ब्लॉग छत्तीसगढ़

26 August, 2016

व्हाट्स-एपिया रोमांस


मुहब्बत का इज़हार, मुहब्बत के पैग़ाम और मुहब्बत की वो हसीन तकरारें वक्त के साथ अपना तरीका बदल लिया करती हैं !! आज सोशल मीडिया के दौर में वाट्स एप पर मुहब्बतें परवान चढ़ रही हैं ! तकनीकी दौर की इस मुहब्बत को बड़ी खूबसूरत कहानियों में गूंथकर समीर ने वाट्स एपिया रोमांस की शक्ल में इस किताब में पेश किया है ! समीर प्रेम कहानियां लिखते हुए सबसे सहज होते हैं ! हमारी जिंदगियों में रोमांस के जो छोटे छोटे लम्हे बिखरे रहते हैं , उन्हें समीर बेहद संवेदनाओं के साथ अपनी कहानियों में उकेरते हैं ! उनकी अपनी एक ख़ास शैली है जिससे आज के आधुनिक युवा अपने आप को एकदम से कनेक्ट कर पाते हैं ! समीर की कहानियां दरअसल पारम्परिक कहानियां नहीं बल्कि दृश्यों का एक बड़ा खूबसूरत कोलाज होती हैं ! समीर के वाट्स एपिया रोमांस में प्रतीक्षा हैं , तड़प है , चहकते इमोजीज़ हैं , इकरार है, इज़हार है , रूठना मनाना है और मुहब्बत के नीले हरे रंग हैं गोया मोबाइल की स्क्रीन एक चमकीला आसमान हो और उसमे मुहब्बत के परिंदे उड़ान भरते हों ! समीर की कहानियों की जो सबसे लाजवाब बात मुझे नज़र आती है वो रिश्तों के जटिल धागों की बुनावट को इस कदर सरलता से प्रस्तुत करते हैं कि हर पाठक कहीं न कहीं उन रिश्तों को जीने लगता है ! कथा का घटना क्रम हमें हमारी जिंदगी से रूबरू कराता हुआ दिखाई देता है ! सर्वथा मौलिकता के साथ कही गयी ये छोटी छोटी कहानियां हम सभी की कहानियां हैं ! इन कहानियों के चरित्र हमारे आसपास ही जी रहे हैं ! ये कहानियां हमारे ठीक बगल में उन स्क्रीनों पर घट रही हैं जिनके साथ हमारी स्क्रीन सेम सिग्नल शेयर कर रही हैं !
- पल्लवी त्रिवेदी
कुछ अलग प्रकार की पुस्‍तकों को शिवना प्रकाशन से प्रकाशित करने की योजना के तहत यह पुस्तक आई है। प्रेम के नये रूप का प्रस्तुत करती हुई इन कहानियों के लेखक हैं समीर यादव । इन कहानियों में नये युग का प्रेम है। नाम 'व्हाट्स-एपिया रोमांस' व्हाट्स अप पर जन्म लेनी वाली प्रेम कहानियाँ। लेकिन इन कहानियों में भी वही बेकरारी है, वही इंतज़ार है जो प्रेम में हमेशा से रहता है। पुस्तक में शामिल कहानियाँ
1) समझे बस वो... 2) एबाउट टू डाय 3) बट लीव इट 4) व्हाट्स-एपिया परवाने 5) पुरजा-पुरजा प्रेम पर्चियाँ 6) क्या यही प्यार है 7) WiFi Zone में लौट आओ 8) ग्रैंड सेल्यूट.. 9) इंद्रधनुषी और इंस्टेंट 10) आर यू देअर ? 11) दो काली टिक 12) मुहब्बत वाली जगह 13) आज मिल न.. 14) आख़िरी कश 15) नो स्टेटस 16) न सूखने देती हो, न भीगने 17) पिछली सदी का मैसेज 18) दोनों टिक नीली 19) गोल्डन रिट्रीवर 20) तारीख़ 21) उसे भी मालूम है .. 22) चपटी तिकोने वाली प्लेट 23) तुम बेवजह याद रहती भी कहाँ हो 24) इसमें मैं कहाँ ... 25) जा कुलच्छनी...... सब बरी हो गए।
यह पुस्‍तक आज से ऑनलाइन शॉपिंग स्टोर्स पर उपलब्‍ध रहेगी

08 July, 2016

जब भाषा ही नहीं रहेगी तो क्या .?


विगत एक वर्ष से मैंने छत्तीसगढ़ी वेब मैगज़ीन गुरतुर गोठ डॉट कॉम (www.gurturgoth.com) को सर्च इंजन से डिसेबल कर दिया था।  इसके पीछे मूल कारण एक व्यक्ति था जो गुरतुरगोठ और अन्य छत्तीसगढ़ी ब्लॉगों के आलेखों को कापी कर अपने ब्लॉग में लगातार लगा रहा था, इससे गूगल बोट को समझ में नहीं आ रहा था कि, डेटा पहले कहाँ पब्लिश हुआ है। इसके अतिरिक्त कारण यह था कि मुझे दूसरे आयामों में काम करना था और छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के इंटरनेट में हो रहे ब्लॉगिया-फेसबुकिया भण्डारण को सर्च में प्राथमिकता देना था। ताकि गूगल, नेट सर्च में छत्तीसगढ़ी भाषा के शब्दों के प्रति भी संवेदनशील (मशीनी) हो। यह मेरे आत्ममुग्ध मानस का भ्रम भी हो सकता है या मेरे अधकचरा तकनीकी ज्ञान का सत्य। 
जो भी हो, मुझे 'खुसी' है कि इस बीच एंड्राइड युक्त युवा साथियों ने अपनी भाषा को वैश्विक बनाने में सराहनीय कार्य किया और दर्जनों छत्तीसगढ़ी ब्लॉग व फेसबुक, व्हॉट्स एप ग्रुप बनाये। क्रांति सेना के 'संगी' लोग भी भाषा और संस्कृति के लिए लगातार अलख जगा रहे हैं।  
वरिष्ठ और आदरणीय अग्रजों में नंदकिशोर शुक्ला ने तो अपनी उम्र के तमाम 'सियानों' को पीछे छोड़ते हुए फेसबुक में छत्तीसगढ़ी अस्मिता को जगाने में अभूतपूर्व कार्य किया है। भाषा को बचाने और प्राथमिक स्तर से छत्तीसगढ़ी की शिक्षा अनिवार्य करने के लिए वे अपनी मांग प्रतिपल बुलंद करते रहते हैं। इसके बावजूद हम उनके पोस्टों को टैग करने की अनुमति देने के सिवाय, कुछ नही कर पा रहे हैं। हमारे पास न ही उनके सामान ज्ञान है और न ही वैसी ऊर्जा।  
बहरहाल हमने छत्तीसगढ़ी वेब मैगज़ीन गुरतुर गोठ डॉट कॉम (www.gurturgoth.com) को फिर से सर्च इनेबल कर दिया है। हम यहाँ व्हॉट्स एप, फेसबुक और दूसरे मीडिया में छत्तीसगढ़ी भाषा पर हो रहे उल्लेखनीय चर्चाओं को प्रकाशित भी करेंगे। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ी के ऐसे रचनाओं को पुनः आमन्त्रित कर रहे है जो इंटरनेट में पूर्व प्रकाशित न हो। ब्लॉ ब्लॉ ब्लॉ, इन सबके बावजूद हमारे द्वारा नेट पर जो कुछ भी किया जा रहा है उसकी उपादेयता पर इस सवाल का जवाब अब भी अनुत्तरित है कि, '.. .. जब भाषा ही नहीं रहेगी तो क्या??' 
-संजीव तिवारी

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