ब्लॉग छत्तीसगढ़

27 April, 2007

पौरुष की कापीराईट




धुर बस्तर में एक आदिवासी जनजाती मुरिया (मुडिया )निवास करती है । जिनमें विवाह के पूर्व युवा लडके एवं लडकियां गांव में स्थित घोटुल में अपने आप को दाम्पत्य के लिये तैयार करते हैं एवं प्रेम का पाठ सीखते हैं छत्तीसगढ के आदिवासियों की यह परंपरा अर्वाचीन है यह परंपरा उनकी अस्मिता है जिस पर कई लोगों ने लिखा है पर आज मेरे बस्तर के एक मित्र ने मुझे बस्तर की एक युवती का चित्र दिया जिसमे कापीराईट कोई सुनील जान के नाम से लिखा था मैने नेट पे ईसे खोजा तो पाया कैसे हमारे अस्मिता का व्यवसायीकरण हो रहा है । अब वो दिन भी दूर नहीं जब हमारे पौरुष का कापीराईट सुदूर अमेरिकन के पास होगा और हमें अपने बच्चे को अपना कहने के लिये कापीराईट ओनेर को रायल्टी देनी होगी । जान साहेब का लिंक है : http://members.aol.com/sjanah2/archive/tribals/index.htm

3 comments:

  1. सहमत हूं आपकी बात से, वैसे भी भारत के आदिवासी और उनकी परंपराएं विदेशियों के लिए कौतुहल का विषय रहे हैं।
    यहां के निवासियों में जागरुकता के अभाव में कितनी ही कापीराईट और पेटेंट के अधिकार विदेशियों के हाथों में चले गए है।

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  2. आज आप और हम जिस युनिकोड हिन्दी अक्षरों में इण्टरनेट में लिख पढ़ पा रहे हैं, उनका कॉपीराइट भी अमेरिका के पास है। अप्रत्यक्ष रूप से हमारी ही जेब से रॉयल्टी वसूली जा रही है (वह भी अरबों डॉलरों में), चाहे आपरेटिंग सीस्टम के मूल्य रूप में हो, सॉफ्टवेयर टूल्स के मूल्य में हो या अन्य रूप में....

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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