ब्लॉग छत्तीसगढ़

09 October, 2008

आर्य अनार्यों का सेतु : रावण

परम प्रतापी एवं शास्‍त्रों के ज्ञाता ब्राह्मण कुमार रावण का स्‍मरण आज समीचीन है क्‍योंकि आज के दिन का वैदिक महत्‍व उसके अस्तित्‍व के कारण ही है । हमारे पौराणिक ग्रंथों में रावण को यद्धपि विद्वान, नीतिनिपुण, बलशाली माना गया है किन्‍तु सभी नें उसे एक खलनायक की भांति प्रस्‍तुत किया है । एक कृति की प्रकृति एवं उसके आवश्‍यक तत्‍वों की विवेचना का सार यह कहता है कि, कृति में नायक के साथ ही खलनायकों या प्रतिनायकों का भी चित्रण या समावेश किया जाए । हम हमारे पौराणिक ग्रंथों को सामान्‍य कृति मानकर यदि पढते हैं तो पाते हैं कि रावण के संबंध में विवेचना एवं उसके पराक्रम व विद्वता का उल्‍लेख ही राम को एक पात्र के रूप में विशेष उभार कर प्रस्‍तुत करता है । चिंतक दीपक भारतीय जी अपनी एक कविता में कहते हैं -

रावण तुम कभी मर नहीं सकते 
क्योंकि तुम्हारे बिना राम को लोग
कभी समझ नहीं सकते. . .

खलनायक प्रतिनायक एवं सर्वथा सामान्‍य पात्रों को भी अब महत्‍व दिया जा रहा है उनके कार्यों का विश्‍लेषण कर उनके उज्‍जव पन्‍नों पर रौशनी डाली जा रही है । वर्तमान काल नें रावण के इस चरित्र का गूढ अध्‍ययन किया है, पौराणिक ग्रंथों से उदाहरणों को समेट कर कई ग्रंथ लिखे जा रहे हैं जिसमें रावण के उज्‍जव चारित्रिक पहलुओं को समाज के सामने उकेरा जा रहा है ।

रावण के चरित्र को वर्तमान समाज में अपने राक्षसी पौराणिक रूप में स्‍थापित करने का मुख्‍य श्रेय तुलसीदास जी कृत रामचरित मानस को जाता है । जैसा कि इस महाकाव्‍य के शीर्षक से ही ज्ञात हो जाता है कि इसमें राम के चरित्र का चित्रण है अत: इसमें सारी भूमिकांए राम के इर्द गिर्द ही घूमती है एवं समाज को धर्म के लिये प्रेरित करती है । रामचरित मानस की जनप्रिय भाषा एवं रागात्‍मकता, राम-रावण के इस युद्व कथा को सर्वत्र स्‍थापित करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करता है । इसके बाद जन समझ के अनुसार बाल्‍मीकि कृत संस्‍कृत रामायण इस चरित्र को समाज के सामने प्रस्‍तुत करता है । महर्षि बाल्‍मीकि राम के संपूर्ण चरित्र के साक्षात दृष्‍टा रहे हैं, वे रावण के चरित्र को कुछ विशिष्‍ठ रूप से उभारने में सफल हुए हैं । वाल्मीकि रावण के अधर्मी होने को उसका मुख्य अवगुण मानते हैं। वहीं तुलसीदास जी केवल उसके अहंकार को ही उसका मुख्य अवगुण बताते हैं। उन्होंने रावण को बाहरी तौर से राम से शत्रु भाव रखते हुये हृदय से उनका भक्त बताया है। तुलसीदास के अनुसार रावण सोचता है कि यदि स्वयं भगवान ने अवतार लिया है तो मैं जाकर उनसे हठपूर्वक वैर करूंगा और प्रभु के बाण के आघात से प्राण छोड़कर भव-बन्धन से मुक्त हो जाऊंगा। वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों ही ग्रंथों में रावण को बहुत महत्त्व दिया गया है। राक्षसी माता और ऋषि पिता की सन्तान होने के कारण सदैव दो परस्पर विरोधी तत्त्व रावण के अन्तःकरण को मथते रहे हैं।

आर्य एवं राक्षस संस्‍कृति के ‘धर्म’ और ‘अधर्म’ के युद्ध में धर्म की अपनी अपनी परिभाषा व मान्‍यता को महर्षि बाल्‍मीकि कई स्‍थानों पर बेहतर ढंग से चित्रित करते हैं । युद्ध भूमि पर राम खडे हैं, रावण अपने पूर्ण सुसज्जित युद्ध रथ में आरूढ युद्ध भूमि पर आते हैं, राम को पैदल देखकर उन्‍हें अपना रथ देने की पेशकश करते हैं । राम के इन्‍कार करने पर रावण अपने सारथी से कहता हैं ‘सारथी रथ रोको ! मुझे भी भूमि में उतरना है, आज तक मैनें जो चाहा वही किया किन्‍तु अब तो धर्म युद्ध लडना है ।‘ एक तरफ रावण को अधर्मी स्‍थापित किया गया वहीं रावण युद्ध जैसे क्षत्रियोचित कर्म में रत होते हुए भी ऐसा धार्मिक नीतिवचन कहते हैं ।

राम-रावण युद्ध के पीछे जो यथार्थ छुपा हुआ है उसे उजागर करना कवि का मूल उद्देश्‍य रहा है, दोनों नें अपने अपने कर्तव्‍यों में आबद्ध एक रंगमंच के पात्र के अनुसार कर्म किया है । चूंकि भगवान विष्‍णु नें भी नौ माह मानवी माता के गर्भ में बिताये हैं इस कारण उनमें मानवोचित भूलों का समावेश आवश्‍यक था । इस युद्ध कथा के दौरान हमारे मन में कई प्रश्‍न उमडते हैं, जिसे राम के पक्ष से धर्म कहा गया, क्‍या धर्म है या यह शव्‍द जाल है बिल्‍कुल उसी तरह जिस तरह कानून के किताबों में किसी धारा का अपने स्‍वार्थ के अनुरूप अर्थान्‍वयन किया जाना । जब राम छुपकर बाली का वध करता है तब यह ‘धर्म’ होता है, विभीषण शरणागत होता है तब भी यह ‘धर्म’ होता है क्‍योंकि इन दोनों कार्यों के पीछे राम का स्‍वार्थ छिपा है । यह स्‍वार्थ सामाजिक मान्‍यताओं के अनुसार उद्देश्‍य है, एक साधन है, राक्षसों से पृथ्‍वी को मुक्‍त कराने के लिए । भाई-भाई में फूट डालकर राज करने की नीति भी ‘धर्म’ है । विभीषण का विलग होने का दुख , लक्ष्‍मण के शक्ति बाण लगने से मिलाकर देखें । सूर्पणखा प्रसंग, जिसके बाद से रावण के हृदय में उठी ज्‍वाला उसे यहां तक ले आई थी उसमें भी इस धर्म को अहम कहा गया, जिस धर्म की दुहाई आर्य देते हैं उसी धर्म के अनुसार स्त्रियों पर शस्‍त्रों से प्रहार न करना आर्य संस्‍कृति मानी जाती रही है किन्‍तु आर्य संस्‍कृति के ध्‍वजवाहक राम के सम्‍मुख लक्ष्‍मण नें सूर्पनखा को नासिका विहीन किया । बहुत प्रसंग हैं इस तथाकथित धर्म के एवं इसका सुविधानुसार अपने अनुरूप अर्थान्‍वयन के । इन सभी तथ्‍यों को यदि ध्‍यान पूर्वक देखा जाये, तो रावण तार्किक जरूर रहा है, लेकिन उसे धर्म विरोधी या अनैतिक नहीं कहा जा सकता ।

पौराणिक आख्‍यानों के अनुसार भगवान विष्‍णु के द्वारपालों जय विजय को शापवश मधु-कैटभ, हिरणाक्ष्‍य, हिरण्‍यकश्‍यप व रावण-कुंभकरण का पात्र अभीनित करना पडा था किन्‍तु मूलत: वे थे तो भगवान विष्‍णु के आभामंडल में दीप्‍त प्राण । इन पात्रों को निभाते हुए जय विजय नें रावण के चरित्र का गजब का अभिनय किया । अपने अन्‍य चरित्रों में उसका स्‍वरूप इतना दैदीप्‍यमान नहीं नजर आता जितना रावण के चरित्र में ।
सालों से हम रावण के जन्‍म की धिसीपिटी कहानी सुनते और टीवी में देखते आ रहे हैं । इस पर आध्‍यात्मिक व दार्शनिक दलीलें भी सुनते आ रहे हैं, यूं कहें कि हमारे कान पक गये हैं इन सपाट कहानियों से । वही उत्‍तम कुल पुलस्‍त के ‘नाती’ इस ‘नाती’ शव्‍द, पर यहां उपलब्‍ध धर्मग्रंथों के अनुसार दादा का कद बडा नहीं है, यहां रावण अपने संपूर्ण चरित्र में पुलस्‍त से भारी पडता है । अपने सभी पूर्वजनों से अलग स्‍वरूप का स्‍वामी रावण, आर्य और अनार्यों के बीच का एक महत्‍वपूर्ण सेतु था ।

वृहस्‍पति के पुत्र महर्षि कुशध्‍वज की पुत्री सौंदर्यवती पर रावण का मोहित होना व उसका कौमार्यभंग करने को उद्धत होना, नलकुबेर की प्रेयसी अप्‍सरा रंभा के साथ दुराचार करना यही दो कार्य रावण को खलनायक सिद्ध करने के लिए पौराणिक आख्‍यान बने बाद में रंभा का सीता के रूप में अवतरण व सीता का, (सूर्पनखा के नाक कान कटने की प्रतिशोधी ज्‍वाला के कारण) हरण नें रावण को महापातकी सिद्ध कर दिया । इन तीन धटनाओं के अतिरिक्‍त लाक्षणिक रूप से साक्षसी संस्‍कृति वश अत्‍याचार भले हुए हों किन्‍तु स्‍पष्‍टत: रावण नें ऐसा कोई कार्य नहीं किया जिससे कि उसकी सामाजिक निंदा की जाए ।

ज्ञानी रावण के अस्तित्‍व का प्रमाण है कि हमारे पौराणिक ग्रंथों में कृष्‍ण यजुर्वेद में संग्रहित रावण की अधिकाधिक वेदोक्तियां आज तक वैदिक आर्यों को मान्‍य है, रावण ज्‍योतिष ग्रंथों एवं तात्रिक ग्रंथों के भी रचइता हैं, रावण कृत शिव ताण्‍डव स्‍तोत्र का सस्‍वर गायन पुरातन से आज तक लगातार हो रहा है । रावण मे कितना ही राक्षसत्व क्यों न हो, उसके गुणों को विस्मृत नहीं किया जा सकता। रावण एक अति बुद्धिमान ब्राह्मण तथा शंकर भगवान का बहुत बड़ा भक्त था। वह महा तेजस्वी, प्रतापी, पराक्रमी, रूपवान तथा विद्वान था। रावण के क्रूर और अनैतिक चारित्रिक उदाहरणों के अतिरिक्‍त उसके उजले पक्षों को भी यदि हम आज के दिन याद कर लेवें तो वर्तमान परिस्थितियों के लिए उचित होगा ।

सुशीला सेजवाला के शव्‍दों में -

रावण हूं मैं, कांपते थे तीनों लोक जिससे
पर आज का मानव निकला, 
चार हाथ आगे मुझसे ...  .
संजीव तिवारी


चित्र - thatshindi   एवं भास्‍कर से साभार 

इटैलिक व नीले रंग में लिखे गए वाक्‍यांश हिन्‍दी विकीपीडिया के हैं इस कारण हमने उनका लिंक हबना दिया है
(यह आलेख दैनिक छत्‍तीसगढ के 8 अक्‍टूबर'2008 के संपादकीय पेज क्र. 6 पर प्रकाशित हुआ है )

17 comments:

  1. संजीवजी, आपके ब्लाग पर अक्सर आता रहता हूं। पर जाहिर नहीं कर पाया था कभी।

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  2. सत्य वचन महाराज । आपको और आपके परिवार को दशहरे की बधाई।

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  3. बहुत अच्छा लिखा है. दशहरे की बहुत बहुत शुब कामनाएं

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  4. सच है भैया; विपरीत गुणों के न होने पर सद्गुणों की क्या पूंछ?
    आपको दशहरा शुभ हो!

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  5. विजय दशमी पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाऍ.

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  6. मेरे मन में भी कभी कभी यह विचार आता है कि हर साल रावण दहन करके कुछ अन्याय सा होता है . अधर्म की पराकाष्ठा तो रावण कतई नहीं था.लेकिन शायद पुराणों में इससे अधिक रोचक कोई और कथा नहीं है .और उस कथा का केन्द्रीय खलनायक होने का दंड रावण को आज तक मिल रहा है. मुझे रावण से हमदर्दी है . लेकिन ख़ुद के प्रति मैं निर्मम हूँ.

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  7. एकोअहम द्वितीयोनास्ति ना भूतो ना भविष्यति का पर्याय रावण मात्र अपने अहंकार और पतिव्रता स्त्री के अपमान के कारण सर्वनाश को प्राप्त हुआ!

    आपको विजयशमी की हार्दिक शुभकामानायें

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  8. िवजयदशमी पवॆ की शुभकामनाएं ।
    अच्छा िलखा है आपने

    दशहरा पर मैने अपने ब्लाग पर एक िचंतनपरक आलेख िलखा है । उसके बारे में आपकी राय मेरे िलए महत्वपूणॆ होगी ।

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

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  9. यदि रावण को दुर्गुणों का प्रतीक मान भी लिया जाए तो आज कितने "गुरु गुड" से "चेला शक्कर" हो चुके "रावणों" का संहार तो नहीं "सत्कार" जरुर हो रहा है. निरर्थक उत्सवी मानस से रावण के मंहगे होते जा रहे पुतले को फूंकते और ताली पीटते लोगों की भीड़ समाज के दशा और दिशा को प्रतिबिंबित करता है. आपने एक विद्वत पूर्ण लेख से दुविधा की मरीचिका को दूर किया है. मैं आपसे सहमत हूँ. आवश्यकता आज उस हंस-मानस की है जो नायक और प्रतिनायक में भेद निश्छल मन से कर सके.

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  10. सप्तद्वीप के स्वामी और राक्षस संस्कृति के इस महानायक के चरित्र की समीक्षा के लिए धन्यवाद. संयोग है कि भारतीय कोस्ट गार्ड का वाक्य आज भी "वयम रक्षामः" ही है.उसका

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  11. नमस्कार!

    bahut hi gahan-manan aur adhyan ke baad hua lekhan aisa hi hota hai.

    bahut badhiya.
    ab पढिये: अब पत्रकार निशाने पर , क्लिक कीजिये
    http://hamzabaan.blogspot.com/2008/10/blog-post.html

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  12. सारगर्भित लेख के लिए बधाई।

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  13. आज कहीं न कहीं हर मानव मे एक रावण छुपा है ,
    इसलिए कहता हूँ संजीव जी ......
    दशहरे के दिन घर से न निकलें ....
    गलिओं मैं राम घुमते हैं..........
    हा... हा ....हा...
    अत्यंत सराहनीय आलेख ....
    साधुवाद.........

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  14. bhaiya kya aap ye rambha ke sita ban avtarit hone wali baat par thodi raushni dal sakte hain....

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  15. संजीव वाकई आपके साहित्य संकलन व प्रस्तुतीकरण के

    हम कायल हो गए ........बहुत ही सुन्दर ढंग से चित्रण

    रावण के चरित्र का .........पुनः विजयादशमी की बधाई के

    साथ

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  16. wah Tiwari ji Ravan ke bare me ek naye drishtikon se likhe gaye lekh ke liye vijaydashami par badhai...kafi vicharottejak lekh hai lekin apne jo Ravan ke 3 chuk (kukarm0 bataye hain bas wahi us kaal ke liye Ravan ko asur kahane ke liye paryapt the...phir bhi gyan to jahan se mile lena chahiye phir wo Ravan hi kyon na ho....

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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