, पनिका, ग्‍वाला, कोष्‍टा, धोबी, गोंड और अन्‍य आदिवासी जातियां आदि हैं। इनके बीच शादी-विवाह का संबंध अपनी-अपनी जातियों में होता है। कुछ कम जनसंख्या वाली जातियां प्रयास करती हैं कि उनके विवाह यदि अंर्तजातीय हों तो वे छत्तीसगढ़ मूल के ही हों। यह उनके दिलों में छत्तीसगढ़ के प्रति प्रेम को दर्शाता है। अभी के कुछ सालों में असम से छत्तीसगढ़ में वैवाहिक संबंध भी आरंभ हुए हैं।
असम के छत्ती़सगढ़ वंशियों में प्रचलित ददरिया ‘ए ह देश नोहय नोनी आसाम आए का।‘ कहीं-कहीं हमें यह एहसास दिलाता है कि असम में रहने वाले लाखों छत्तीसगढ़ियों में से अधिकतर लोगों ने संभवतः छत्तीसगढ़ के बारे में सुना और पढ़ा ही हो, देखा बहुत कम लोगों ने ही होगा किंतु फिर भी उनके दिलों में छत्तीसगढ़ बसता है। कहीं न कहीं आज भी उनको यह एहसास है की असम उनका अपना देश तो नहीं है। समय बदला, हालात बदले और अब सभी छत्तीसगढ़िया अपने आप को कहते हैं कि वह असमिया हैं, असम के निवासी हैं और असम उनका राज्य है किंतु उनकी पुरखों की भूमि छत्तीसगढ़ उन्हें अपने संस्कृति से जोड़ती है इसलिए वह सांस्कृतिक रुप से छत्तीसगढ़िया हैं। हमारे इस अध्ययन यात्रा ने असम में निवासरत छत्तीसगढ़ियों से मेल-जोल की एक शुरूआत की है। अगली कड़ियों में और लोग छत्तीसगढ़ से असम जाएंगे। वहाँ के छत्तीसगढ़ियों की जानकारी अपने-अपने तरीके से यहाँ हम सबको बांटेंगे।

असम के छत्‍तीसगढ़िया माटी पुत्र

रामेश्वर धनवार- विशेष उल्लेखधारी छत्तीसगढ़ वंशियों में स्व. श्री रामेश्वर धनवार ऐसे व्यक्ति है जो लगातार आठ बार असम के डिगबोई विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित होकर असम विधान सभा में विधायक रहे छत्तीसगढ़ वंशीय स्व. रामेश्वर धनवार जी के पिता का नाम जेठवा धनवार था आपका जन्म 14 जुलाई 1939 और देहावशान 10 जुलाई 2017 को हुआ, आपने गोवहाटी विश्वविद्यालय से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। आपकी छात्र आन्‍दोलन तथा श्रमिक आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका रही, आप असम राज्य में श्रम, रोजगार और आबकारी मंत्री भी रहे तथा आपने चाय बागान में काम करने वाले लोगों की समस्याओं पर बहुत काम किया।
रामेश्वर तेली - डिब्रूगढ़ से 16वें लोकसभा के एक सदस्य के रूप में निर्वाचित संसद सदस्य श्री रामेश्वर तेली भी एक छत्तीसगढ़ वंशी है, जिनके पूर्वज छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव क्षेत्र से गये थे, आपके पिता का नाम स्व. बुधु तेली था आप दुलिया जान से दो बार असम विधानसभा के लिए विधायक के रूप में भी पूर्व में निर्वाचित हो चुके है, आपने हायर सेकेंड्री तक पढ़ाई की है और वे अविवाहित है, रामेश्वर जी अपनी युवा अवस्था से ही असम चाय जनजाति छात्र संघ के सक्रिय सदस्य तथा बाद में जिला अध्यक्ष एवं प्रमुख संगठन सचिव के रूप में कार्य करते हुए अपने राजनीतिक जीवन की शुरूवात की है। आप नहर कटिया आसाम से शिरिश नामक एक पत्रिका भी प्रकाशित करते है, समकालीन छत्तीसगढ़ वंशीय सामाज आपसे अपने कल्याण की दिशा में समुचित कार्यवाही की अपेक्षा करते है, जिसे पूरा करने के लिए आप सतत प्रयासरत रहते है।
संजय किसान - आसम में 2016 में हुए चुनाव के अनुसार वर्तमान विधानसभा में श्री संजय किसान पहली बार तीनसुकिया से विधायक के रूप में निर्वाचित हुए हैं। 26 जनवरी 1970 को जन्में श्री संजय किसान एक छत्तीसगढ़ वंशी है, जिनके पूर्वज रायगढ़ क्षेत्र से असम गये थे। आपके पिता का नाम मोहनलाल किसान है तथा आपने हायर सेकेंडरी तक पढ़ाई की है।
पुनीत साहू - छत्तीसगढ़ के नाँदघाट के पास के गांव अड़ार के पुनीत साहू, श्री रेंजवा साहू के दूसरे नंबर के पुत्र हैं। ये सन 1972-74 के भीषण अकाल के समय, असम की ओर, मात्र 250/- लेकर निकले। यहां आकर उन्होंने कई जगह मजदूरी की, नौकरी किया, आटो रिक्‍शा और टांगा चलाया, छोटा-मोटा व्यवसाय किया। पुनीत, अपनी मेहनत व हिम्मत के बल पर दीमापुर नागालैंड में बस गए। वहां उन्होंने अपना घर भी लिया और बच्चों को पढ़ाया लिखाया, उन्हें काबिल बनाया। इनके चार बच्चों में से बड़ा लड़का दीमापुर में एक स्कूल में प्राचार्य है। इनके बच्‍चों में बड़ा लड़का विजय साहू नागालैण्‍ड के शिक्षा व सामाजिक स्‍तर के कई सरकारी निगम मंडलों में पदाधिकारी हैं। नागालैण्डन में छत्तीसगढ़ वंशियों की संख्या नहीं के बराबर है इस कारण पुनीत ने अपनी गाढ़ी कमाई से आसाम के होजाइ में राजमार्ग से लगा लगभग 10000 वर्ग फुट का प्लाट लिया, जिसमें तीन मंजिला बंगला बनाया है। सर्वसुविधायुक्त इस आलीशान गेस्ट हाउस में हम अध्ययन यात्रा के दौरान कुछ दिन उन्हीं के गेस्ट थे। पिछले दस वर्ष पहले एक दुर्घटना के कारण इनका एक हाथ काटना पड़ा था। इसके बावजूद ये लगातार अपने कार्य में लगे रहे, छत्तीसगढ़िया जीवटता, सरलता और मेहनत के बल पर असम जैसे अन्य प्रदेश में 70- 80 लाख के बंगले का मालिक होना हम सब के लिए गर्व की बात है।
सन्‍यासी गोंड - असम के नौगांव जिले के होजई में स्थित धनुहार बस्ती एक बड़ा गांव है, जिसमें लगभग 850 परिवार रहते हैं। जिसमें से ज्‍यादातर परिवार छत्तीसगढ़ वंशियों के हैं। धनुहार बस्ती गांव की जनसंख्या लगभग 4500 है। लोगों नें बताया कि इसे सन्यासी बस्ती भी कहा जाता है। सन्यासी गोंड नाम के एक छत्तीसगढ़िया गोंड़ के नाम से इस बस्ती का नाम सन्यासी बस्ती पड़ा है। सन्‍यासी गोंड के पिता झगरु गोंड़ नें यहां जंगल काट कर खेती करना आरंभ किया था। बाद में यहां बस्ती बस गई, संन्यासी इस क्षेत्र के जाने-माने व्यक्ति थे, आज भी सन्यासी के परिवार के लोग इस बस्ती में रहते हैं। यहां के ज्‍यादातर लोग खेती करते हैं और इनके रोजगार का मुख्य आधार खेती ही है। छत्तीसगढ़ के गांवों जैसे यहां की बोली-भाषा एवं परम्पगरा पूर्णतया छत्‍तीसगढ़ी है।
मंगलू तेली - छत्तीसगढ़ वंशी मंगलू तेली ने असम में सर्वप्रथम सोनारी चाय मजदूर संघ की स्‍थापना की थी और वे इसके प्रतिष्‍ठापक अध्‍यक्ष थे। यह मजदूर संघ अंग्रेजों के समय तक पूरे प्रभाव में नहीं आ पाई थी किन्‍तु संगठन सक्रिय था। स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह पूर्ण प्रभाव के साथ उभरा और इसका कार्यालय भी खोला गया जो आज भी संचालित है। मंगलू तेली जी छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के बोरझरा गांव के मूल निवासी थे। इन्‍होंनें छत्तीसगढ़ से जाकर चाय बागानों में अंग्रेजों के द्वारा श्रमिकों पर किए जा रहे दमन का विरोध किया, श्रमिकों को संगठित किया और ट्रेड यूनियन खड़ा कर दिया। मंगलू तेली जी रिटायरमेंट के बाद छत्तीसगढ़ के अपने गांव लौट गए थे।
गुरूचरण साहू - लगभग 90 वर्ष के बुजुर्ग गुरूचरण साहू के पास एक जमाने में बहुत बैल गाड़ियां थी। ये चाय बागानों एवं स्‍थानीय व्‍यापार में माल ढ़लाई का काम करते थे और अच्‍छे पैसे वाले माने जाते थे। हम इनके घर गए तो आश्‍चर्य हुआ क्‍योंकि इनका घर मिट्टी का था जिस पर घास-फूस का छत था जिसका आकार बहुत छोटा था। घर में इनकी बहू थी जिन्‍होंनें बताया कि अब इनकी आंख खराब हो गई है और वे देख नहीं पाते। जब हम इनके घर पहुचे तो इन्‍हें सहारा देकर हमारे पास लाया गया। अवस्‍था के कारण ये सुनते भी कम हैं फिर भी इन्‍होंनें हमें उन दिनों के बारे में बहुत ही रोचकता से बताया। उन्‍होंनें बताया कि तब, जब आवागमन के साधन नहीं थे, चाय बागानों के चाय के बक्‍सों को गाड़ियों में भरकर ब्रम्‍हपुत्र नदी तक लाया जाता था जहां से चाय विदेशों को निर्यात होता था। उन्‍होंनें बताया कि तब यहां घने जंगल थे जगली जानवरों का खतरा रहता था इस कारण गाड़ियों का झुंड एक साथ चलता था। वे रात को गाड़ी में कंडील लटकाए टीने को बजाते बजाते जंगल पार करते थे। वापसी में राशन का सामान लेकर आते थे। इस काम का उन्‍हें दुगना भाड़ा प्राप्‍त होता था। गुरूचरण साहू नें अपने सम्पन्नता के समय में बामनबाड़ी में एक कन्‍या शाला खोलने के लिए आर्थिक मदद भी किया था, वह कन्‍या शाला आज भी विद्यमान है। 
हाथी दान में देने वाले महंत - सपेकाठी एक गामीण रेलवे स्टेशन है जो सन् 1836 से अस्तित्‍व में है। यहां के राजेश सतनामी नें बताया कि इस  गांव में  लगभग 175 सतनामी परिवार रहते हैं। उन्‍होंनें यह भी बताया कि उनके दादा स्‍व. पंचम सतनामी और इनके भाई पचकौड़ सतनामी, हीरा सतनामी आदि छत्तीसगढ़ के भंडारपुर, बिलासपुर से आए थे। उन्‍होंनें यहां जगल काटकर खेती करना आरंभ किया और लगभग 80 बीघा जमीन बनाए। बताते हैं कि इस परिवार नें ही गुरू अगमदास के असम प्रवास के दौरान हाथी दान में देने का संकल्‍प लिया था, इन्‍होंनें दान के हाथी को ट्रेन में प्रायवेट बोगी किराया करके छत्तीतसगढ़ लाकर पहुँचाया था। इन्‍होंनें ही गुरू अगम दास को स्‍व. मिनी माता से विवाह करने का प्रस्‍ताव भी रखा था। इनके दादा पंचम सतनामी गांव बूढ़ा थे और उसके बाद इनके पिता गंगादास सतनामी भी गांव बूढ़ा थे। यहां हम इनके घर गए जहां इस परिवार की लड़कियों से भी हमारी मुलाकात हुई जिनमें मौसमी बी.एससी., शिखा बी.ए. एल.एलबी., दीपशिखा बी.एससी. में अध्‍ययनरत हैं। इसी परिवार के गौरव सतनामी बी.काम., तुलतुल सतनामी दसवीं और पिंकू सतनामी अन्‍नामलाई विश्‍वविद्यालय से माईक्रोबायलाजी में पी.एचडी. कर रहा है।
मिनी माता जन्‍म स्‍थान - मिनी माता के जन्‍म गांव में जाने के लिए कोलांग नदी के समानांतर, राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. 175 में आगे बढ़ना होता है। यह रोड कोलियबोर होते हुए तेजपुर, जोरहाट की ओर जाती है। इस गांव के लिए बोराली गांव से कटकर दोलगांव का रास्ता है। यह  काजीरंगा राष्ट्रीय अभ्यारण्य क्षेत्र में स्थित है, यहां से लगभग 2-3 किलोमीटर के रेडियस से ब्रम्हपुत्र नदी बहती है। दोल गांव मिनी माता का जन्म स्थान है। मिनीमाता का जन्म इसी गांव में सन् 1913 में हुआ था। इनकी माता मतीबाई नें इन्‍हें यहीं जन्‍म दिया था। मिनी माता की मां को लेकर इनके माता-पिता बिलासपुर जिले से जोरहट की ओर निकले थे। उस दौरान छत्तीसगढ़ में लगातार अकाल पड़ रहा था और गांवों में खाने के लाले पड़े थे। रास्‍ते में मिनी माता के नाना-नानी की तीन पुत्रियों में से दो की मृत्‍यु हो गई, मती बाई ही जीवित रहीं। मतीबाई की पुत्री मीनाक्षी का यहीं जन्‍म हुआ। मीनाक्षी नें अपनी स्कूली शिक्षा स्‍थानीय स्‍कूल में प्राप्त की। एक समय सतनामी समाज के गुरु अगमदास धर्म प्रचार के सिलसिले में जब असम गए, तब इनको अपने जीवन संगिनी के रुप में चुन कर इनके साथ विवाह किया। मीनाक्षी छत्तीसगढ़ में मिनी माता के रूप में जानी गई। सन् 1952 से 1972 तक मिनी माता छत्तीगसगढ़ के लोकसभा में सारंगढ़, जांजगीर तथा महासमुंद क्षेत्र से सांसद रहीं। मिनी माता को असमिया, अंग्रेजी, बांगला, हिन्दी तथा छत्तीसगढी का ज्ञान अच्‍छा था। यहां आदरणीय मिनीमाता के जन्म स्थान को गांव के लोग देवी स्थान के रूप में पूजते हैं। यहां गांव के लोग मिनीमाता को देवी स्वरूप मानते हुए सुबह-शाम मांदर और मंजीरे के साथ मिनी माता की अद्भुत आरती गाते हैं।
छत्तीसगढ़ से रिश्‍तों में दरार - असम निवासी रमेंश लोधी नें हमें एक मार्मिक वाकया सुनाया। उन्‍होंनें बताया कि लगातार अकाल से जूझते धमधा के पास के एक गाँव के दो भाइयों में से एक रामलाल लोधी, अपना खेती-खार छोड़कर असम आ गए। यहां मेहनत रोजी मंजूरी किया और होजाइ के पास राजापथार गाँव मे बस गए। एक भाई गाँव मे ही रह गया। रामलाल गाँव नही लौटा, वह वही सजातीय विवाह किया और खेती का जमीन बनाया। आज उनके नाती रमेश लोधी उसके संपत्ति को सम्हाल रहे हैं। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित असम निवासी छत्तीसगढ़ वंशियों के बीच सेतु के हेतु से आयोजित कार्यक्रम पहुना संवाद में रमेश लोधी छत्तीसगढ़ आया तो अपने जड़ो से मिलने अतिउत्साह के साथ, असम से प्रेम की गठरी बांधे, अपने दादा के गाँव भी गया। वहां पूछते पूछते अपने दादा के भाई के नाती के घर गया तो उसे घोर निराशा हाथ लगी। वहां उसके चचेरे भाई ने पानी तक नही पूछा और रामलाल लोधी को अपने दादा का भाई मानने से इंकार कर दिया जबकि गाँव के बुजुर्ग इस बात को सत्य ठहराते रहे। रमेश लोधी अपने पुरखों के गाँव डीह की मुठ्ठी भर मिट्टी लेकर असम लौट गया। उसे दुख है कि उसके छत्तीसगढ़ीया भाई ने उसे इसलिए अपना नही माना कि रमेश लोधी जमीन का हिस्सा न मांग ले। जबकि रमेश लोधी सिर्फ अपने लोगों से मिलने और अपनी माटी को माथे से लगाने आया था। हो सकता है अधिकांश लोगों के मन में यही बात रही होगी कि अब हम वहां जायेंगें तो हमें स्‍वीकारा नहीं जायेगा।

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