ब्लॉग छत्तीसगढ़

18 April, 2016

गांव की महकती और खनकती आवाज़ है - ममता चंद्राकर
विनोद साव

अपनी खनकती आवाज़ से छत्तीसगढ़ी के लोक-गीतों को मोहक आंचलिकता से भर देने वाली यशस्वी गायिका ममता चंद्राकर को पद्मश्री से नवाजा जाएगा. लोक गायन में मुखरित होने की कला ममता जी को विरासत में मिली है. वे दुर्ग के लोक कला मर्मज्ञ दाऊ महासिंग चंद्राकर की बेटी हैं जिन्होंने अपने निर्देशन में 'सोनहा बिहान' जैसे लोकमंच को प्रस्तुत किया था. संप्रति ममता जी रायपुर आकाशवाणी केन्द्र में उप निदेशक है. वे छत्तीसगढ़ी फिल्मों के निर्देशक प्रेम चंद्राकर की जीवन-संगिनी हैं.

ममता चंद्राकर ने छत्तीसगढ़ी लोक गीतों की मंचीय प्रस्तुति को आधुनिक तामझाम से बखूबी जोड़ा है. इस तामझाम में मंच में प्रस्तुत करने की यांत्रिक कला है. ऐसी प्रस्तुति आज दुनिया की हर भाषा में लिखे गीत के लिए अब अनिवार्यता बन गई है. जिसमें एक भव्य मंच रोशनी से चकाचौंध होता है और तेज झनकता संगीत स्वर होता है. इसमें ज्यादातर नृत्य एक बड़े समूह के द्वारा किये जाते हैं. इस समूह की मुख्य गायिका नृत्य नहीं करती बल्कि नेरटरयानी सूत्रधार के रूप में मंच पर पारंपरिक पहनावे के साथ खड़ी होती है और अपनी भाव-भंगिमाएं बिखेरती रहती हैं. इस तरह वह बड़े आकर्षक कलेवर में अपने गीतों को मस्ती में गाते हुए समां बांध लेती है

छत्तीसगढ़ में इस तरह की मोहक प्रस्तुतियों में जिन कलाकारों ने अपने को स्थापित कर लिया उनमें हैं ममता चंद्राकर और अलका चंद्राकर. यद्यपि इन दोनों कलाकारों में न केवल पीढ़ी का अंतर है बल्कि दोनों के गीत रूपों में भी अंतर है. अलका चंद्राकर छत्तीसगढ़ी में जहां सुगम संगीत में पिरोये अपने गीतों को फडकते अंदाज़ में पेश करने में माहिर हैं वहीं ममता चंद्राकर छत्तीसगढी के पारंपरिक लोक-गीतों को अपने गायन में मधुर स्वर देती हैं. यद्यपि लोकगीतों को गाने में प्रसिद्धि अनेक गायकों को मिली है पर आंचलिकता से पगी हुई आवाज जैसे पुरुष स्वर में हम लक्ष्मण मस्तुरिहा में पाते हैं वैसे ही नारी स्वर में आंचलिकता से लबरेज यह स्वर ममता के गाए गीतों में स्पष्ट झंकृत होता है. विशेषकर जब बिहाव गीतों के उनके श्रृंखलाबद्ध गीतों को सुना जाए तो वह वही स्वर है जो छत्तीसगढ़ की माटी में उपजी स्त्री के निपट गांव का गंवई स्वर होता है. इन स्वरों को गीतों के हिसाब से भिन्न रूप ममता अपनी गायकी से दे लेती हैं. इनमें दुल्हन के श्रृंगार के समय की रोमानी दुनिया होती है, तो तेलचघी, टिकावन, बरात निकासी, मऊर भडौनी गीतों के समय की प्रसन्नता मिश्रित चहकन भरी आवाज़ होती है तो भांवर और बिदाई के समय का आत्मिक रूदन भरा ह्रदय को झकझोरने वाला स्वर गूंजता है - यह सब ग्राम्यबोध से भरे श्रोताओं के सीधे अंतःस्थल को छू लेता है, सुनने वाले को बरबस ही भाव विभोर कर लेता है.

छत्तीसगढ़ राज्य बनते ही जो छत्तीसगढ़ी में फ़िल्में बनाने का उत्साह दिखा उनमें सतीश जैन की तरह ममता के पति प्रेम चंद्राकर भी एक कुशल फिल्म निर्देशक के रूप में सामने आए. प्रेम अपनी युवावस्था से ही विडियो शूटिंग व टेलीफिल्म निर्माण से जुड़े हुए थे. वे गंभीर किस्म के कला साधक रहे हैं. उनके खामोश चेहरे के भीतर कला और सोच के जो द्वन्द थे वे उनकी फिल्मों की कथाओं और निर्देशन के माध्यम से मुखरित हुए. प्रेम और ममता की संगति और उनकी कलात्मक जुगलबंदी ने छत्तीसगढ़ी फिल्मों, लोक गीतों, नृत्यों को अनेक आयाम दिए. यहाँ भी प्रेम की चुप्पी साधना ने ममता की गायन कला को सिनेमेटिक सौंदर्य से भर दिया. प्रेम चंद्राकर निर्देशित फिल्मों में गायिका ममता पर वैसा ही स्वाभाविक फिल्मांकन किया जिस तरह वे मंचों पर अपनी प्रस्तुतियाँ देती हैं. फिल्म के दृश्य में उपस्थित होकर जैसे ही ममता अपने गीत के बोल बोलती हैं ‘तोर मन कइसे लागे राजा ..’ वैसे ही सिनेमाहाल उमंग उल्लास से भरे दर्शकों की तालियों की गडगडाहट और सीटियों की सनसनाती फूंक से गूँज जाते हैं और फिल्मों की पार्श्व गायिका ममता फिल्मों की एक वायवी दुनियां की किरदार हो जाती हैं. टेलीफिल्म ‘लोरिक चंदा’ में पार्श्व गायन से शुरू हुई उनकी यह यात्रा आज फीचर फिल्मों तक जा पहुंची है और व्यावसायिक फिल्मों की वे अब जानी मानी गायिका हो गई हैं. उन्होंने छत्तीसगढ़ के लोकगीत - सुआ, गौरा गौरी, बिहाव, ददरिया को नई पहचान दी है. आज उनके गानों के सी.डी. गांव गांव में जमकर बिक रहे हैं. इन्टरनेट यूज़र उनके गीतों को अपने कंप्यूटर और मोबाइल में सुन रहे हैं. किन्हीं मायनों में ममता चंद्राकर आज नयी पीढ़ी की छत्तीसगढ़िया गायिकाओं की सबसे बड़ी ‘आइकन’ हो गयी हैं. ‘रंझाझर भौजी के डूमर माला’ जैसे गीत से शुरुवात करने वालीं ममता आज भी रंझाझर मता रही हैं. तब ऐसे में उन्हें पद्मश्री अलंकरण क्यों न मिले. वे सर्वथा योग्य हैं.

आकाशवाणी में पदस्थ होने से पहले ममता के कितने ही गीत तब रेडियो में बजा करते थे. इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय-खैरागढ़ से ‘कंठ संगीत’ यानी व्होकल म्यूजिक में एम.ए. और डाक्टरेट करने वाली ममता ने आकाशवाणी में अपने कंठ का जादू कुछ इस कदर बिखेरा कि आज वे रायपुर आकाशवाणी केन्द्र में उप निदेशक जैसे उच्च पद पर आसीन हैं. ममता चंद्राकर की इस अनवरत विकास यात्रा और पद्मश्री अलंकरण पाने के इस अवसर पर हम सबकी ओर से उन्हें ढेर सारी बधाइयां और शुभ-कामनाएं.
लेखक सम्पर्क eks- 9009884014

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23 February, 2016

निराला का गद्य यथार्थवादी साहित्य है

सरला शर्मा का उद्बोधन

जिला हिंदी साहित्य समिति के द्वारा संस्कृति विभाग के सहयोग से वसंत पंचमी के उपलक्ष्‍य में एक दिवसीय संगोष्‍ठी का आयोजन किया गया। दुर्ग के होटल अल्‍का के सभागार में आयोजित यह कार्यक्रम तीन सत्रों में था। जिसमें पहला सत्र महाकवि निराला के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित था। इस सत्र को संबोधित करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार एवं व्यंग्‍यकार रवि श्रीवास्तव ने निराला के चर्चित रचनाओं एवं उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि महाकवि निराला की कविताओं को गोष्ठियों में पढ़ देने से उनकी रचनाओं का उचित मूल्यांकन नहीं हो पाता। उन्‍होंनें कहा कि निराला का साहित्यिक अवदान प्रेमचंद से कम नहीं है इसी कारण उन्‍हें महाकवि कहा गया। निराला की मातृभाषा बांग्ला थी किंतु वे हिंदी के बड़े कवि हुए, उन्होंने तत्‍कालीन सामंतों एवं सामंती व्‍यवस्‍था के प्रति अपने प्रतिरोध को अपनी रचनाओं में प्रस्तुत किया। ब्रज जैसे लोक भाषा में जो बात व्यापक रुप से नहीं कही जा सकती उसे उन्होंने खड़ी बोली हिंदी में कहा और उसे स्थापित किया। निराला के गद्य साहित्य पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ लेखिका सरला शर्मा ने कहा कि निराला का असल विद्रोही स्‍वरूप उनकी गद्य रचनाओं में ही दिखता है। उन्होंने वर्तमान समय के साथ निराला की रचनाओं को व्याख्यायित करते हुए कहा कि आज भी निराला की रचनाओं की प्रासंगिकता है, निराला नें युगानुरूप सृजन किया, छायावाद और प्रगतिवाद के संधि स्थल से निराला के रचना की शुरुआत होती है। निराला को नए युग का स्वागत करने वाले रचनाकार के रुप में माना जाता है, उनका गद्य यथार्थवादी साहित्य है। उन्होंने उनकी गद्य रचनाओं, निबंधों, कहानियों आदि पर चर्चा करते हुए कहा कि निराला सामाजिक सरोकारों का व्यापक चित्रण करते थे और अपनी अभिव्यक्ति को व्यंग्‍य के माध्यम से तीव्र प्रहारक बनाते थे। निराला साहित्यिक विसंगतियों के शिकार थे इसलिए उनके गद्य का समय पर उचित मूल्यांकन नहीं हो पाया। पाठ्यक्रमों में उनके गद्य साहित्य को स्थान दिया जाना चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे राजभाषा विभाग के पूर्व अध्‍यक्ष पं. दानेश्वर शर्मा ने बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा का उल्लेख करते हुए निराला के अनछुए प्रसंगों पर चर्चा की। 

कार्यक्रम के द्वितीय सत्र का विषय था दुर्ग जिले का इतिहास। इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए इतिहासकार एवं जामगांव महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ के के अग्रवाल ने वाचिक परंपरा से लेकर ज्ञात उपलब्‍ध साक्ष्‍य व अविभाजित दुर्ग जिला के विभिन्न पुरातत्व स्थलों का उल्लेख करते हुए, जिले के इतिहास को समय बद्ध किया। कार्यक्रम के अगले वक्ता इतिहासकार व दुर्ग साईंस कालेज के प्राध्‍यापक डॉ. ए के पांडेय ने दुर्ग जिले के सफरनामा को तिथियों व आंकड़ों में विभाजित करते हुए बताया। उन्‍होंनें दुर्ग के ऐतिहासिक महत्व के कालखण्‍डों का उल्लेख करते हुए क्रमबद्ध रुप से दुर्ग नगर के इतिहास की जानकारी दी। सत्र की अध्यक्षता कर रहे वरिष्‍ठ साहित्‍यकार गुलबीर सिंह भाटिया जी ने दुर्ग के इतिहास से संबंधित खालसा शब्द को परिभाषित किया। कार्यक्रम में दुर्ग नगर के पुरातत्व एवं इतिहास से संबंधित चित्रों की प्रदर्शनी भी लगाई गई थी। जिसके चित्रों को अरुण गुप्ता नें विश्‍लेषित किया। इस सत्र में मुक्तकंठ साहित्य समिति के द्वारा प्रकाशित मासिक बुलेटिन का विमोचन अतिथियों एवं मुक्त कंठ साहित्य समिति के अध्यक्ष सतीश कुमार चौहान एवं डॉ नौशद सिद्धिकी, ओमप्रकाश शर्मा के द्वारा किया गया व उपस्थित साहित्‍यकारों को बुलेटिन की प्रति बांटी गई।

कार्यक्रम के अंतिम सत्र में सरस काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता रायपुर से पधारे वरिष्ठ शायर गौहर जमाली ने किया। इस गोष्ठी में रायपुर दुर्ग एवं भिलाई से आए हुए कवियों ने अपनी कविताएं पढ़ी। जिसमें मुकुन्‍द कौशल, मुत्‍थुस्वामी, विद्या गुप्ता, नीता काम्‍बोज, अनीता श्रीवास्तव, नीलम जायसवाल, सबा खान, एमएल वैद्य, राधेश्‍याम सिंदूरिया, सिद्ध, अरुण कसार, अलकरहा, नवीन तिवारी, ओम प्रकाश जायसवाल, अरुण निगम, निजाम दुर्गवी, हाजी सुल्तानपुरी, नौशाद सिद्धिकी, प्रदीप पाण्‍डेय, युसूफ मछली आदि नें अपनी कविताओं का पाठ किया। इस एक दिवसीय कार्यक्रम में तुंगभद्र सिंह राठौर, जगदीश राय गुमानी, प्रदीप वर्मा, रतनलाल सिन्हा, प्रशांत कानस्कर, संतोष झांझी, रौनक जमाल, रमाकांत बराड़या, गजराज दास महंत, उमेश दीक्षित, त्रयंबक राव, शैलेंद्र तिवारी, जीवन सिंह राजपूत, गोविंद पाल आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन समिति के सचिव संजीव तिवारी नें किया एवं स्‍वागत भाषण समिति के अध्‍यक्ष डॉ संजय दानी नें दिया। 

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