ब्लॉग छत्तीसगढ़

14 February, 2010

कबीर हँसणाँ दूरि करि, करि रोवण सौ चित्त । बिन रोयां क्यूं पाइये, प्रेम पियारा मित्व ॥

प्रेम दिवस पर जन्मी भारतीय सिनेमा जगत की अद्वितीय अभिनेत्री मधुबाला जीवन भर प्यार के लिए तरसती रही. उन्हें जब सच्चा प्यार किशोर कुमार के रूप में तब मिला तब तक वह मौत के काफी करीब आ चुकी थी और अपने जन्मदिन के महज कुछ ही दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई। उनका मूल नाम मुमताज बेगम देहलवी था उनका जन्म दिल्ली के एक मध्यवर्गीय मुस्लिम परिवार में 14 फरवरी 1933 को हुआ था। उनके पिता अताउल्लाह खान दिल्ली में रिक्शा चलाते थे। अताउल्लाह खान को जब एक भविष्यवक्ता ने बताया की कि मधुबाला का भविष्य उज्ज्वल है और वह बड़ी होकर बहुत शोहरत पाएगी। तब वह मधुबाला को लेकर मुंबई आये। और संघर्षों के बाद वर्ष 1942 में फिल्म बसंत में मधुबाला को बतौर बाल कलाकार बेबी मुमताज के नाम से काम करने का मौका मिला। तद्समय की अभिनेत्री देविका रानी बेबी मुमताज के सौंदर्य को देखकर काफी मुग्ध हुई और उन्होंने उनका नाम मधुबाला रख दिया था। जिन्दगी भर प्रेम को तरसती मधुबाला के लिये आज प्रेम दिवस पर प्रेम के बहुविद आयामो को सामान्य जन तक पहुंचाने वाले कबीर के कुछ प्रेम दोहों के साथ हमारी श्रद्धांजली-
साधु कहावत कठिन है, लम्बा पेड़ खजूर ।
चढ़े तो चाखै प्रेम रस, गिरै तो चकनाचूर ॥
प्रेम न बड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा-प्रजा जोहि रुचें, शीश देई ले जाय ॥
प्रेम प्याला जो पिये, शीश दक्षिणा देय ।
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ॥
छिन ही चढ़े छिन ही उतरे, सो तो प्रेम न होय ।
अघट प्रेम पिंजरे बसे, प्रेम कहावे सोय ॥
जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान समान ।
जैसे खाल लुहार की, साँस लेतु बिन प्रान ॥
ते दिन गये अकारथी, संगत भई न संत ।
प्रेम बिना पशु जीवना, भक्ति बिना भगवंत ॥
पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय ।
ढ़ाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंड़ित होय ॥
प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बजाय ।
चाहे घर में बास कर, चाहे बन मे जाय ॥
ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं ।
सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठें घर माहिं ॥
कबीरा प्रेम न चषिया, चषि न लिया साव ।
सूने घर का पांहुणां, ज्यूं आया त्यूं जाव ॥
कबीर हँसणाँ दूरि करि, करि रोवण सौ चित्त ।
बिन रोयां क्यूं पाइये, प्रेम पियारा मित्व ॥
प्रेम-प्रिति का चालना, पहिरि कबीरा नाच ।
तन-मन तापर वारहुँ, जो कोइ बौलौ सांच ॥
मानि महतम प्रेम-रस गरवातण गुण नेह ।
ए सबहीं अहला गया, जबही कह्या कुछ देह ॥
कबीर घोड़ा प्रेम का, चेतनि चाढ़ि असवार ।
ग्यान खड़ग गहि काल सिरि, भली मचाई मार ॥
आपा भेटियाँ हरि मिलै, हरि मेट् या सब जाइ ।
अकथ कहाणी प्रेम की, कह्या न कोउ पत्याइ ॥

साहेब बंदगी ...... पतिया ले भोजली  तोर अगोरा हे गोंदा फूल धरे तरिया के पार मा तोला अगोरत हंव आजा टिपिया ले-

6 comments:

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  2. गज़ब की जुगलबंदी की है संजीव भाई आपने ! ईर्ष्या हो गई आपसे...भला हमने इस नुक्तये नज़र से कभी क्यों नहीं सोचा ! कबीर...मधुबाला और वेलेंटाइन ! कालखंड...स्थान ...व्यक्तित्व और कर्म से भिन्न इंसानों के दरम्यान अभिन्नता प्रेम की ही तो है !

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  3. संजीव, आपको नमस्कार भी
    और आयुष्मान भी
    बहुत दिनों के बाद अपने डेश बोर्ड पर
    आरंभ दिखा वह भी आज प्रेम दिवस पर
    चित्रण और दोहों का संकलन तो आज इस
    पर्व के लिए समर्पित है
    पर एक बात पुनः जोर देकर कहना चाहूँगा
    इस प्रेम पर्व को एक दिन के प्रेम के लिए नहीं
    वरन अटूट व सच्चे प्रेम के लिए मनाएं

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  4. अति सुंदर!
    जलु पच सरिस बिकाई देखहु प्रीत कि रीति भलि ।
    बिलग होई रसु जाई कपट खटाई परत पुनि । ।

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  5. अद्भुत संयोजन संजीव,अली भाई के कमेण्ट को मेरा भी माना जाये।

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  6. वाह भाई संजीव । कबीर तो मेरे प्रिय कवि है । कबीर के भंडार से यह मोती चुन कर लाने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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