ब्लॉग छत्तीसगढ़

13 April, 2018

छत्‍तीसगढ़ के पारंपरिक लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ संगोष्‍ठी

17 एवं 18 फरवरी 2018 को आयोजित कार्यक्रम की रिर्पोटिंग

दूध मोंगरा छत्तीसगढ़ी सांस्कृति समिति, गंडई, जिला राजनांदगांव छग. द्वारा दिनांक 17 एवं 18 फरवरी 2018 को शिक्षक शिक्षा महाविद्यालय शंकर नगर, रायपुर के सभागार में राज्य स्तरीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय था- ‘छत्‍तीसगढ़ के पारंपरिक लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ’ संगोष्ठी अपने निधार्रित समय प्रातः 10.30 बजे प्रारंभ हुई। उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि माननीय डॉ. सियाराम साहू अध्यक्ष पिछड़ा वर्ग आयोग छ.ग. थे। काय र्क्रम की अध्यक्षता डॉ. सोमनाथ यादव भूतपूर्व अध्यक्ष छ.ग. राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र, अध्यक्ष बख्शीसृजन पीठ छ.ग., श्री राहुल सिंह जी पुरातत्व विभाग छ.ग., श्री योगेश शिवहरे प्राचार्य शा.शिक्षा महाविद्यालय, रायपुर और डाइर्ट के प्राचार्य श्री आर.के. वर्मा जी मंच पर उपस्थित थे। मंच संचालन श्री बलदाऊराम साहू सचवि पिछड़ा वर्ग आयोग छ.ग. ने किया। अतिथियों के स्वागत काय र्क्रम पश्चात स्वागत भाषण करते हुए श्री पीसी लाल यादव (अध्यक्ष दूधमोंगरा समिति) ने बताया कि गंडई राजनांदगांव के इस समिति को 41 वर्ष हो गए हैं। इसको लम्बे समय तक जिन्दा रखना कठिन काम है, दूध मोंगरा में चार पीढ़ी के कलाकार हैं। इस स्वागत भाषण और संक्षिप्त परिचय उपरान्त दूधमोंगरा सांस्कृति समिति के कलाकारों द्वारा मधुर गीतों के माध्यम से अतिथ्यिं का स्वागत किया। गीत के बोल थे -
‘पहुना पधारे हे द्वार, हम गाएँ  मंगलचार विधुन हागे मनवा रे, मगन हागे मनवा रे।’ टेकऽ
इस संगोष्ठी में दिल्ली से मो. मुस्तफा खान, बस्तर से श्री रूद्रनारायण पाणीग्रही और सरगुजा से श्री मोहन साहू की विशेष उपस्थिति रही। इस तरह राज्य के सभी क्षेत्रों का समुचित प्रतिभागिता रही। संगोष्ठी में पुरातत्व विभाग छ.ग. से आए हुए विशिष्ट अतिथि ने उद्बोधन में कहा कि ‘लोकगीतों में रस छूट रहा है और सामाजिक संदर्भ भारी हो रहा है। यदि ऐसा हुआ तो लोकगीतों का स्वाभाविकता नष्ट हो जाएगी। आज लोकगीत पी.एच.डी. का विषय बन रहा है। लोकगीत तो रस भरे दूहना है, इसका कहॉं-कहॉं बाँट सकते हैं यह विचारणीय प्रश्न है।’

डॉ. योगेश शिवहरे ने कहा कि- लोक शिक्षण में इसका उपयोग होना चाहिए। इसके पश्चात डॉ. बलदाऊ राम साहू रचित गजल संग्रह- ‘सुरूज नवा उगइया हे’ का विमोचन किया गया। इस पर चर्चा करते हुए भाषाविद् डॉ. चितरंजन कर ने बताया कि इस गजल संग्रह में ग़ज़ल हैं। आशिका व मासूका का विवरण न हो कर वर्तमान को बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किया गया। डॉ. प्रभंजन शास्त्री व रामेश्वर वैष्णव ने ग़ज़ल विधा को छ.ग. में नई ऊंचाईयां दी है, परवान चढ़ाया है। इसी कड़ी में बलदाऊ राम साहू जी ने प्रयास किया है। इन ग़ज़लों में सरलता है, तरलता है, निश्छलता है। समकालीन छ.ग. का पूरा परिदृश्य इन ग़ज़लों में है। उन्होंने एक ग़ज़ल को उद्घृत
किया-
‘स्कूल सब व्यापारी हांगे, ला इलाज बिमारी हांगे।’
मुख्य अतिथि- डॉ. सियाराम साहू ने अपने उद्बोधन में कहा कि विविधता में एकता छ.ग. की विशेषता है। लोकगीतों में लोक जीवन के सर्वांगीण क्षणों की अभिव्यक्ति है, छ.ग. के लोकगीत रसों से भरपूर हैं। इसके बाद 15 मिनट का लघु विश्राम जलपान उपरान्त 12.30 बजे संगोष्ठी का विमर्श सत्र प्रारंभ हुआ। सत्र की अध्यक्षता डॉ. चितरंजन कर ने की। मंच पर डॉ. सोमनाथ यादव, डॉ. अशोक तिवारी, डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र, डॉ. जीवन यदु, डॉ. पी.सी. लाल यादव, डॉ. महेन्द्र मिश्रा, डॉ. गोरेलाल चंदेल, डॉ. अरुण निगम जी उपस्थित रहे। डॉ. रमेन्द्र नाथ मिश्र ने संदर्भित विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सर्वप्रथम डॉ. हीरालाल काव्योपाध्याय ने लोकगाथा, लोकगीत को अपने व्याकरण में लाया। लोकगीतों में हमारा इतिहास, हमारी संस्कृति, हमारा समाज छुपा है। इसके पश्चात दूध मोंगरा समिति के लोक कलाकारों द्वारा गाथा गीत ‘भरथरी’ की मनमोहर प्रस्तुति दी गई।
डॉ. जीवन यदु ने ‘छत्‍तीसगढ़ी लोकगीतों में सामाजिक संदर्भों के बिम्ब’ विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हमारी संस्कृति की जड़ में एक आत्मीयता है, यही सामाजिक संबंधों को जन्म देती है। रिस्तों की डोर में हम बंध जाते हैं। लोकगीतों में रागी कहता है ‘काका’। इसी तरह लोकगीतों में ‘भैया’ शब्द बहुत आया है. यह संबोधन हमारे रिश्तों से आया है, संस्कार से आया है। लोकगीतों का प्रकार बताते हुए उन्होंने कहा कि लोकगीत मुख्यतः दो प्रकार के हैं - 1. जातीय स्तर पर केन्द्रित गीत, 2. सम्पूर्ण समाज को लेकर चलने वाला लोकगीत उदाहरणार्थ- बांसगीत, राऊत समाज, देवार गीत-इसमें देवार जाति का चरित्र खुलकर सामने आता है। ‘दशमत कैना’ गीत। इसमें लोक गायक इतना क्रियाशील होता है कि वह स्वयं रचनाकार हो जाता है। सामाजिकता की बात तब आती है जब पारिवारिकता होती है।
पारिवारिकता के संदर्भ अनेक लोकगीतों में आया है, जैसे - 
साजा सुखागे सरई बिना ओ, देवार सूखागे भाजाई बिना ओ।
सामाजिकता की बात ‘भड़ानी गीत’ में आती है, उदा.-
सब पारा जावे फेर तेलीनपारा झन जाबे ओ, तेली छाकरा मदन माहनी, ताला घानी मं राखे लोभाय ।।
लोक समाज में एक संबंध जाति धर्म से ऊँचा हाता है। गंगाजल, गजामूंग, महाप्रसाद, मितान, सखी बद लिया जाता है।
गाड़ा में संगी ठांका ले पटिया, गंगा
बाबू आवत हे बिछा ले खटिया ।
वहीं पर यह भी कहा जाता है।
सान के हे लाटा, साने के खटिया,
मार गंगा बाबू आवथे, बिछा ले खटिया ।।
यह सामाजिक संबंध पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। एक सामाजिक संबंध मनुष्यता को पारकर के निकल जाती है जैसे सुआगीत में बिरही नायिका सुआ से कहती है -
तार अंगना में चारा बंधाले,
ये तुलसा ल लेबे लगाय।।
डॉ. पीसी लाल यादव ने पंडवानी का सामाजिक संदर्भ बतलाते हुए कहा कि पंडवानी दो शैलियों में गायी जाती है- 1. वेदमति शैली, 2. कापालिक शैली। पंडवानी में लोक दृष्टि समायी हुई है। विवाह मंडप में मंगलकाष्ठ गड़ा होता है, जिसे ‘मंगरोहन’ कहा जाता है, यह गूलर की लकड़ी का बना होता है। यह महाभारत काल से चला आ रहा है। गांधारी का विवाह पहले गूलर वृक्ष (डूमर वृक्ष) से किया गया था। वह परंपरा आज भी जीवित है। इससे विवाह में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं आता । जब लाखा महल जलाया गया था वहां एक तेली का निवास था, वह उस वक्त घानी चला रहा था, लाखा महल के जलने से वह वहाँ से भागा, उस दिन से वह ‘रंगहा तेली’ हो गया। रंगहा तेली की पत्नी एक हाथ में रांगा पहनती है और एक हाथ में चूड़ी पहनती है। इस तरह का सामाजिक संदर्भ है।
अरुण निगम ने ‘दशमत कैना’ की लोकगाथा का सामाजिक संदर्भ विषय पर विचार व्यक्त करते हुए बताया कि 09 लाख उडिया स्त्री पुरुष तालाब खोदने चम्पक भांठा दुर्ग आए थे उन्हीं में से दशमत नाम की अत्यन्त सुदर कन्या थी, उस पर राजा मोहित होकर उससे विवाह करना चाहता है। राजा महानदेव ब्राह्मण था, कन्या अछूत थी । उन्होंने कथा के माध्यम से छत्‍तीसगढ़ में गाये जाने वाले इस लोकगाथा का सामाजिक संदर्भ को स्पष्ट किया। डॉ. सोमनाथ यादव ने बांस गीत का सामाजिक संदर्भ बतलाते हुए कहा कि बांस गीतों में मुक्त और प्रबंध काव्यात्मक गीत गाए जाते  हैं। प्रबंध कथागीत कई महीनों तक चलते हैं। यह चरवाहा संस्कृति की देन है, इसमें शौर्य, वीरता, पराक्रम, प्रेम-विरह, नीति, उपदेश इत्यादि कई प्रकार के गीत मिलते हैं।
डॉ. महेन्द्र मिश्र जी ने कहा कि उड़ीसा और छ.ग. का संपर्क राजनीतिक नहीं सांस्कृति है। 400 साल पूर्व का बिंद्रानवागढ़ का राजा कचना धु्रवा शिव पावर्ती बनकर पूजा पा रहा है। ये गोड़ राजा था। भारतीय संस्कृति की चर्चा करते हुए उन्होंने बतलाया कि कुलाचार, लोकाचार, देशाचार और शिष्टाचार इस प्रकार चार प्रकार की संस्कृति है- कुलाचार (जातीय संस्कृति) लोकाचार में क्षेत्रीयता या आंचलिकता, देशाचार पूरे भारत भर में और शिष्टाचार संस्कृति में ज्यादा होता है। 1980-90 के दशक से भारत में पाश्चात्य संस्कृति का आगमन हुआ है। उड़ीसा के दक्षणि क्षेत्र में मिट्टी खोदने वाली जाति को ‘कलिंगा’ कहा जाता है इन्हें ‘ओड़ो’ भी कहा जाता है। इसी ओड़ो से उड़ीसा हुआ। नुआपाड़ा जिले में छत्‍तीसगढ़ी बोलने वाले लोग हैं। सीमावर्ती क्षेत्र में दोनों संस्कृतियों सुन्दर समन्वय देखा जाता है।
इस दिवस विमर्श के द्वितीय सत्र में डॉ. चितरंजन कर ने लोकगीतों के वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर बात की, डॉ. बिहारीलाल साहू ने छत्‍तीसगढ़ी लोकगीतों के अस्तित्व पर चर्चा की और डॉ. गोरेलाल चंदेल ने ‘ददरिया’ लोकगीत के सौंदर्य पक्ष पर प्रकाश डाला तत्पश्चात लोक कलाकारों द्वारा एक लोक भजन प्रस्तुत किया गया। श्री सीताराम साहू श्याम ने लोकगीतों का आध्यात्मिक पक्ष पर चर्चा करते हुए अनेक लोक भजन सुनाए और उनकी व्याख्या भी की। श्री कुबेर साहू जी ने लोकगीतों में आकांक्षा की अभिव्यक्ति पर चर्चा की।
इसी कड़ी में डॉ. स्वामीराम बंजारे ने छ.ग. के पारम्परिक लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ बतलाते हुए कहा कि लोकगीत जन जीवन का उल्लास और उच्छवास है, यह आदिम युग से चली आ रही है। यह भाषागत नहीं भावगत होते हैं। उन्होंने सोहरगीत, भोजली गीत, सुआगीत, पंथीगीत के कई उदाहरण देकर लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ को रेखांकित किया।
उसके पश्चात् लोक कलाकार श्रीमती प्रभा यादव का मंच पर सम्मान किया गया, इसके बाद श्री नवरतन साव ने बस्तर में प्रचलित मंत्र गीतों का सामाजिक संदर्भ बतलाया। अंत में मंचस्थ इन सभी वक्ताओं को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित कियागया।
भोजनावकाश के उपरान्त तृतीय सत्र 3.15 बजे प्रांरभ हुआ। श्रीमती शैल चन्द्रा ने गोदना प्रथा, गोदनागीत, ददरिया गीत का मर्म बतलाया और कहा कि लोकगीत परम्परा के संरक्षण पर विद्वान गण चिंतन करें। श्रीमती सरला शर्मा ने लोरी गीत, सुआगीत का संदर्भ बतलाते हुए कहा कि सुआ गीत में किसी वाद्य यंत्र का प्रयोग नहीं होता। इसके मध्य में हीरामन तोता होता है जो परमात्मा का प्रतीक है शेष पांच सुआ पांच ज्ञानेन्द्रियों और पांच कमेर्न्द्रियों का प्रतीक है। श्री वीरेन्द्र सरल ने व्यंग्य गीत पर चर्चा करते हुए कहा कि व्यंग्य गीत पीड़ा का प्रतीकारात्मक अभिव्यक्ति है। इसमें प्रतिरोध के कई स्वर मुखरित होते हैं। श्रीमती शकुन्तला ‘तरार’ ने हल्बी के संस्कार गीतों में लोकरंजन के तत्व विषय पर चर्चा करते हुए जगार गीत, चखना गीत, शोक गीत के बारे में बतलाया। बस्तर में विवाह के समय हल्दी कूटने की प्रथा है। बस्तर की महलिएँ मानियाघर याने विवाह वाले घर जाकर हल्दी कूटती हैं और गीत गाती हैं। शोक गीत में महिलाएं रात-रात भर गाती हैं और श्मशान घाट तक जाती हैं। कवि श्री डूमनलाल धु्रव ने गोंड़ जनजातियों द्वारा गाए जाने वाले गीतों के विषय में बतलाया साथ ही देवारी गीत प्रस्तुत किए अन्त में इन सभी वक्ताओं को स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया गया। इस तरह प्रथम दिवस का संगोष्ठी कायर्क्रम रात 7.30 बजे तक अनवरत चलता रहा।

द्वितीय दिवस 18 फरवरी 2018 को संगोष्ठी कायर्क्रम
निर्धारित समय 10.30 बजे प्रारंभ हुआ. मंचस्थ वक्ताओं में श्री राहुल सिंह पुरातत्व विभाग छ.ग., डॉ. महेन्द्र मिश्र, डॉ दादूलाल जोशी, डॉ. रचना मिश्र, डॉ. नरसी यादव, डॉ. संध्या भोई थे। डॉ. जोशी जी ने पंथी लोकगीतों में सामाजिक चेतना व संदर्भ को रेखांकित किया वहीं बौद्ध संदेश धर्माश्रित व आज अर्थाश्रित होता चला गया है। डॉ. रचना मिश्र ने विवाह व ददरिया लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ बतलाया। डॉ. संध्या भोई ने कहा कि मैंने लगभग 200 लोकगीतों का संग्रह किया है। सुआ गीत स्त्री प्रधान है। इसमें स्त्रियों की पराधीनता की पीड़ा की अभिव्यक्ति है। डॉ. नरसी यादव जी ने कुछ सामान्य बातें बतलायी। व्यक्तिगत परिचयात्मक अभिव्यक्ति की। दूध मोंगरा के लोक कलाकारों ने कर्मा गीत की मनमोहक प्रस्तुति दी-
डांगरी पहाड़े जाबा, महुआ बीने ल जाबा, तेंदू अऊ चार खाबो,
चला-चला डांगरी पहाड़े जाबा न ।
डार मं बैठे-बैठे काइेर्ली गावत हावय गाना, चलै पुरवाही झुलै डारा पाना ।।
डॉ. महेन्द्र मिश्र ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि व्यक्ति का परिचय समूह देता है और व्यक्ति समूह देता है बौद्धि अकमर्ण्यता घातक है, अन्याय हो रहा है कहता रहेगा लेकिन प्रतिकार नहीं करेगा, विरोध नहीं करेगा। अनुष्ठानिकता से लोकगीत, लोक संस्कृति सरकार के साथ जुड़ गया, सरकार ही सब कुछ करेगा ये अपेक्षा रहती है। पश्चिमी सभ्यता लोक साहित्य को खतम कर रहा है। सामाजिक विवेक खतम हो रहा है। सामाजिक विवेक भारत की आत्मा से निकला हुआ था। लोक साहित्य अपना रंग परिवर्तन कर के आगे बढ़ता रहेगा। आज मशीन ही जीवन हो गया है, बौद्धिकता मशीन का दास है। आज भाषाएँ विलुप्त हो रही हैं, मानव की कल्पना का संकुचन हो रहा है, श्रुति व स्मृति भी संकुचित हो रही है। लिखित साहित्य को लोक साहित्य से सीख लेने की जरूरत है, क्योंकि लोक साहित्य प्रकृति से जुड़ा हुआ है। भारतीय संस्कृति स्थान प्रधान होता है समय प्रधान नहीं है। लोक साहित्य की प्रविधि पर काय र्शाला आयोजित करने की हमारी योजना है। इसके बाद लोक कलाकारों ने होलीगीत गाकर लोककला की प्रस्तुति से सबको अभिभूत कर दिया।
18.02.2018 को विमर्श के द्वितीय दिवस की प्रथम सत्र की अध्यक्षता डॉ. चितरंजन कर ने की। मंचस्थ वक्तागणों में डॉ. मांगीलाल यादव, डॉ. रघु, डॉ. राजन यादव, डॉ. राहुलसिंह, डॉ. पीसी लाल यादव, डॉ. विजय शंकर गौतम थे। छत्‍तीसगढ़ी लोकगीतों की सी.डी. का विमोचन किया गया। डॉ. राजन यादव ने लोकगीतों का दार्शनिक संदर्भ पर विस्तार पूर्वक प्रकाश डाला। उन्होंने होली में गाए जाने वाले फाग गीतों के तीन प्रकार बतलाएँ- सड़ फाग, करिया फाग और झूल फाग। इन फाग गीतों में उद्दाम प्रेम की मनोरम अभिव्यक्ति होती है। कालचक्र की धुरी पर ऋतुएं नर्तन करती है उनमें एक ऋतु बसंत ऋतु में ही ये गीत गाए जाते हैं। वंदना गीतों का कथानक गुम्फित होता है। उन्होंने आल्हा गीत गाकर सबका मन मोह लिया। डॉ. मांगीलाल यादव ने छग. के नाचा गीतों में लोक चेतना पर अपने विचार रखते हुए निर्गुण भजन की चर्चा की। डॉ. विजय शंकर गौतम भाषा अध्ययन शाला पं.र.शु.वि.वि. रायपुर ने कहा कि लोकोत्सव ही जीवनोत्सव है।
शास्त्र भी लोक से शक्ति अजिर्त करता है। लोक साहित्य मार्गदर्शक बने बिना हमारा मार्गदर्शन करता है। श्री संजीव तिवारी जी ने शेख हुसैन के गाए गीतों पर केन्द्रित विचार व्यक्त किए। डॉ. चित्तरंजन कर ने अध्यक्षीय उद्बोधन करते हुए कहा कि संगीत एक भाव है उसकी अभिव्यक्ति गीत, नृत्य, नाटक आदि में हो सकता है। लोक गायक भाव के आधार पर ‘सुर’ बनाता है, शास्त्रीय ज्ञान पर नहीं चलता। कालचक्र और ऋतुचक्र रेखिक नहीं होती चक्रीय होता है। ‘कालो न याति’ समय नहीं बीतता हम बीतते हैं, लोक नहीं मरता, शास्त्र मर जाएगा। लोक के लिए खुली दृष्टि चाहिए, लोक परिमाजर्न करता है।
अगले विमर्श सत्र में-अध्यक्षता डॉ. राजन यादव (खैरागढ़ संगीत वि.वि.) ने की। इस सत्र के वक्ताओं में श्री हरिहर वैष्णव, रुद्रनारायण पाणीग्रही, शिव कुमार पाण्डेय, तुलसी पाणीग्रही, जयमती कश्यप, सभी बस्तर से और श्री मोहन साहू, अजय चतुवेर्दी सरगुजा से उपस्थित थे। श्रीमती जयमती कश्यप ने गोड़ी जनजाति के लोकगीत स्वागत गीत, छेरता गीत, देवगीत, कुर्रुपाटा गीत, पर्यावरण गीतों का सामाजिक संदर्भ को रेखांकित किया ।
श्री तुलसीराम पाणीग्रही ने बस्तर अंचल के पारम्परिक लोकगीत- ‘छेरता गीत’ के संबंध में बतलाया कि ‘छेरता गीत’ ‘भतरी’ बोली में गाया जाता है। यह समूह में लडके-लड़कियों की टोली बनाकर गाया जाने वाला गीत है। पौष पूर्णिमा के पांच-छः दिन पूर्व छेरता या छेरका नाच शुरु होता है। बांस की तुंबी पर केला के पत्ते लगाकर, फूंकमार कर बजाते हैं। घरेलू हिंसा को भी इसमें रेखांकित किया जाता है। लोकगीतों की रानी ‘ददरिया’ कर्मा, चौत परब, जगार गीत, और धंगड़ी नाच के बारे में भी बताया। श्री मोहन साहू (सरगुजा) ने बताया कि जन्म से लेकर मृत्यु संस्कार तक सरगुजा में महादेव की सुमरनी गीत गाया जाता है। सरगुजा गांजर गूंजा है यहां पहाड़ों की पूजा की जाती है। श्री अजय चतुवेर्दी ने सरगुजा अंचल के लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ बतलाया। श्री हरिहर वैष्णव (कोण्डागांव) ने लक्ष्मी जगार गीत का लोक संदर्भ बताते हुए कहा कि इसमें 39 हजार 39 पंक्तियां हैं जिनमें धान की लक्ष्मी की प्रशंसा में गायी गई है। श्री शिवकुमार पाण्डेय ने गोंड़ी लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ बतलाया। मुरिया जनजाति की लोकभाषा गोंड़ी है। गोंड़ी में गीत को पाटा कहा जाता है। महला पाटा-सगाई गीत है। देव संस्कृति को गोंड़ी में ‘पेंगहाना’ कहते हैं। पुटुल-जन्मगीत है। शहरदायना बच्चे को कंधे पर बैठाकर दादी द्वारा शहर घुमाना है। ससुर को गोंड़ी में मामा कहा जाता है। घोटुल एक सामाजिक संस्था है। शादी के दिन नजदीक आने पर लडकी को घोटुल से विदाई दे दी जाती है और सिखानी गीत गाया जाता है।
श्री रुद्र कुमार पाणीग्रही ने चौत परबगीत, विवाहगीत, लेजा गीत (पत्ते तोड़ते समय गाया जाने वाला गीत) के बारे में बतलाया। पान बूटानी लोकगीत भतरी बोली में है। सभी वक्ताओं को स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया गया। इसके पश्चात दूध मोंगरा के
लोक कलाकारों द्वारा मनमोहक लोकगीत प्रस्तुत किए गए।
भोजनावकाश उपरान्त समापन सत्र 3.30 बजे प्रारंभ हुआ। इस सत्र के मुख्य अतिथि श्री जी.आर. राणा (अध्यक्ष, अनुसूचित जनजाति आयोग छ.ग. थे। अध्यक्षता डॉ. विनय कुमार पाठक (अध्यक्ष छत्‍तीसगढ़ राजभाषा आयोग) ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में मंच पर डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र बख्सी सृजन पीठ, श्री रामजी भारती (अध्यक्ष, अनुसूचित जाति आयोग एवं भूतपूर्व विधायक), डॉ. सोमनाथ यादव (भूतपूर्व अध्यक्ष पिछड़ा वर्ग आयोग), श्री सोनवानी जी, श्री बलदाऊ राम साहू (सचिव पिछड़ा वर्ग आयोग) प्रमुख रुप से उपस्थित थे।
समापन सत्र का मंच संचालन बी. रघु कुमार ने किया। स्वागत भाषण श्री पीसी लाल यादव ने किया। इस अवसर पर बालगीत पुस्तक का विमोचन किया गया। श्री बलदाऊ राम साहू सचिव पिछड़ा वर्ग आयोग एवं संयोजक दूध मोंगरा छत्‍तीसगढ़ी सांस्कृतिक समिति गंडई, राजनांदगांव में संगोष्ठी प्रतिवेदन में जानकारी देते हुए बतलाया कि इस दो दिवसीय राज्य स्तरीय संगोष्ठी में 180 प्रतिभागियों ने भाग लिया एवं 35 प्रतिभागियों ने आलेख भेजा है। संगोष्ठी पर समीक्षात्मक विचार डॉ. चितरंजन कर ने रखे। सभा को श्री रामजी भारती,
डॉ. सोमनाथ यादव, श्री रमेन्द्र नाथ सिंह ने भी संबोधित किया। मुख्य अतिथि की आसंदी से बोलते हुए श्री जी.आर. राणा जी ने बतलाया कि बस्तर में ‘माटी कि रियाखाना’ सबसे बड़ा कसम है।
बस्तर में प्रधान उसे कहा जाता है जो देवी-देवता की पूजा करने के बदले में धान लेता है। उन्होंने स्वरचित कविता ‘मोर गाँव गँवागे संगी, मैं कहां रिपोट लिखावौं’ सुनाकर सबको सोचने पर मजबूर कर दिया और अपने कवित्त प्रतिभा का लोहा मनवाया। कु. नेमी निषाद ने गीत प्रस्तुत किए। अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. विनय कुमार पाठक ने कहा कि छ.ग. के लोकगीतों में सारी संभावनाएं हैं। शिष्ट साहित्य में बनावटीपन है लोक साहित्य प्राकृतिक है। उन्होंने देवारगीत में विकलांगों में सौंदर्य शास्त्र का उदाहरण भी दिए -
कानी आंखी मं काजर आंज के, बूचा कान भंदार ।
लोकगीतों में हमें देखना पड़ेगा कि उनमें प्रकृति एवं संस्कृति बचा है कि नहीं । इसे विकृति से बचाना है तभी लोक बचेगा, हम बचेंगे, समाज बचेगा। लोकगीतों का संरक्षण व संवर्धन बहुत आवश्यक है। अ ंत में सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। आभार प्रदर्शन संयोजक श्री बलदाऊ राम साहू जी ने किया। इस प्रकार दो दिवसीय राज्य स्तरीय संगोष्ठी के समापन की घोषणा की गई। इस संगोष्ठी की विशेषता यह रही कि एक-एक मिनट किमती समय का सदुपयोग किया गया, विषय के विमर्श पर विशेष ध्यान दिया गया। दोनों दिन संगोष्ठी प्रातः 10.30 बजे प्रांरभ होकर शाम 7.30 बजे सम्पन्न हुई। मैं इस संगोष्ठी का साक्षी बना ये मेरा सौभाग्य है।
- डॉ. स्वामीराम बंजारे ‘सरल’
सहायक प्राध्यापक हिंदी
भा.प्र.दे.शास. स्नातकोत्तर महा.

09 April, 2018

अपने ही कल्‍याण का बाट जोहता सन् 1938 का बाल कल्याण केंद्र

लिखित इतिहास को मिटाने उसे दबाने-छुपाने के कई उदाहरण आप लोगों ने देखा होगा, किन्‍तु यहां छत्‍तीसगढ़ के जिला मुख्‍यालय दुर्ग में एक बड़े भवन को, छुपा लिया गया था। अवैध कब्जाधारियों की स्वार्थपरक लोलुपता ने इसे ढांप लिया था, लोगों का कहना है कि कई बार कब्जा हटाया गया, व्यवस्थापन में कब्जेदार दूसरे स्थानों में दुकान पे दुकान आबंटित कराते गए पर कुछ दिन बाद ये भी मेरा वो भी मेरा कहते हुए फिर उसी स्थान पर कब्जा जमा लिए। तथाकथित रूप से भूमंडलीकरण का सुन्‍दर उदाहरण प्रस्‍तुत करते हुए इनकी पीढ़ियां एक-एक करोड़ शादी में लुटाती रहीं फिर भी ये गरीब लाचार बने राजनैतिक सहानुभूति पाते रहे। अबकी बार भोज राम ने इनके इरादों पर पानी फेर दिया। पहले हाथ जोड़ा, नहीं माने तो तोड़ दिया।
नई पीढ़ी इस एतिहासिक भवन से अनजान थी। इंदिरा मार्केट के सूर्या जूस पार्लर के आस-पास कब्जा हटने के बाद से अनावृत हुए इस भवन में लगे पट्टिका से ज्ञात हुआ कि 11 जून, सन 1938 को छत्तीसगढ़ डिवीजन के कमिश्नर की पत्नी श्रीमती जी.सी.एफ. रेम्सडॅन के द्वारा बाल कल्याण केंद्र के रूप में इस भवन को जनता को समर्पित किया था। सियान लोग बताते हैं कि यह क्षेत्र दुर्ग के रेलवे स्टेशन जाने वाले काफी चौड़े मुख्य नगर मार्ग के किनारे स्थित था। उस समय यहां अंग्रेजी सरकार के कर्मचारियों के कुछ आवास भी थे। इसके पीछे काफी बड़ा खुला स्थान था, उसके बाद दुर्ग की बसाहट थी। दिल्ली दरवाजा या एडवर्ड मेमोरियल हाल या हिंदी भवन से यह भवन एक पहुंच मार्ग से सीधे संपर्क में था, जो दुर्ग की बसाहट की ओर जाता था। 
बहुत-बहुत धन्यवाद दुर्ग जिला प्रशासन और नव पदस्थ सीएसपी (ट्रेनी आई पी एस) भोज राज पटेल का, जिनके प्रयासों से, दुर्ग के हृदयस्थल में, बरसों से कब्जा जमाए अतिक्रमणकारियों को हटाया गया और दुर्ग के इस एतिहासिक भवन को हम-आप देख सके। 


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