ब्लॉग छत्तीसगढ़

इस ब्‍लॉग के अतिरिक्‍त आप संजीव तिवारी एवं तमंचा रायपुरी के समग्र पोस्‍ट झॉंपी पर पढ़ सकते हैं.

31 August, 2015

तथाकथित सुभद्रा कुमारी चौहानों और महादेवियों के बीच मीना जांगड़े

छत्तीसगढ़ की एक 10वीँ पढी अनुसूचित जाति की ग्रामीण लड़की की कविताओं के दो कविता संग्रह, पिछले दिनों पद्मश्री डॉ सुरेन्द्र दुबे जी से प्राप्त हुआ। संग्रह के चिकने आवरणों को हाथों में महसूस करते हुए मुझे सुखद एहसास हुआ। ऐसे समय मेँ जब कविता अपनी नित नई ऊंचाइयोँ को छू रही है, संचार क्रांति के विभिन्न सोतों से अभिव्यक्ति चारोँ ओर से रिस—रिस कर मुखर हो रही है। उस समय में छत्तीसगढ़ के गैर साहित्यिक माहौल मेँ पली बढ़ी, एक छोटे से सुविधाविहीन ग्राम की लड़की मीना जांगड़े कविता भी लिख रही हैँ। .. और प्रदेश के मुख्यमंत्री इसे राजाश्रय देते हुए सरकारी खर्च में छपवा कर वितरित भी करवा रहे हैं।

ग्लोबल ग्राम से अनजान इस लड़की नें कविता के रूप में जो कुछ भी लिखा है वह प्रदेश की आगे बढ़ती नारियों की आवाज है। मीना की कविताओं के अनगढ़ शब्दोँ मेँ अपूर्व आदिम संगीत का प्रवाह है। किंतु कविता की कसौटी मेँ उसकी कविताएँ कहीँ भी नहीँ ठहर पाती। ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह बहुत कुछ लिखना चाहती है। उसके मस्तिस्क मेँ विचारोँ का अथाह सागर तरंगे ले रहा है पर वह उसे उसके उसी सौंदर्य के साथ प्रस्तुत नहीँ कर पा रही है। शायद उसके पास पारंपरिक कविताओं के खांचे में फिट होने वाले रेडीमेड शब्द नहीँ हैँ। इन दोनों किताबों के शब्द मीना के स्वयं के हैं, उधारी के बिल्कुल भी नहीं, किसी शब्दकोश से रटे रटाये नहीँ हैँ। उसकी कविताओं मेँ भारी भरकम प्रभावी शब्दोँ का अजीर्ण नहीँ है। ना उसे सहज और सरल शब्दों के कायम चूर्ण का नाम ही मालूम है। उसे कविता की कसौटी और कविता का शास्त्र भी नहीं मालूम। आश्चर्य है यह लडकी इस सबकी परवाह किए बिना दो दो संग्रह लिखने की जहमत रखती है।

अभिव्यक्त होने के लिए छटपटाती मीना की बेपरवाही और गजब का आत्मविश्वास देखिए कि वह एक स्थानीय समाचार पत्र के छत्तीसगढ़ी परिशिष्ठ के संपादक से अपनी कविताओं को सुधरवाती है। बकौल मीना, उसको अपने सृजन का गुरू भी बनाती है। वही संपादक उसकी कविताओं को तराशता (?) है और इस कदर मीडिया इम्पैक्ट तैयार करता है कि, प्रदेश के मुख्यमंत्री को सरकारी खर्चे में उसे छपवाना पडता है। शायद अब लडकी संतुष्ट है, उसकी अभिव्यक्ति फैल रही है। अच्छा है, गणित को बार बार समझने के बावजूद दसवीं में दो बार फेल हो जाने वाली गांव की लडकी के पास आत्मविश्वास जिन्दा है। गांवों में लड़की के विश्वास को कायम रखने वाले और उन्हें प्रोत्साहित करने वाले प्राचार्य भी भूमिका, रंगभूमि के ब्रोशर में बिना नाम के भी मौजूद है।

साहित्यिक एलीट के चश्में के साथ जब आप मीना जांगड़े की कविताओं को पढते हैं तो संभव है आप एक नजर मेँ इसे खारिज कर देंगे। व्याकरण की ढेरोँ अशुद्धियाँ, अधकचरा—पंचमिंझरा, शब्द—युति, भाव सामंजस्य की कमी, खडभुसरा— बेढंगें उपमेय—उपमान—बिंम्ब, अपूर्णता सहित लय प्रवाह भंगता जैसी ब्लॉं..ब्लॉं..ब्लॉं गंभीर कमियाँ इन कविताओं में हैँ। ऐसी कविताओं से भरी एक नहीँ बल्कि दो दो कविता संग्रहों को पढ़ना, पढ़ना नहीँ झेलना, आसान काम नहीँ है। किंतु यदि आप इन कविताओं को नहीँ पड़ते हैँ तो मेरा दावा है आप हिंदी कविता की अप्रतिम अनावृत सौंदर्य दर्शन से चूक जाएंगे। बिना मुक्तिबोध, पास, धूमिल आदि को पढ़े। राजधानी के मखमली कुर्सियों वाले गोष्ठियों से अनभिज्ञ लगातार कविताएँ लिख रही मीना हिंदी पट्टी के यशश्वी कवि—कवियों के चिंतन के बिंदुओं को मीना जांगड़े झकझोरते नजर आती है। खासकर ऐसे फेसबुकीय पाठक, जो तथाकथित सुभद्रा कुमारी चौहानों और महादेवियों के वाल मेँ लिखी कविता पर पलक पावड़े बिछाते खुद भी बिछ बिछ जाते नजर आते हैं। उन्हें मीना जांगड़े की कविताओं को जरूर पढ़ना चाहिए। ताकि वे कविता के मर्म से वाकिफ हो सकें।

मीना के पास एक आम लड़की के सपने है, जो उसके लिए खास है। उसके सपने अलभ्य भी नहीँ है, ना ही असंभव, किंतु गांव मेँ यही छोटे छोटे सपने कितने दुर्लभ हो जाते हैं यह बात मीना की कविताओं से प्रतिध्वनित होती है। उसकी अभिव्यक्ति छत्तीसगढ़ की अभिव्यक्ति है, हम मीना और उसकी कविताओं का स्वागत करते हैँ। मीना खूब पढ़े, आगे बढ़े, उसके सपने सच हो। प्रदेश में आगे बढ़ने को कृत्संकल्पित सभी बेटियों को दीनदयाल और पद्म श्री सुरेंद्र दुबे जी की आवश्यकता हैँ। उन सभी के सपनों को सच करना है, तभी मीना जागड़े की कवितायें सार्थक हो पाएगी।
संजीव तिवारी

25 August, 2015

तुलसी जयंती समारोह : हिन्‍दी साहित्‍य समिति का आयोजन

23 अगस्त को मानस भवन दुर्ग मेँ,हिंदी साहित्य समिति दुर्ग के द्वारा तुलसी जयंती समारोह का आयोजन किया गया। समारोह के पहले सत्र मेँ गोस्वामी तुलसीदास के व्यक्तित्व एवँ कृतित्व पर बोलते हुए मुख्य वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार एवं श्रीमद् भागवत आचार्य स्वामी कृष्णा रंजन ने कहा कि तुलसी नेँ तत्कालीन परिस्थितियोँ मेँ जनता मेँ विद्रोह की ताकत पैदा करने के उद्देश्य से जनभाषा मेँ रामचरितमानस का सृजन किया। उंहोने विभिन्न भाषाओं के राम कथा एवँ रामचरितमानस पर समता मूलक व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि तुलसी ने समाज और साहित्य के लिए तब और अब दोनोँ ही काल और परिस्थितियोँ मेँ सार्थक भूमिका निभाई।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे राजभाषा आयोग के पूर्व अध्यक्ष पं. दानेश्वर शर्मा ने कहा कि तुलसी जनकवि थे। उनकी रचनाएँ जन मन के लिए थी, तुलसी ने समाज के मंगल के लिए रामचरितमानस एवँ अन्य अमर रचनाओं का सृजन किया। तुलसी ने आदर्श समाज की परिकल्पना की, जिसे अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रकट किया। उन्होंने बताया कि रामचरितमानस के प्रत्येक शब्द सिद्ध सम्पुट मंत्र है, जिसका लोकहित मेँ चमत्कारिक रुप से प्रयोग किया जा सकता है। विषय प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती विद्या गुप्ता ने तुलसी साहित्य एवँ उसके सामाजिक सरोकार पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने तुलसी साहित्य के विभिन्न आयामों को विधागत कसौटी मेँ तौलते हुए तुलसी की रचनाओं का विश्लेषण किया।

कार्यक्रम के आरंभ मेँ सचिवीय प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए समिति के सचिव संजीव तिवारी ने कहा कि इस वर्ष समिति ने आठ साहित्य कार्यक्रम किए और रचनाकारोँ मेँ साहित्यिक रुचि जगाने व नव सृजन को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया। किंतु 1929 से निरंतर कार्यरत समिति मेँ इस वर्ष पांच रचनाकारों की कृतियाँ ही पुस्तकाकार रुप मेँ आ सकी। इस न्यून साहित्य विकास से पूर्णतया असंतुष्टि जताते हुए उन्होंने कहा कि, समिति का उद्देश्य एवं मेरा कार्यकाल तभी सफल माना जाएगा जब, रचनाकारोँ का परिचय उनके वरिष्ठ-कनिष्ठ होने से नहीँ बल्कि उनकी रचनाओं से होगा। कार्यक्रम मेँ स्वागत भाषण रमाकांत बराडिया ने दिया एवँ आभार प्रदर्शन समिति के अध्यक्ष डॉ संजय दानी ने किया।

द्वितीय सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि प्रदीप वर्मा एवँ विशिष्ट अतिथि बाबा निजाम दुर्गवी थे। इस सत्र के कवि सम्मेलन का संचालन समिति के सह सचिव अजहर कुरैशी ने किया। सत्र का आगाज वरिष्ठ व्यंग्यकार विनोद साव ने लघु व्यंग्य पाठ से किया। सम्मलेन में नवाचार का प्रयोग करते हुए कविताओं के बीच मेँ डॉ. रौनक जमाल ने भी अपनी लघु कथा का पाठ किया। कवियोँ ने अपने सुरमई गीतो, गजलों और कविताओं से महफिल को रंगीन बना दिया। जिनमेँ किशोर तिवारी, शमशीर शिवानी, नरेश विश्वकर्मा, भारत भूषण परगनिया, डॉ. नरेंद्र देवांगन, डॉ शीला शर्मा, नवीन तिवारी अमर्यादित, राकेश गंधर्व, महेंद्र दिल्लीवार, रतनलाल सिन्हा, ठाकुर दास सिद्ध, अरुण कुमार निगम, गिरिराज भंडारी, अरुण कसार, प्रभा सरस, सूर्यकांत गुप्ता, आर.ऐन.श्रीवास्तव, अशोक ताम्रकार, उमाशंकर मिश्र, सिरिल साइमन, शकुंतला शर्मा, संध्या श्रीवास्तव, निजाम राही, रामबरन कोरी कशिश, नासिर खोखर, कलीराम यादव, नीता कंबोज, तारा चंद शर्मा, डा.नौशाद सिद्दीकी, इंद्रजीत दादर निशाचर, जेपी अग्रवाल, प्रशांत कानस्कर, बंटी सिंह, मीता दास, निर्मल शर्मा आदि कवियोँ ने काव्य पाठ किया। बालोद से पधारे थानेदार बुद्धि सेन शर्मा ने अपने सुमधुर स्वर मेँ गीत प्रस्तुत कर सभा को मंत्रमुग्ध कर दिया।

तुलसी जयंती समारोह का यह कार्यक्रम पूरे उत्साह में नव सृजन की कामना के साथ समाप्त हुआ। कार्यक्रम मेँ भारी संख्या मेँ गणमान्य एवँ साहित्यकार उपस्थित थे जिनमेँ रायपुर से पधारी शशि दुबे एवँ नगर के वरिष्ठ साहित्यकार गुलबीर सिंह भाटिया रवि श्रीवास्तव, तुंगभद्र सिंह राठौर, डॉ. निर्माण तिवारी, डॉ.के.प्रकाश, सरला शर्मा, रघुवीर अग्रवाल पथिक, बुद्धि लाल पाल, शरद कोकाश,  रजनीश उमरे, राजाराम रसिक, रामधीन श्रमिक, सुदर्शन राय, रवि आनंदानी, आलोक शर्मा, लल्ला जी साहू, भुवन लाल कोसरिया आदि उपस्थित थे।

Popular Posts