ब्लॉग छत्तीसगढ़

18 August, 2014

छत्तीसगढ़ का सोशल मीडिया, दायित्व और चुनौती

संजीव तिवारी के ब्‍लॉग पोस्‍टों व आलेखों को आप एक साथ झांपी में भी पढ़ सकते हैं.
पारंपरिक संचार के जो साधन है उससे हट कर गैर पारंपरिक संचार का जो साधन वर्तमान समाज में सहज सरल रूप से उपलब्ध है वही सोशल मीडिया है. जिसे हम ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्स अप आदि के नाम से पहचानते हैं. मीडिया के इसी माध्यम को हम सामान्यतया नागरिक मीडिया सिटिजन जर्नलिज्म भी कहते हैं. विकासशील समाज में आज सूचना की आवश्यकता सब को है, कल तक हमें सूचनायें पारंपरिक मीडिया जैसे समाचार पत्र, रेडियो और टीवी के माध्यम से प्राप्त होती थी. इन पारंपरिक माध्यमों के सामने चुनौती इनके संचालन के लिए भारी भरकम बजट की व्यवस्था रही है, धीरे धीरे इसके संचालकों में मीडिया से लाभ कमाने की प्रवृत्ति बढ़ती गई. जिसके कारण मुखर पत्रकारों पर संपादक का अंकुश और संपादकों पर विज्ञापन विभाग का अंकुश गहराता गया. सूचनायें प्रभावित होने लगी और लोकतंत्र के तथाकथित चौथे स्तंभ की निष्पक्षता संदिग्ध होती रही. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता स्वतंत्र भारत में भी अकुलाती, छटपटाती रही. सोशल मीडिया इसी अकुलाहट का परिणाम है. इसी कारण इसका तेजी से विकास हुआ, देखते ही देखते इसने मीडिया की परिभाषा बदल दी. पहले गिने चुनें उंगलियों में गिने जा सकने वाले पत्रकार होते थे आज आप सब पत्रकार हैं.

पूरी दुनिया में बदलाव की बयार लाती इस सोशल मीडिया पर चर्चा करने के पहले हमें प्रदेश के सोशल मीडिया के आरंभिक समय के संबंध में चर्चा कर लेना भी वर्तमान समय में आवश्यक है. हम इंटरनेट विश्व में सोशल मीडिया के विकास का क्रम क्या रहा इसके संबंध में बिना कुछ कहे हम छत्तीसगढ़ के सोशल मीडिया पर चर्चा करना चाह रहे हैं. आरंभिक समय में छत्तीसगढ़ में सोशल मीडिया का आगाज तीन दिशा से या कहें तीन माध्यमों से हुआ, याहू ग्रुप, आरकुट और ब्लॉग. यह समय इंटरनेट के सीमित प्रयोक्ताओं का समय था किन्तु इस समय में समाज के एलीट कहे जाने वाले लोग, मीडियाकर्मी, प्रशासनिक उच्चाधिकारी आदि इसमें सक्रिय रहे. प्रायः सभी के ई मेल का माध्यम याहू रहा और याहू नें जब अपने सदस्यों के बीच समूह वार्ता का विकल्प आरंभ किया तब सीजीनेट नें एक ग्रुप बनाया और छत्तीसगढ़ से संबंधित मसलों पर सदस्यों के बीच विमर्श का प्लेटफार्म तैयार किया. इस ग्रुप के माध्यम से जमीनी सूचनायें भी बाहर आने लगी, गंभीर विमर्श के दौर का आरंभ हुआ. छत्तीसगढ़ में यह नागरिक मीडिया का आगाज था. सुभ्राशु चौधरी नें इसी समय में बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में यात्रायें की और उनके रपट दैनिक छत्तीसगढ़ में प्रकाशित हुए जिस पर इस ग्रुप में भी बहसें हुई. इस पर विस्तार से फिर कभी.

धीरे धीरे याहू ग्रुप में छत्तीसगढ़ से संबंधित या छत्तीसगढ़ के लोगों के द्वारा समूह बनाये गए एवं समूह चर्चा होने लगी, अभिव्यक्ति मुखर होने लगी. किन्तु याहू ग्रुप की सीमाओं के कारण लोगों को लगने लगा कि चर्चा और सूचनायें समूह सदस्यों तक ही सीमित हैं उसका विस्तार नहीं हो पा रहा है. ऐसे समय में गूगल का सोशल नेटवर्किंग साईट आरकुट अपने चरम पर था. रायपुर से अमित जोगी एवं पत्रकार संजीत त्रिपाठी जैसे लोग यहॉं सक्रिय थे. लोगों को जब लगने लगा कि हम सूचनायें एवं अभिव्यक्ति यहां सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत कर सकते हैं तो आरकुट के वाल एवं ग्रुपों में सूचनायें एवं अभिव्यक्ति प्रस्तुत होने लगी. आरकुट नें सोशल मीडिया के लोकतंत्र को बढ़ावा दिया, आम खास सब यहां आ गए. जमीनी सूचनायें यहां आने लगी, खासकर बस्तर के गांवों से, कस्बों से हकीकत सामने आने लगी.

शब्दों और प्रस्तुतिकरण की सीमायें जब आरकुट में नजर आने लगी तो तीसरा प्रवाह अपने चरम पर समानांतर बहने लगा. यह था ब्लॉग, छत्तीसगढ़ के चर्चित ब्‍लॉगों में अमित जोगी का अंग्रेजी ब्लॉग था. बाद में जय प्रकाश मानस नें हिन्दी ब्लाॅगों का अलख जगाया. संजीत त्रिपाठी एवं बी.एस.पाबला हिन्दी ब्‍लॉगों में सक्रिय हुए. इसी समय में मैंनें भी हिन्दी ब्लॉग आरंभ को आरंभ किया. यह वह समय था जब पूरे विश्व में हिन्दी लॉगों की संख्या कुछ सैकड़ों की थी जिसमें से सक्रिय ब्लॉगरों में हम कुछ लोग छत्तीसगढ़ के भी थे. जिनकी बातें अब दूर दूर तक एवं प्रभावी रूप से पहुच रही थी. परम स्वतंत्र अभिव्यक्ति के माध्यम इन हिन्दी ब्लाॅगों की लोकप्रियता नें बाद के समय में छत्तीसगढ़ के अनेक बुद्धिजीवी, साहित्यकार एवं पत्रकारों को अपने पास बुलाया जिसमें से अनिल पुसदकर जी, गिरीश पंकज जी जैसे वरिष्ठ पत्रकार भी थे और ललित शर्मा जी जैसे यायावर भी. जिन्होंनें छत्तीसगढ़ को ब्लॉगरगढ़ का नाम दिलाया.

इसी समय छत्तीसगढ़ के सोसल मीडिया में उल्लेखनीय कार्य हुए. तत्कालीन परिस्थितियां में छत्तीसगढ़ में लगातार नक्सल हिंसा का दौर चल रहा था और सरकार इससे निपटने के लिए लगातार दबाव बना रही थी. दिल्ली में और विदेशों में बैठे पारंपरिक मीडिया के लोग छत्तीसगढ़ सरकार की जमकर आलोचना कर रहे थे. साथ साथ छत्तीसगढ़ के पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और सोशल मीडिया में सक्रिय लोगों पर सरकार के पिछलग्गु होने का आरोप लगा रहे थे. इसी समय में आक्रामक रूप से लगातार तथ्यों के साथ पोस्ट पर पोस्ट लिखते हुए अनिल पुसदकर, कमल शुक्ला, राजीव रंजन प्रसाद, संजीत त्रिपाठी, रमेश शर्मा आदि नें छद्म प्रचार को रोका और हालात को स्पष्टत किया. क्योंकि हम यहां के हालात से वाकिफ थे इसलिए हम लोगों नें भी वही लिखा जो सहीं था. मैं यह नहीं जानता कि इस मसले पर छत्तीसगढ़ के ब्लॉतगों का क्या असर हुआ किन्तु एसी कमरों में बैठकर बस्तर पर रिपोर्टिं करने वालों के जड़ों पर प्रहार अवश्य हुआ.

आज का समय फेसबुक ट्विटर और व्हाट्स एप का है. इसके शोर नें कंगूरों को भुला दिया है. वह भी एक समय था जब सीजीनेट के इसी तरह के मिलन कार्यक्रमों में लोग अमरीका से भी दौड़े चले आते थे. देश में धारा 66 ए, साईबर एक्ट के तहत पहली शिकायत यहां के ब्लॉग बिगुल को आधार मानते हुए दर्ज की गई उसके बाद दूसरे हिस्सों पर दर्ज हुई और हल्ला हुआ मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुचा.

IRIS व ज्ञान फाउंडेशन नें पिछले लोकसभा चुनाव में बताया था कि देश के 543 लोकसभा सीटों में से 160 सीटों को सोशल मीडिया प्रभावित करेगी. राज्यों के लोकसभा सीटों के संबंध में शोध सर्वेक्षण का खुलाशा करते हुए संस्था नें कहा था कि छत्तीसगढ़ में भी सोशल मीडिया चार सीटों के नतीजों को प्रभावित करेगी. यह आप सबके ताकत का प्रमाण है, कौन कौन से सीट प्रभावित हुए इसकी जानकारी नहीं मिल पाई किन्तु इतना तो सिद्ध हुआ कि छत्तीसगढ़ के सोशल मीडिया में दम है.

छत्तीसगढ़ के सोशल मीडिया में सक्रिय संगवारी ग्रुप के द्वारा पिछले वर्शों से लगातार उल्लेखनीय कार्य किया जा रहा है. ग्रुप के सदस्य प्रदेश की समस्या, अस्मिता, साहित्य, कला और संस्कृति पर चर्चा कर रहे हैं. जिससे जागरूकता पैदा हो रही है और मुद्दे किसी ना किसी माध्यम से सरकार के कानों तक पहुच रही है. सोशल मीडिया की वैचारिक प्रतिबद्धता का उदाहरण देखिये कि नक्सल fहंसा के विरोध स्वरूप संगवारी के मित्र नक्सल गढ़ में दण्डकारण्ड पद यात्रा आयोजित करते हैं और देश की पारंपरिक मीडिया इनके साहस के किस्से छापती है. इसी तरह अन्य कई उदाहरण है जो सोशल मीडिया के प्रभाव से उठाए गए और बदलाव आया. अहफाज रशीद भाई अपने फेसबुक स्टेट्स के बलबूते पर शेख हुसैन जी के बीमारी के समय संस्कृति मंत्री को उनके बिस्तर तक ले आते हैं. नवीन तिवारी भाई के फेसबुक स्टेट्स से स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों की ड्यूटी शेड्यूल बदल दी जाती है. डॉ.शिवाकांत बाजपेई के डमरू उत्खनन के खुदाई में प्राप्त वस्तुओं का कालक्रम के संबंध में बहुत कम समय में जानकारी प्राप्त हो जाती है.

सोशल मीडिया नें हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है जिसका अर्थ उत्श्रृंखलता, अराजकता और अर्मयादित व्यवहार कतई नहीं है. हमें अपने नागरिक कर्तव्य समझने होगें. कल ही मेरे द्वारा एक स्टेट्स में दांयें बायें लिखने में हुई छोटी सी भूल बड़ी भूल बन गई और मुझे एक सम्माननीय श्री से डांट खानी पड़ी. मुख्यतया हमारा जो दायित्व बनता है वह है -

1. अफवाह को बढ़ावा न दें, ऐसे सूचनाओं की पड़ताल करें, तत्काल रोकें और प्रतिरोध दर्ज करायें, चुप ना बैठें.
2. चरित्र हनन व व्यक्तिगत आरोप न हो, स्वस्थ विमर्श करें. इस संबंध में पंकज कुमार झा का प्रयास मुझे अच्छा लगता है.
3. मुद्दों को भटकायें मत, बल्कि समाधान देने का प्रयास करें. प्रायः यह देखा जाता है कि कुछ विशेश वर्ग के लोग मुद्दों को अपने स्वार्थ के लिए बाकायदा हैक कर लेते हैं. जिससे मुद्दा अपने उद्देश्य से भटक जाता है ऐसे में मुद्दों को राह में लाईये.
4. आपराधिक गतिविधियों, कापीराईट उलंघनों का भी विरोध करें. दूसरों के स्टेट्स अपनी बौfद्ध्कता प्रदर्शन के लिए कापी पेस्ट ना करें बल्कि शेयर करें.
5. सूचना का प्रसार करें जैसे रोजगार, कानून, सेवा.
6. सृजनशीलता को बढ़ावा दें. कला साहित्य संस्कृति व भाषा से संबंधित अपने ज्ञान को बांटें.
7. किसी को ब्लाक कर उसकी शिकायत करने के बजाए आलोचना करें, विचार करें कि माध्यम दोषी है या मानसिकता.
8. इसके अतिरिक्त यह सही है कि सरकारी मशीनरी पर हमारा विश्वास उठ गया है फिर भी हम देख रहे हैं कि पुलिस, प्रशासन के ग्रुप और पेज पर हमारे लाईक बढ़ते ही जा रहे हैं. हम वहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाह रहे हैं ताकि हम उन्हें वाच कर सके. यह हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति है इसे बरकार रखे.
9. आदि इत्‍यादि 

विकास की ओर अग्रसर छत्तीसगढ़ के समक्ष जो चुनौतियां है वहीं सोशल मीडिया की भी चुनौती है. हमें यहॉं विकास के रास्तों का उल्लेख करना है. भ्रष्टाेचार, जमाखोरी, हिंसा के विरोध में माहौल बनाना है. जनता की खुशहाली एवं उन्नति के रास्तों को प्रशस्त करना है.

लंदन में पिछले वर्ष हुए आफ्टर द राईट्स के दंगों के संबंध में आप सब नें सुना होगा. लोगों नें कहा कि यह सोशल मीडिया की कारस्तानी है. ब्रिटैन सरकार के द्वारा जांच कराया गया. इंटरनेट में आफ्टर द राईट्स के लगभग 100 पन्नो की रिपोर्ट आपको मिल जायेगी. पूरे रिपोर्ट में कहीं भी सोशल मीडिया को दोश नहीं दिया गया है. जबकि इसके उलट भारत में तत्काल दोष मढ़े जाते हैं, अपराधी की खोज चालू हो जाती है वो इसलिए कि सरकारी तंत्र की नाकामी छिप जाए. मैं मानता हूं कि कुछ प्रतिशत कचरा यहां भी है किन्तु जनसंख्या के हिसाब से उनका प्रतिशत कुछ भी नहीं है यदि आप जागरूक हैं तो ऐसे कचरों को साफ किया जा सकता है. हमें लोकतंत्र के चौथे खम्बे का दायित्व निभाते हुए काम करते रहना है. संगवारी ग्रुप के द्वारा किए जा रहे ऐसे ही रचनात्मक कार्यों को मेरा सलाम, जय भारत, जय छत्तीसगढ़.

- संजीव तिवारी

इस विषय पर परिचर्चा का असयोजन संगवारी समूह नें किया था. कार्यक्रम के उपरांत भाई गिरीश मिश्र जी नें अपने फेसबुक वाल पर जो लिखा 'सोशल मीडिया और छात्तीसगढ़ को लेकर 'संगवारी समूह' के आयोजन से अभी -अभी लौटा हूँ. मैंने कहा, कि यहाँ के लोग सोशल मीडिया का रचनात्मक इस्तेमाल करे और देश -दुनिया में छत्तीसगढ़ की बेहतर छवि बनाये। सुभाष मिश्र, राजीव रंजन प्रसाद, शुभ्र चौधरी, संजीव तिवारी, मुकुंद कौशल और कुछ अन्य वक्ताओं ने अपने-अपने महत्वपूर्ण विचार रखे.सबके नाम मुझे याद नहीं आ रहे हैं, अनेक लोगो से पहली बार मिलना और उनके विचार सुनना अच्छा लगा. आयोजक गिरीश मिश्र मुम्बई में रहते हैं, रायपुर के मूल निवासी है.मगर बार-बार छत्तीसगढ़ आ कर हर बार किसी नए विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन करते है. यही है अपनी जड़ो से जुड़े रहना.' उसकी एक कड़ी यह भी है -


कार्यक्रम के संबंध में अतिरिक्‍त जानकारी एवं प्रतिक्रया आप संगवारी समूह में यहॉं देख सकते हैं.

14 June, 2014

लोक साहित्य में लोकप्रतिरोध के स्वर’ के संदर्भ में

यह लोककथा छत्तीसगढ़ में कही जाती है।

एक राजा था। (लोक में बड़ा जमीदार भी राजा ही होता है।) नौकरों या सेवकों की नियुक्ति वह अपने शर्तों पर करता था। उसी राज्य में दो भाई रहते थे। वे बहुत गरीब थे। बड़ा भाई बहुत भोला और सीधा-सादा था। लोग उसे सिधवा कहते थे। छोटा भाई बुद्धिमान और चतुर था। वह खड़बाज के नाम से प्रसिद्ध था। बड़ा भाई सिधवा राजा के यहाँ नौकर हो गया। नियुक्ति के समय राजा की शर्तों में ये शर्तें भी थी -

’सुबह-शाम केवल एक-एक पत्तल में, जो पाँच पत्तों का बना होगा, भोजन दिया जायगा। भोजन की मात्रा उतनी ही होगी जितना पत्तल में आ सके। शर्तों का उल्लंघन करने पर या नियत अवधि से पूर्व नौकरी छोड़ने पर चेथी का मांस देना होगा।’

लोक कथाकार कहते हैं - सिधवा को भोजन परोसने के लिए राजा बबूल की पत्तियों से पत्तल बनवाता था। काम बेहिसाब लिया जाता था। जल्द ही बड़ा भाई सिधवा निर्बल और बीमार हो गया। जान है तो जहान है; उसने चेथी का मांस देकर अपनी जान बचाई।

सिधवा किसी तरह घर लौटा। खड़बाज ने बड़े भाई की दुर्गति देखी। राजा के इस अन्याय, छल और धूर्ततापूर्ण व्यवहार के कारण उसका खून खौलने लगा। उसके दिल में प्रतिशोध की आग दहकने लगी। उसे जल्द ही मौका भी मिल गया, जब राजा ने मुनादी कराई कि महल के लिए एक नौकर की सख्त जरूरत है।

राजा ने फिर वही शर्तें रखी जो सिधवा के समय रखी गई थी। खड़बाज ने कहा - महाराज! मेरी भी शर्त है। पत्तल मैं अपनी इच्छानुसार बनाऊँगा और भोजन मेरी रूचि का होना चाहिए। राजा को नौकर की सख्त जरूरत थी। उसने शर्तें मान ली।

भोजन के लिए खड़बाज ने पुराइन के पाँच पत्तों को जोड़कर एक पत्तल बनाया। पुराइन का पत्ता अपने आप में ही एक पत्तल के आकार का होता है। पाँच पत्तों को जोड़कर बनाये गए उस पत्तल का आकार बहुत बड़ा था। उसने पत्तल भरकर भोजन लिया। जितना खा सकता था खाया, बाकी को जनवरों के आगे डाल दिया। इससे किसी शर्त का उल्लंघन नहीं होता था, अतः राजा इसका विरोध नहीं कर सका। शर्त में काम के बारे में भी कुछ नहीं कहा गया था; अतः खड़बाज हर काम अपनी मर्जी से करता था। भरपेट खाता और चैन की नींद सोता था। खड़बाज की हरकतों से राजा को कई तरह से नुकसान होने लगी। राजा अब और अधिक नुकसान सहने की स्थिति में नहीं था लेकिन वह कर भी क्या सकता था? खड़बाज को नौकरी से हटाने का मतलब अपने चेथी का मांस देना था।

खड़बाज की हरकतों से राजा को अपार जन-धन की हानि होती है। उसकी प्रतिष्ठा और मान-सम्मान धूमिल होता है। पर खड़बाज को नौकरी से हटाने का मतलब था अपने चेथी का मांस देना। राजा के लिए ऐसा करना संभव न था।

राजा अब खड़बाज के नाम से थर्राने लगा था। अंततः वह रानी सहित गुप्त रूप से अपनी बेटी के घर पलायन करने की योजना बनाता है। खड़बाज को राजा की योजना का पता चल जाता है और वह उस झांपी के अंदर छिपकर बैठ जाता है जिसे रानी ने यात्रा के लिए जरूरी सामानों के साथ तैयार किया था।

बेटी के घर पहुँचकर भी खड़बाज की हरकते जारी रहती हैं। अंत में बेटी की समझाइश पर राजा अपने चेथी का मांस देकर खड़बाज से छुटकारा पाता है।
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इस लोककथा में राजा को सताने और उसका नुकसान करने के लिए खड़बाज कई तरह के मनोरंजक और हास्यास्पद काम करता है। बहुत सी हरकतें जुगुप्सा पैदा करने वाली भी होती है। उनकी हरकतों से खूब हास्य पैदा होता है। राजा की बेबसता और उनका मानमर्दन होने से श्रोताओं की आत्मतुष्टि होती है। उनका खूब मनोरंजन होता है। खड़बाज श्रोताओं की कल्पना का नायक बन जाता है। लोक कथाकार अपनी कल्पना से इन हरकतों का सृजन करता है। इस समय खड़बाज स्वयं लोक कथाकार के अंदर साकार हो उठता है और दोनों में तादात्म्य स्थापित हो जाता है।

निहित लोक प्रतिकार और लोकप्रतिरोध के स्वर को स्वयं शोषक भी नहीं समझ पाता है। यही यह लोककथा केवल हास्य और मनोरंजन के लिए ही नहीं रची गई होगी। इसकी रचना शोषण और अपमान से ग्रस्त किसी खड़बाज ने ही शोषकों के विरूद्ध अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए किया होगा। समाज के ऐसे सारे खड़बाज अपनी परिथितिजन्य असहायता और मजबूरी की वजह से शोषकों के विरूद्ध प्रत्यक्ष लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं होते हैं। विकल्पहीन खड़बाजों के लिए अपने मन की पीड़ा, प्रतिरोध और प्रतिशोध को व्यक्त करने के लिए लोक साहित्य की विभिन्न विधाओं के अलावा और क्या बचता है? वे इसी का आश्रय लेते है। यही लोक का प्रतिरोध है, लोक प्रतिरोध के स्वर हैं। लोक प्रतिरोध के लिए लोकसाहित्य में रची गई घटनाएँ और बिंब इतने प्रतीकात्मक और इतने कलात्मक होते हैं कि ये लोककथाएँ (लोकसाहित्य) शोषकों के बीच भी उतने ही लोकप्रिय होते हैं। इन लोककथाओं का श्रवण अथवा कथन करते समय स्वयं शोषक वर्ग भी हास्य और मनोरंजन से सराबोर हो जाता है। ऐसे लोकसाहित्य का रसास्वादन करते हुए इसलोक के प्रतिरोध और प्रतिकार की सफलता है। ऊपरी तौर पर ऐसे लोक साहित्यों का प्रमुख लक्ष्य केवल मनोरंजन ही प्रतीत होता है। ऐसा प्रतीत होना लोकसाहित्य, असकी भाषा और उसकी शैली का चमत्कार नहीं तो और कया है? जरूर इसे लोक का निष्क्रिय प्रतिरोध ही माना जायेगा, पर लोक के इस प्रतिरोध को खारिज कर पाना संभव नहीं है।

आदरणीय विज्ञजन! इसी तरह का कोई और लोक साहित्य आपके पास, आपके आस-पास भी उपलब्ध हागा। साकेत साहित्य परिषद सुरगी आपसे विनम्र अनुरोध करता है कि इसका संकलन कर आप हमें निम्न पते पर प्रेषित करें। ’साकेत स्मारिका 2015’ का प्रकाशन (संभवतः फरवरी-मार्च 2015) में किया जायेगा।

रचना इस पते पर भेजें - kubersinghsahu@gmail.com

’साकेत स्मारिका’ पूर्णतः अव्यवसायिक पत्रिका है अतः इसकी प्रकाशित प्रति के अलावा अन्य पारिश्रमिक देना संभव नहीं होगा।

निवेदक
कुबेर
संरक्षक,साकेत साहित्य परिषद सुरगी, जिला राजनांदगाँव.

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