ब्लॉग छत्तीसगढ़

03 August, 2008

कहां है घर ? : कहानी

उसने टीन शेड से बने अस्थाई शौचालय के लटकते दरवाजे को भेडकर अंदर प्रवेश किया । चूंउउउव करता हुआ दरवाजा खुला, चिखला से अपने पैर को बचाते हुए उसने दरवाजे में कुंडी लगाई और आगे बढी । शौचालय में मद्धिम रौशनी की बल्ब जल रही थी । टीन सेड को जोड जोड कर बनाये गए अस्थाई शौचालय के जोड से बाहर का दृश्य दिख रहा था । बाहर तार के बाड के इस पार सर्चलाईट की रौशनी छाई हुई थी । दो बंदूकधारी रेत के बोरों में दबे छिपे थे, उसने जोड के छेद में आंखें सटा दी, दो वर्दीवाले में से एक जोहन था ।


जोहन नें जेब से सितार जर्दे का पाउच निकाला और उसे मुह में उडेल लिया, साथी वर्दीवाला उससे कुछ बात कर रहा था । टीन शेड के जोड में सटी आंखें जोहन पर टिकी थी । शौचालय के दरवाजे में दस्तक हुई । ‘अरे जल्दी निकल गोई, सुत गेस का ?’ खिलखिलाती आवाज नें उसकी तंद्रा भंग कर दी । उसने कुंडी खोला और अपने मिट्टी निर्मित टीन शेड से ढकें ठिकाने में चली गई । लगभग आठ बाई पांच के उस संदूकनुमा घर में जमीन पर उसके बाबू, दाई और दो छोटे भाई सोये थे । बाजू में ही ईंटो से बना चूल्हा एवं जूठे बर्तन को तिरियाकर रखा गया था । उसने घर का फइरका बंद किया और छोटे भाई के चिरकट चद्दर को खींचकर उसके अंदर घुस गई । आंखों में जोहन का लम्बां तगडा वर्दी वाला रूप छा गया जिसे उसने अभी अभी देखा था । वह देर तक स्वप्नों में, डोंगरी पहाडों में जोहन के साथ करमा नाचती रही और सो गई ।


सबह उठकर उसने बर्तन साफ किये, रात के बचे आधा बंगुनिया पानी में नहाया और सार्वजनिक नल पांईट से जर्मन के बडे भगोनें में लड-झगड कर खिसियाते हुए पानी लाई ‘सरकार हर बोरिंग कोडा के लडई बढावत हे, बने रहे मोर सेंदर नदिया दई कोनों रोके न टोंके, ससन भर तंउर अउ दस बेर धौड के हौंला हौला पानी ल भर डर ।‘ बडबडाते हुए चूल्हे में लकडी जलाकर पसिया पकाने लगी ।


कुछ माह पहले ही वह अपने परिवार के साथ इस कैम्प में आई थी, अपने हंसते-खिलखिलाते तरूणाई को गांव में ही छोड कर । यहां आकर उसकी कुछ उम्र में बडी लडकियां सलेही बन गई थी जो आस पास के ही गांव के थे । अब जब वे चूल्हा चौंका से मुक्त होतीं तो कहीं एक जगह मिल बैठते और फुसफुसाहट के साथ किसी किसी सहेली के लाल होते मुख मंडल से हंसी फूटती फिर सब समवेत खिलखिलाने लगते । करमा और ददरिया के बंद फूट पडते । सहेलियां छेडछाड से लेकर नरवा में युवा मित्र के साथ आंख मिचौली के अनुभवों को बताती तो उसके पूरे शरीर में झुरझुरी फैल जाती । किशोरावस्था पर ग्रामीण बालाओं में चढती जवानी की कहानियां सभी को मदमस्त कर देती ।


दिन में उसके दाई बाबू जंगल जाते और चार चिरौंजी, हर्रा बहेरा, इकट्ठा कर घर लाते । खाखी वर्दी वाले दिन भर कैम्प में गस्त करते, तार के कांटों से घिरे स्वस्फूर्त ? बंधन में परदेशी वर्दीवालों से बचकर रहने की हिदायत दे किशोर व जवान लडकियों की मांए दहशत के बावजूद चेहरे पर सरकार के दिये आवश्य‍क रूप से लगाए जाने वाले मुस्कान को चिपकाये रहतीं ।


उसका मन होता कि पल्ला दौंड कर डोंगरी में चढ जाये या किसी विशाल महुआ के वृक्ष के थिलिंग में चढकर दूर दूर तक फैले जंगल में टेढी-मेढी रेखाओं सी नजर आती सडक पर चींटी जैसे रेंगते इक्का दुक्का वाहनों को घंटों निहारे । पर अब वह बडी हो गई है, दाई उसे बार बार समझाती है ‘अक्केल्ला् मत निंगे कर ।‘ वर्दी में जोहन को देखकर उसका मन भंवरा नाचने लगता था, अब वह जवान हो गई है ।


जोहन जंगल इलाके का था वह हल्बी व छत्तीसगढी में बोलना जानता था इस कारण कैम्प के सभी लोगों से वह प्रतिदिन पांव-पैलगी करते रहता था । वनवासी अपने बीच के ‘साहेब’ की आत्मियता से अपनी जमीन छोडने का दुख बिसराने का प्रयास करते । युवा जोहन स्टेनगन थामें पूरे कैम्प में चौकडी भरते रहता । कैम्प के सभी युवा लडकियों का वह हीरो था ।


उस रात को भी उसके आंखों में जोहन छाया था वैसे ही लाईट गुल हो गई, सन्नाटा मीलों तक पसरा था । वर्दीवालों की आवाजें तेज हो गई फिर जनरेटर चलने की आवाज के साथ सर्चलाईट पुन: चमकने लगे । ‘ठांय ।‘ की आवाज नें उंघते वर्दीवालों को चौंका दिया, उन्हेंर कुछ समझ में आता तब तक पूरे सर्चलाईट गोली से उड चुके थे । अंधेरे में भगदड मच गई । दादा लोगों की टोली कैम्प् में घुस आई थी । चीख-पुकार, गालियों के संग गोलियों के आदान प्रदान और आर्तनाद से वह सिहर उठी । अपने भाई को अपने छाती में छिपाकर चद्दर में अपने पूरे शरीर को ढांप कर चुरू-मुरू दुबक गई । घंटो तक बाहर का माहौल वैसे ही बना रहा, उसकी बंद आंखें बाहर के दृश्यों को आवाजों से महसूस करती रही । दहशत में नींद हवा हो गई थी, दाई-बाबू भी जाग गए थे पर सभी अनजान बने दुबके थे ।


सुबह धीरे-धीरे हिम्मत करते हुए लोग अपने अपने घरों से बाहर निकलने लगे । बाहर का दृश्य देखकर सभी का टट्टी सटक गया । अपने परिजनों का जला व गोलियों से बिंधा लाश देख कर करेजा कांप गया । मौत का भय यहां भी ताण्डव करता नजर आया ।


दो-तीन दिन खुसुर-फुसुर के बाद दाई बाबू कैम्प से महुआ बीनने निकलकर बाहर दूर सडक में उसका और बच्चों का इंतजार करने लगे । वह बच्चों को घुमाने के बहाने कैंम्प से टसक गई और इंतजार करते दाई बाबू के पास पहुचकर कैम्प को दूर से प्रणाम किया जैसा उसने कैम्प् में आने के पहले अपने गांव के बूढा देव को किया था । ‘जीव रही त कहूं कमा खा लेबो नोनी के दाई ।‘ बाबू के शव्दे नें मौत के भय से सुकुरदुम हुए पूरे परिवार को बल दिया और वे सडक पर आ रही बस को रोककर उसमें चढ गए । कहां जाना है यह बाबू भी तय नहीं कर पाये थे, अभी तो यहां से निकलना जरूरी था । एक शहर फिर दूसरा शहर फिर ........ इन पांच जिन्दगियों नें कई कई शहरों को पार कर, कंटेनरों में भरा कर आसाम के बर्मा से सटे एक गांव तक का सफर तय किया ।


यहां नदी किनारे चार पांच चिमनी वाले ईंट भट्ठे में बहुतायत छत्तीसगढिया मजदूर थे । दाई बाबू नें ईंट भट्ठे के खोला में जब अपना मोटरा रखा तब उनके आंखों में खुशी को झांकती हुई वह झाडू उठा कर कमरे में झाडू लगाने लगी । नदी किनारे फैले जंगल अपने से लग रहे थे, आजू बाजू के लोग भी अस्सीं कोस नव बासा में भी अपने थे । चिंता और भय झाडू के चलते ही दूर आसमान में उड चला ।


अब वह भी दाई बाबू के साथ भट्ठे में काम करने लगी । बाबू नें रास्ते में उसे बताया था कि उस दिन और लोगों के साथ जोहन की भी मौत हो गई थी । अब उसे रात में जोहन के सपने नहीं आते, सभी सहेलियां छूट गई । यहां आकर वह कुछ गुमसुम सी हो गई है । उसका खिलता यौवन ठहर सा गया है, अल्लडता जब्बं हो गई है, परिपक्वता छा गई है ।


एक साथ बीस ईंट को सिर में लेकर गहरे भट्ठे से जब वह निकलती तब दूर से उसके संपूर्ण शरीर को गिद्ध की तरह निहारते मुंशी को वह कनखिंयों से देखती और एक हाथ में साडी के पल्लू को पकड कर अपने ढपे स्तनों को और ढापती । कभी कभी वर्दी वाले लोगों का दल भट्ठे पर आता और मजदूरों की ओर हाथ दिखा कर मुंशी से कुछ फुस-फुसाता फिर चला जाता । यह दल वैसे ही शक्ल सूरत के होते जैसे उसने अपने गांव और कैम्प के वर्दीवालों का देखा था । उसने एक अधेड छत्तीसगढी महिला से शंका से पूछा ‘नागा पुलिस अउ मिजो पुलिस ?  का इंहों दादा मन के राज हे ?’ ‘ नहीं नोनी, का लिट्टे क उल्‍फा कहिथे दाई, दादा ये येमन इंहा के फेर हमन ला कुछू नि करे ।‘ अधेड महिला नें बताया था । उसके मन में पुन: भय का प्रवेश हो जाता है पर वह अपने लोगों से बात कर आश्वस्थ हो जाती है ।


कुछ माह ऐसे ही चलता रहा, एक दिन वर्दीवालों का फरमान मुंशी नें पढ सुनाया जिसका सार यह था कि यह जमीन उनकी है यहां कोई दूसरे प्रदेश का आदमी नहीं रह सकता, पांच दिन के अंदर अपने घर भाग जाओ नहीं तो गोली से उडा देंगें । बाजू भट्ठे के एक बुजुर्ग मजदूर नें दाई बाबू को शाम को आकर समझाया ‘भाग जाना ठीक हे बाबू, इंहा बात कहत बंदूक चलथे, परदेश के सोंहारी ले तो अपन घर के पेज पसिया बने ।‘ वह यहां की परिस्थिति से तो वाकिफ नहीं थी पर वह ऐलान का मतलब समझती थी, फरमान की ताकत जानती थी । कहां जायेंगें वे, कहां है उनका घर ?


छत्तीसगढ पर लिखी गई मोटी मोटी किताबों को एयरवेज के विमान से लाकर मैं डिब्रूगढ के सितारा होटल में बैठकर छत्तीसगढ की आदिवासी अस्मिता पर एक बडा लेख लिखने में मशगुल हूं, मेरे सुपरवाईजर नें मुझे उनसे परिचय कराया है, वे लगभग 25 किलोमीटर पैदल चल कर शहर आये हैं । पेट्रोलियम प्रोडक्ट के मेरे कंपनी के टैंकरों की खेप सुल्फा से लेनदेन के बाद आज छत्तीसगढ के लिए रवाना होने वाली है पर वे पांचों अपने मोटरा के पास बैठे हैं मेरे आग्रह पर भी किसी भी ट्रक में सवार नहीं हो रहे हैं, शाम हो रही है और मुझे भी आज ही परिवार सहित आसाम छोड देना है ।
(यह कहानी, परिस्थितियां और इसके पात्र पूर्णतया काल्‍पनिक हैं )

संजीव तिवारी

12 comments:

  1. ओह, यही सच है? बड़ा कष्टदायक है। मैने झारखण्डी करमा देखी है भदोही में भट्टा मजूर जवान होती लड़की, तीस साल पहले। जाने कहां होगी।
    पर यह पढ़ कर उसके लिये परेशानी सी होती है।

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  2. अच्छा लिखा है लेकिन कई जगह पर भाषा ना समझपाने का कष्ट भी--
    ‘भाग जाना ठीक हे बाबू, इंहा बात कहत बंदूक चलथे, परदेश के सोंहारी ले तो अपन घर के पेज पसिया बने ।‘ लेकिन जानता हूं कि भावार्थ क्या बन रहा था।
    सुंदर, अति उत्तम।।।।

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  3. आपका लेखन इतना सजीव है कि सब चित्र आँखों के सामने प्रकट हो जाते हैं. सहज सरल लेकिन प्रभावशाली छाप छोड़ जाता है.

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  4. न जाने कितने लोग अपने घर से बेघर होकर दरदर की ठोकरें खाते हुए एक नया घर ढूँढ रहे हैं। कष्टदायक स्थिति को बताती एक भावपूर्ण कहानी!
    घुघूती बासूती

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  5. अच्छी कहानी, कहीं कहीं समझने में थोडी तकलीफ़ पेश आयी लेकिन भाव समझ में आते रहे ।

    आभार,

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  6. badhai sanjoo.raipur aao to milo press club me

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  7. संजीव भाई बहुत बढिया , साहित्‍य समाज का दर्पण है, आपकी इस कहानी में छत्‍तीसगढ के आंचलिक परिवेश से कथानक आरंभ हो रहा है, मध्‍य भाग में कहानी पूरे देश की ज्‍वलंत समस्‍या से जुड जाती है,कथ्‍य के साथ साथ शिल्‍प भी बहुत शानदार है,पर सबसे प्रबल भाव पक्ष है,इसी तरह लगे रहिए...आपकी कहानी साबित करती है कि कलम कभी खामोश नहीं रहती , विसंगतियो को दूर करने , अंधेरे को चीरने के लिए लगी रहती है....

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  8. एक भावपूर्ण कहानी....

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  9. बहुत अच्छा विषय चुना है. अपने ही देश में बेगाने हैं लोग - किन-किन तानाशाहों से लडेंगे बेचारे और कब तक?

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  10. sach kitna bhayanak !
    kahani gumsum bana gai.......

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  11. परिस्थितियाँ इतने अच्छे से बयान की हैं आपने कि ऐसा लग रहा है कि हम कहानी को देख रहे हैं.

    "बंधन में परदेशी वर्दीवालों से बचकर रहने की हिदायत दे किशोर व जवान लडकियों की मांए दहशत के बावजूद चेहरे पर सरकार के दिये आवश्य‍क रूप से लगाए जाने वाले मुस्कान को चिपकाये रहतीं ।"

    कितनी खूबसूरती से मजबूरी को बता दिया है. हालांकि कहीं कहीं शब्द समझने कि दिक्कत है पर कहानी का मूल रूप बनाये रखने के लिए आवश्यक भी है.

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  12. nice script,
    lekin ek baat bataye sanjeev ji,
    situation ka jo aapne yaha chitrann kiya hain , real me situation ishse bhi " Bhayaanak" hai. jishki yatharta bhi aapke iss kalpnik kalpanaa se bahut hi kathorr hain.

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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