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09 February, 2010

लोहिया पर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, बालकवि बैरागी व अन्य सात की कालजयी कविताएं

राम मनोहर लोहिया जी पर आधरित मेरे पिछले पोस्ट पर भाई अनुनाद सिंह जी ने टिप्पणी की, कि लोहिया जी की इस कडी का लिंक  हिन्दी विकि के "राम मनोहर लोहिया" वाले लेख पर दे रहा हूं. और बडे भाई गिरीश पंकज जी ने भी बतलाया कि यह वर्ष लोहिया जी का जन्म शताब्दी वर्ष है(23 मार्च 1910), तो हमे लगा इस पर और सामग्री अपने ब्लाग पर प्रस्तुत की जाये. इसी क्रम मे लोहिया जी पर  सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, बालकवि बैरागी व अन्य सात की कालजयी कविताएं हम यहा प्रस्तुत कर रहे है -
   
1. शेष जो था
बालकृष्ण राव

कुछ भी न कहा,
जब तक सह सका
बिन बोले सहा-
और जब सहा न गया,
कहना तब चाहा
पर कहा न गया।
जो जितना जान सका
उतना ही बखान सका-
कौन भला नीचे जा,
चेतना के निम्नतम छोर से
कर सका पीड़ा का तल स्पर्श
भाषा की अधबटी डोर से?
माना गया वही जो जान गया,
कहा गया वही जो सहा गया,
शेष जो था
अनदेखा सपना था
किन्तु वही
पूरी तरह अपना था।

1. लोहिया 
नरेश सक्सेना
(मृत्यु से लगभग एक वर्ष पूर्व लिखी गई)

एक अकेला आदमी
गाता है कोरस
खुद ही कभी सिकन्दर बनता है
कभी पोरस
(युद्घ से पहले या उसके
बाद या उसके दौरान)
जिरह-बख्तर पहन कर घूमता है अकेला
और बोलता है योद्घाओं की बोलियाँ
खाता है गोलियाँ
भाँग की या इस्पात की?
देश भर में होती है चर्चा
(अपनी ही जेब से चलाता है देश भर का खर्चा)
एक पेड़ का जंगल
शिकायत करता है वहाँ जंगलियों के न होने की।

3.
उमाकान्त मालवीय

कोई चाहे जितना बड़ा हो,
उसका अनुकरण
उसका अनुसरण
तुम्हारी गैरत को गवारा नहीं,
तुम्हारा अनुकरण
तुम्हारा अनुसरण
कोई करे ऐसी हविस भी नहीं।
अनुकरण
अनुसरण
की बैसाखियाँ तुम्हें मंजूर नहीं
इसलिये,
जब तुम्हें मिले सन्देश
उस पार दूर गाँव के।
तुम चल दिये छोड कर आग पर
निशान पाँव के।

4. किताब का एक पृष्ठ 
प्रदीप कुमार तिवारी

एक पृष्ठ कम है
उस किताब का
जिसके कि-
हम, आप सब
एक अलग अलग पृष्ठ हैं,
उस किताब से
वह पृष्ठ तो निकल गया
किन्तु-
निकलते निकलते छोड़ गया
अपने दर्शन की
अपने विचारों की
अपनी शैली की
एक अमिट, रुपहली छाप
उन सभी पृष्ठों पर
जो हम और आप सबके
रूप में वर्तमान हैं।

5. लोहिया के न रहने पर
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

यह कविता आदरणीय अफलातून जी के ब्लाग यही है वह जगह मे प्रकाशित है, पाठक इसे यहां से पढ सकते है.

6. हमारी धमनियों के तुम मसीहा थे
बालकवि बैरागी

ओ बगावत की प्रबल उद्दीप्त पीढ़ी के जनक!
हम तुम्हें कितना जियेंगे कह नहीं सकता!
न जाने क्या समझ कर आँख मूँदे चल दिये तुम
हलाहल जो बचा है हम उसे कितना पियेंगे कह नहीं सकता।
तुम्हें देखा, तुम्हें परखा तुम्हें भुगता, सुना,
समझा तुम्हें हर रोज पढ़ते हैं तुम्हारा ढंग
अपना कर कभी हम बात करते हैं
तो वे मूरख समझते हैं कि लड़ते हैं-
मुबारक हो उन्हे उनकी समझ।
नयी भाषा, नई शैली नये रोमांच के सर्जक!
तुम्हारी हर अदा भरसक सहेजेंगे,
अमानत है शिराओं में तुम्हारे स्वप्न
ऐसे छलछलाते हैं कि हर बेजान गुम्बज को
हमारे स्वप्न से गहरी शिकायत है
मुबारक हो उन्हे उनकी शिकायत।
तुम्हारा 'वाद' क्या समझू
तुम्हारी जिद, तुम्हारा ढंग प्यार है
शुरू तुम कर गये मेरी जवानी के भरोसे पर
मुझे वो जंग प्यारा है।
यकीं रखो कि अंतिम फैसला होगा वही जो तुमने चाहा था
तुम्हारा हौसला झूठा नहीं होगा, भले ही टूट जाऊँ मैं, मेरी काया,
मेरी रग रग मगर संकल्प जो तुमने दिया टूटा नहीं होगा।
जवानी आज समझी है कि तुम क्या थे तुम्हें जो दर्द था वो हाय!
किसका था तुम्हारा अक्खड़ी लहजा तुम्हारी
फक्कड़ी बातें तुम्हारी खुश्क सी रातें
न समझो इस लहू ने टाल दी,
या कि सदियाँ भूल जायेंगी न अपना 'प्राप्य तुमको
दे सके हम सब मगर उसको तुम्हारी धूल पायेगी।
करोड़ों उठ गये वारिस तुम्हारी एक हिचकी पर
कहीं विप्लव कुँआरा या कि ला औलाद मरता है?
हमारी धमनियों के तुम मसीहा थे, मसीहा हो सुनो!
तुमको बगावत का हर एक क्षण याद करता है।

7. लोग करते हैं बहस
ओंकार शरद

'लोहिया चरित मानस' का कर्म पक्ष शेष हुआ।
आज दिल्ली का एक घर खाली है,
और कॉफी हाउस की एक मेज सूनी है;
बगल की दूसरी मेज पर लोग करते हैं बहस-
लोहिया को स्वर्ग मिला, या मिला नरक!
जिसने जीवन के तमाम दिन बिताए भीड़ों और जुलूसों में,
और रातें, रेल के डिब्बो में, अनेकानेक वर्ष काटे कारागारों में,
जो जूझता ही रहा हर क्षण दुश्मनों और दोस्तों से;
जिसका कोई गाँव नहीं, घर नहीं,
वंश नहीं, घाट नहीं, श्राद्घ नहीं;
पंडों की बही में जिसका कहीं नाम नहीं;
जिसने की नहीं किसी के नाम कोई वसीयत,
उसके लिए भला क्या दोजख, और क्या जन्नत!
मुझे तो उसके नाम के पहले 'स्वर्गीय' लिखने में झिझक होती है;
उसे 'मरहूम' कलम करने में सचमुच हिचक होती है!

साभार इतवारी अखबार

6 comments:

  1. संजीव भाई ,सर्वेश्वर की यह कविता लोहिया की पिछली जयन्ती पर मैंने अपने ब्लॉग पर छापी थी , आपके स्वत्वाधिकार के बावजूद । अब क्या करें ?

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  2. @ आदरणीय अफलातून जी, आपने मेरे ब्लाग पर टिप्पणी की इसके लिये बहुत बहुत धन्यवाद.
    अपने ब्लागपोस्ट मे "स्वत्वाधिकार" लिखने का अभिप्राय मेरे स्वयं के द्वारा लिखित रचनाओ से है यह स्वाभाविक सत्य है कि, जो रचनाये मैने साभार अन्यत्र से ली है उन पर मेरा "स्वत्वाधिकार" हो ही नही सकता.
    आपके प्रश्न के उत्तर मे मै यह कहना चाहूंगा कि आपने मुझे मेरी क्षुद्रता का एहसास कराया इसके लिए पुन: धन्यवाद. आपके पोस्ट का लिंक मैने इस पोस्ट मे दे दिया है.

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  3. प्रिय संजीव भाई ,
    कभी भी खुद को क्षुद्र न समझें । मुझे लगता है कि लोहिया और सर्वेश्वर दोनो ही कॉपीराईट और पेटेन्ट के मौजूदा दर्शन से सहमत न होते । ज्ञान की बातें अधिक से अधिक फैलें बिना रोक-टोक,मुनाफ़े के। आप कृपया उस कविता को यहाँ से न हटायें ।
    सविनय,
    अफ़लातून

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  4. अब आप दोनों इतनी विनम्रता से काम लेंगे तो टिप्पणी करना मुश्किल हो जायेगा भाई ! कवितायें कालजयी हैं ये तो सही है किन्तु आप दोनों से भी कुछ सीखने का मौका मिल ही रहा है :)

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  5. ....बेहद प्रभावशाली व प्रसंशनीय प्रस्तुति!!!

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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