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17 April, 2007

नर नारी . . समाधि-सुख के . . शिखर पर : उर्वशी


महाकवि रामधारी सिंह दिनकर की उर्वशी के कुछ अंश कवि चिट्ठाकारों के मन में जोश व उत्साह लाने के उद्देश्य से प्रस्तुत कर रहा हूं, मैं ये नहीं जानता कि इससे कापीराईट कानून का उलंघन होता है कि नहीं किन्तु उर्वशी को बार बार पढने का मन होता है, नेट पर यह उपलब्ध नही है अस्तु :-

नर के वश की बात, देवता बने कि नर रह जाये
रूके गंध पर या बढकर फूलों को गले लगावे ।


सहधर्मिणी गेह में आती कुल पोषण करने को,
पति को नही नित्य नूतन मादकता से भरने को ।
किन्तु पुरूष चाहता भींगना मधु के नये कणों से
नित्य चूमना एक पुष्प अभिसिंचित ओसकणों से ।


हाय मरण तक जीकर मुझको हालाहल पीना है
जाने इस गणिका का मैनें कब क्या सुख छीन लिया था
जिसके कारण भ्रमा हमारे महाराज की मति को,
छीन ले गयी अधम पापिनी मुझसे मेरे पति को ।


ये प्रवंचिकाएं जाने, क्यों तरस नहीं खाती हैं,
निज विनोद के हित कुल वामाओं को तडफाती हैं ।

जाल फेंकती फिरती अपने रूप और यौवन को,
हंसी हंसी में करती हैं आखेट नरों के मन का ।

किन्तु बाण इन व्याधिनियों के किसे कष्ट देते हैं,
पुरूषों को दे मोद, प्राण वधुओं के लेते हैं ।

इसमें क्या आश्चर्य प्रीति जब प्रथम प्रथम जगती है,
दुर्लभ स्वप्न समान रम्य नारी नर को लगती है ।

कौन कहे यह प्रेम हृदय की बहुत बडी उलझन है
जो अलभ्य, जो दूर उसी को अधिक चाहता मन है ।

जब तक यह रस दृष्टि, तभी तक रसोद्वेग जीवन में
आलिंगन में पुलक और सिहरन सजीव चुंबन में ।
विरस दृष्टि जब हुई स्वाद चुंबन का खो जाता है
दारू स्पर्श वत सारहीन आलिंगन हो जाता है ।

पर नर के मन को सदैव वश में रखना दुष्कर है
फूलों से यह मही पूर्ण है और चपल मधुकर है ।
जितना ही हो जलधि रत्न पूरित, विक्रांत अगम है
उसकी वाडाग्नि उतनी ही अविश्रान्त, दुर्गम है ।
बंधन को मानते वही जो नद नाले सोते हैं
किन्तु महानद तो, स्वभाव से ही, प्रचण्ड होते हैं ।


चूमता हूं दूब को, जल को, प्रसूनों, पल्लवों को,
वल्लरी को बांह भर उर से लगाता हूं,
बालकों सा मैं तुम्हारे वक्ष में मुंह को छिपाकर,
नींद की निस्तब्धता में डूब जाता हूं ।

सिंधु सा उद्दाम, अपरंपार मेरा बल कहां है
गूंजता जिस शक्ति का सर्वत्र जयजयकार
उस अटल संकल्प का संबल कहां है
यह शिला सा वक्ष, ये चट्टान सी मेरी भुजाएं
सूर्य के आलोक से दीपित, समुन्नत भाल
मेरे प्राणों का सागर अगम, उत्ताल, उच्छल है ।
सामने टिकते नहीं वनराज, पर्वत डोलते हैं
कांपता है कुंडली मारे समय का व्याल
मेरी बाहों में मारूत, गरूड, गजराज का बल है ।
मर्त्य मानव की विजय का सूर्य हूं मैं
उर्वशी ! अपने समय का सूर्य हूं मैं
अंध तम के भाल पर पावक जलाता हूं
बादलों के शीश पर स्यंदन चलाता हूं
पर न जाने क्या बात है !

इंद्र का आयुध पुरूष जो झेल सकता है
सिंह से बाहें मिला कर खेल सकता है
फूल के आगे वही असहाय हो जाता
शक्ति के रहते हुए निरूपाय हो जाता
विध्द हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से
जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से ।

नारी जब देखती पुरूष को इच्छा भरे नयन से
नही जगाती है केवल उद्वेलन, अनल रूधिर में
मन में किसी कांन्त कवि को भी जन्म दिया करती है ।


कसे रहो, बस इसी भांति उरपीडक आंलिंगन से
और जलाते रहो अधर पुट को कठोर चुम्बन से ।

जब भी तन की परिधि पार कर मन के उच्च निलय में
नर नारी मिलते समाधि सुख के निश्चेतक शिखर पर,
तब प्रहर्ष की अति से यों ही प्रकृति कांप उठती है
और फूल यों ही प्रसन्न होकर हंसने लगते हैं ।


जिसके भी भीतर पवित्रता जीवित है शिशुता की
उस अदोष नर के हांथों में कोई मैल नहीं है ।

शुभे ! त्रिया का जन्म ग्रहण करने में बडा सुयश है
चंद्राहत कर विजय प्राप्त कर लेना वीर नरों का
बडी शक्ति है शुचिस्मिते ! वीरता इसे कहता हूं ।

कितनी सह यातना पालती त्रिया भविष्य जगत का
कह सकता है कौन पूर्ण महिमा इस तपश्चरण की ।

3 comments:

  1. :)
    घुघूती बासूती

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  2. आपने इसे नेट पर डाल कर अच्‍छा किया, मैं बहुत दिनों से इसे तलाश रहा था। कॉपीराइट के बारे में सीनियर लोग आपको सलाह दे सकते हैं, शायद आपको पूछना पड़े।

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  3. बहुत सुन्दर! आपने बहुत खूबसूरती से उर्वशी के उन संदर्भो को चुना है जो बेहद सम्मोहक है,..
    आपने मेनका,चित्रलेखा.औशीनरी,निपुणीका,
    मदनिका,पुरूरवा, उर्वशी सभी पात्रो का अच्छा संग्रह प्रस्तुत किया है,...
    सुनीता(शानू)

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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