ब्लॉग छत्तीसगढ़

15 January, 2008

रायपुर की मॉं महामाया

छत्‍तीसगढ के शक्तिपीठ – 3

पौराणिक राजा मोरध्‍वज एक बार अपनी रानी कुमुददेवी के साथ आमोद हेतु शिवा की सहायक नदी खारून (इसका पौराणिक नाम मुझे स्‍मरण में नहीं आ रहा है) नदी के किनारे दूर तक निकल गए वापस आते-आते संध्‍या हो चली थी अत: धर्मपरायण राजा नें खारून नदी के तट पर संध्‍या पूजन करने का मन बनाया । राजा की सवारी नदीतट में उतरी । रानियां राजा के स्‍नान तक प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण नदी तट में भ्रमण करने लगी तो देखा कि नदी के पानी में एक शिला आधा डूबा हुआ है और उसके उपर तीन चार काले नाग लिपटे हैं ।

अचरज से भरी रानियों नें दासी के द्वारा राजा को संदेशा भिजवाया । राजा व उनके साथ आए राजपुरोहित कूतूहलवश वहां आये । राजपुरोहित को उस शिला में दिव्‍य शक्ति नजर आई उसने राजा मोरध्‍वज से कहा कि राजन स्‍नान संध्‍या के उपरांत इस शिला का पूजन करें हमें इस शिला में दैवीय शक्ति नजर आ रही है ।

राजा मोरध्‍वज स्‍नान कर उस शिला के पास गए और उसे प्रणाम किया, उस शिला में लिपटे नाग स्‍वमेव ही दूर नदी में चले गए । राजा नें उथले तट में डूबे उस शिला को बाहर निकाला तो सभी उस दिव्‍य शिला की आभा से चकरा गए । उस शिला के निकालते ही आकाशवाणी हुई ‘राजन मैं महामाया हूं, आपके प्रजाप्रियता से मैं अत्‍यंत प्रसन्‍न हूं, मुझे मंदिर निर्माण कर स्‍थापित करें ताकि आपके राज्‍य की प्रजा मेरा नित्‍य ध्‍यान पूजन कर सकें ।‘

राजा मोरध्‍वज नें पूर्ण विधिविधान से नदी तट से कुछ दूर एक मंदिर का निर्माण करा कर देवी की उस दिव्‍य प्रतिमा को स्‍थापित किया जहां वे प्रत्‍येक शारदीय नवरात्रि में स्‍वयं उपस्थित होकर पूजन करने का मॉं को आश्‍वासन देकर प्रजा की सेवा एवं राज्‍य काज हेतु अपनी राजधानी चले गए एवं अपने जीवनकाल में राजा मोरध्‍वज प्रत्‍येक शारदीय नवरात्रि को मॉं महामाया के पूजन हेतु उस मंदिर में आते रहे । किवदंती यह है कि आज भी शारदीय नवरात्रि में राजा मोरध्‍वज वायु रूप में मॉं महामाया की पूजन हेतु उपस्थित रहते हैं ।

राजा मोरध्‍वज द्वारा स्‍थापित यह मंदिर वर्तमान में रायपुर की मॉं महामाया के रूप में प्रसिद्ध है एवं छत्‍तीसगढ के शक्तिपीठ के रूप में जानी जाती है ।

(इस सिरीज के लेख डॉ.हीरालाल शुक्‍ल व अन्‍य महात्‍म लेखकों के छत्‍तीसगढ पर केन्द्रित विभिन्‍न लेखों व जनश्रुति के आधार पर मेरे शव्‍दों में प्रस्‍तुत है, शक्तिपीठों व छत्‍तीसगढ के पर्यटन संबंधी कुछ विवरण छत्‍तीसगढ पर्यटन मंडल के ब्रोशर में भी उपलब्‍ध है)
संजीव तिवारी

2 comments:

  1. छत्तीसगढ़ के बारे में व वहाँ के दर्शनीय स्थानों के बारे में जानकारी देकर आप एक महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं । धन्यवाद ।
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  2. बढ़िया!!
    महामाया मंदिर में प्रतिमा सीधी न हो कर थोड़ी तिरछी खड़ी है और कहा जाता है कि इसके पीछे भी देवी का ही कोई हठ ही था!

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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रायपुर की मॉं महामाया

छत्‍तीसगढ के शक्तिपीठ – 3

पौराणिक राजा मोरध्‍वज एक बार अपनी रानी कुमुददेवी के साथ आमोद हेतु शिवा की सहायक नदी खारून (इसका पौराणिक नाम मुझे स्‍मरण में नहीं आ रहा है) नदी के किनारे दूर तक निकल गए वापस आते-आते संध्‍या हो चली थी अत: धर्मपरायण राजा नें खारून नदी के तट पर संध्‍या पूजन करने का मन बनाया । राजा की सवारी नदीतट में उतरी । रानियां राजा के स्‍नान तक प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण नदी तट में भ्रमण करने लगी तो देखा कि नदी के पानी में एक शिला आधा डूबा हुआ है और उसके उपर तीन चार काले नाग लिपटे हैं ।

अचरज से भरी रानियों नें दासी के द्वारा राजा को संदेशा भिजवाया । राजा व उनके साथ आए राजपुरोहित कूतूहलवश वहां आये । राजपुरोहित को उस शिला में दिव्‍य शक्ति नजर आई उसने राजा मोरध्‍वज से कहा कि राजन स्‍नान संध्‍या के उपरांत इस शिला का पूजन करें हमें इस शिला में दैवीय शक्ति नजर आ रही है ।

राजा मोरध्‍वज स्‍नान कर उस शिला के पास गए और उसे प्रणाम किया, उस शिला में लिपटे नाग स्‍वमेव ही दूर नदी में चले गए । राजा नें उथले तट में डूबे उस शिला को बाहर निकाला तो सभी उस दिव्‍य शिला की आभा से चकरा गए । उस शिला के निकालते ही आकाशवाणी हुई ‘राजन मैं महामाया हूं, आपके प्रजाप्रियता से मैं अत्‍यंत प्रसन्‍न हूं, मुझे मंदिर निर्माण कर स्‍थापित करें ताकि आपके राज्‍य की प्रजा मेरा नित्‍य ध्‍यान पूजन कर सकें ।‘

राजा मोरध्‍वज नें पूर्ण विधिविधान से नदी तट से कुछ दूर एक मंदिर का निर्माण करा कर देवी की उस दिव्‍य प्रतिमा को स्‍थापित किया जहां वे प्रत्‍येक शारदीय नवरात्रि में स्‍वयं उपस्थित होकर पूजन करने का मॉं को आश्‍वासन देकर प्रजा की सेवा एवं राज्‍य काज हेतु अपनी राजधानी चले गए एवं अपने जीवनकाल में राजा मोरध्‍वज प्रत्‍येक शारदीय नवरात्रि को मॉं महामाया के पूजन हेतु उस मंदिर में आते रहे । किवदंती यह है कि आज भी शारदीय नवरात्रि में राजा मोरध्‍वज वायु रूप में मॉं महामाया की पूजन हेतु उपस्थित रहते हैं ।

राजा मोरध्‍वज द्वारा स्‍थापित यह मंदिर वर्तमान में रायपुर की मॉं महामाया के रूप में प्रसिद्ध है एवं छत्‍तीसगढ के शक्तिपीठ के रूप में जानी जाती है ।

(इस सिरीज के लेख डॉ.हीरालाल शुक्‍ल व अन्‍य महात्‍म लेखकों के छत्‍तीसगढ पर केन्द्रित विभिन्‍न लेखों व जनश्रुति के आधार पर मेरे शव्‍दों में प्रस्‍तुत है, शक्तिपीठों व छत्‍तीसगढ के पर्यटन संबंधी कुछ विवरण छत्‍तीसगढ पर्यटन मंडल के ब्रोशर में भी उपलब्‍ध है)
संजीव तिवारी
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