ब्लॉग छत्तीसगढ़

30 June, 2010

पंडवानी की वेदमति व कापालिक शैली


छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपराओं से मेरा मोह बचपन से रहा है। इसी मोह से पंडवानी और दूसरे लोकरंजन में मेरी रूचि पैदा हुई है। हम बचपन से विभिन्न लोक कलाकारों से पंडवानी सुनते आये हैं एवं उनकी प्रस्तुतियों को प्रत्यक्षत: या टीवी आदि के माध्यमों से देखते आये हैं। पद्मभूषण श्रीमती तीजन बाई तो अब पंडवानी की पर्याय बन चुकी है और हममें से ज्यादातर लोगों नें तीजन बाई की प्रस्तुति ही देखी हैं, लोक स्मृति के मानस पटल पर जो छवि पंडवानी की उभरती है वो तीजन की ही है। तीजन की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए श्रीमती रितु वर्मा नें भी पंडवानी गायकी को भली भांति साधा है। उसकी प्रसिद्धि भी काफी उंचाईयों पर है, पर इन दोनों की प्रस्तुतिकरण में अंतर है और इसी अंतर को वेदमतिकापालिक शैली का नाम दे दिया गया है। हम पंडवानी के इन शैलियों के संबंध में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपराओं के मर्मज्ञों की लेखनी को पढ़ कर अपने स्वयं की संतुष्टि चाहते रहे हैं कि क्या सचमुच इन शैलियों नें समयानुसार परंपरा का रूप ले लिया है या शैलियों को कतिपय विद्धानों नें पूर्व पीठिका में लिखकर स्थापित कर दिया है।
वाचिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी लोक आनंद की प्रस्तुति की परंपरा में समय का प्रभाव भी पड़ता है और पारंपरिक प्रस्तुति में कुछ अंतर आने लगता है। हमारी समझ के अनुसार छत्तीसगढ़ की जानी पहचानी लोक विधा पंडवानी में भी इसी तरह के समयनुकूल परिवर्तन आये हैं। पंडवानी गायकी की इस परंपरा में आये परिवर्तन को शाखा का नाम दे दिया गया है। इन दोनों शाखाओं के संबंध में उपलब्धं लेखों में कहीं भी अलग से विशिष्‍ठ रूप में कुछ नहीं लिखा गया है। प्रदेश की संस्कृति पर लेखन करने वाले लेखकों नें पंडवानी व पंडवानी के गायकों के संबंध में लिखते हुए संक्षिप्त में वेदमति व कापालिक शाखाओं का उल्लेख किया है, और सतही तौर पर यह स्वीकार किया है कि बैठकर गाने की शैली को वेदमति व खड़े होकर प्रस्तुति देने की शैली को कापालिक कहा जाता है। लोक कलाकारों के संबंध में निरंतर लिखने वाले डॉ. परदेशीराम वर्मा जी नें अपने आलेख में लिखा है कि ‘पंडवानी विधा में दो शैलियां प्रचलित है। एक मंच पर बैठकर गाने की शैली। इसे वेदमती शैली कहते हैं। ..... कापालिक शैली में कलाकार खड़े होकर अभिनय सहित मंच पर कला का जौहर दिखाता है। यह शैली महिलाओं के लिए अनुकूल और प्रभावशाली सिद्ध हुई।’
पंडवानी की इन शैलियों के संबंध में छत्तीसगढ़ के ख्यात लोक कला निदेशक राम हृदय तिवारी जी नें अपने एक लेख में विस्तृत रूप से प्रकाश डाला है यथा ‘वेदमति और कापालिक शाखाओं के नाम से विभक्त इस पंडवानी के जिस स्वरूप से हम सब ज्यादा परिचित हैं – वह कापालिक शाखा की विख्यात शैली है, जो शास्त्रीय कथा को लोकरंग के नये परिधान देकर पूरे आत्म विश्वास के साथ हमारे सामने लाती है। ऐसा कहा जाता है कि कापालिक शाखा का अभ्युदय वेदमति शाखा की पारंपरिकता के विरोध स्वरूप हुआ। कापालिक शाखा के गायकों नें समयानुकूल लोकरूचि के वाद्यों का समावेश अपनी प्रस्तुति में किया। गायकी की नयी आक्रमक शैली का अविष्कार किया। गाथा को अंचल की प्रचलित लोक धुनों में बांधा और पूरी सजधज के साथ प्रसंगानुकूल एकल अभिनय की शुरूआत हुई जिसका चरमोत्ककर्ष आज भी विश्व विख्यात पंडवानी गायिका पद्मभूषण तीजन बाई में देखा जा सकता है। पंडवानी की यह आकर्षक शैली गायन के साथ आंशिक नृत्य नाट्य का भी आनंद देने में पूर्णत: सक्षम है, इसीलिए कुछ विद्वानों नें इसे फोक बेले की संज्ञा से भी विभूषित किया है। इस विधा में संगीत, भावाभिनय और कथा व्याख्या, तीनों का आनुपातिक समिश्रित सौंदर्य सचमुच सम्मोहन पाश में श्रोताओं को बांध लेता है ।’
छत्तीसगढ़ के लोक परंपराओं एवं पंडवानी पर विशद अध्ययन व शोध डॉ.विनय कुमार पाठक के निर्देशन में डॉ. बल्दांउ प्रसाद निर्मलकर जी नें किया है। निर्मलकर जी के शोध ग्रंथ ‘पांडव गाथा पंडवानी और महाभारत’ के नाम से बिलासा कला मंच से प्रकाशित हुआ है। छत्तीसगढ़ के पंडवानी के संपूर्ण अध्ययन के लिए यह ग्रंथ एक अहम दस्तावेज है।
इस ग्रंथ में डॉ.निर्मलकर जी नें वैदिक महाभारत कथा एवं वाचिक परंपरा में गाये जाने वाले महाकाव्य पंडवानी का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है। डॉ. निर्मलकर नें इस ग्रंथ में पंडवानी का वर्गीकरण प्रस्तुत किया है जिसमें इन दोनों शैलियों का उल्लेख है वे लिखते हें ‘वेदमति पंडवानी से आशय उन गीतों से है, जिनकी कथा महाभारत सम्मत है, अर्थात बुद्धिमानों से सम्मत या जो वेद से अनुमोदित हैं, वह कथा गायन इसके अंतर्गत सम्मिलित है। इसे बैठकर गाया जाता है। वेदमति पंडवानी के अंतर्गत आदिपरब, सभापरब, उद्यमपरब, भीष्मपरब, द्रोणपरब, कर्णपरब, सैलपरब, तिलकपरब, अश्वभमेध, स्वर्गारोहण परब, मूलपरब आदि छत्तीसगढ़ी रूपों में समाहित है। संदर्भित शाखा के गायकों का विश्वास है कि सांतपरब की कथा कहने से गायक शांत (मृत) हो जावेगा। इस अंधविश्वास के कारण शांतपरब का गायन वर्जित है। ..... इसके प्रमुख गायक श्री झाडूराम जी देवांगन व श्री पूनाराम जी निषाद हैं।’
और ‘कापालिक गीत वे हैं जो महाभारत के किसी पर्व में नहीं मिलते। केवल छत्तीसगढ़ के गायकों में मिलते हैं। इन गायकों की कथाएं कपोल कल्पित होती है। इसमें लोक विश्वास की इतनी गहरी छाप पड़ी है कि कथाएं कपोल कल्पित होकर भी पाण्डवो से संबंद्ध मानी जाती हैं। इसे खडे़-खडे़ गाया जाता है। इसकी प्रमुख गायिका श्रीमति तीजनबाई है’
डॉ. बल्दाउ प्रसाद निर्मलकर जी नें पंडवानी की शैली के संबंध में पूरे शोध ग्रंथ में इतना ही लिखा है। इस पर पंडवानी के अन्य पहलुओं की भांति उन्होंनें अपना स्वयं का कोई निष्कर्ष नहीं दिया है। किन्तु् पंडवानी के इन दो शाखाओं पर अपनी विस्तृत राय देते हुए इस ग्रंथ के शोध निर्देशक डॉ.विनय कुमार पाठक नें भूमिका में स्पष्ट किया है – ‘छत्तीसगढ़ी में पंडवानी गायन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है लेकिन इसकी उत्पत्ति से लेकर उसकी प्रचलित शैली के संदर्भ में अधिकांश लोगों में भ्रम धारणा घर कर गई है, उसका एक प्रमुख कारण मध्य प्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद से प्रकाशित महंगा मोनोग्राफ और इसी तरह से शोध से दूर अन्य आलेख हैं। जैसा कि देवारों के संदर्भ में प्रकाशित मोनोग्राफ हैं। ये सब सतही सामाग्री ही नहीं परोसते, वरण् गलत प्रचार का आश्रय लेते हैं।
यह धारणा एकदम भ्रांत है कि सबल सिंह चौहान के महाभारत से ‘वेदमतिशाखा’ का पारायण होता है। इससे तो पंडवानी गायन की परंपरा आधुनिक ही निर्दिष्टि होगी जबकि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि ‘वेदमति’ अर्थात् महाभारत वेद के मति से युक्त व प्रमाणित प्रसंग लोक वेद मति ‘मंजूलाकूल’ सदृश्य अत्यं प्राचीन काल से लोक गाथा के रूप में प्रवाहमान है। जबकि इसकी दूसरी शाखा ‘कापालिक’ काल्पनिक छत्तीसगढ़ी मानसिकता और कल्पानाशीलता का संयोजन है। महाभारत की कथा की कपाल क्रिया अर्थात इतिहास में कल्पना का समावेश अथवा महाभारत की जटिल कथा का सरल व छत्तीसगढ़ी परिवेश में लोक के अनुरूप कथ्य व घटना का सामंजस्य कापालिक शैली है।
इस दृष्टि से यदि विवेचना किया जाए तो वेदमति शाखा लोक गाथा की कोटि में नहीं आवेगी। इसका अर्थ भी यही होगा कि यदि पहला शिष्ट वर्ग या शास्त्रीय आधार पर केन्द्रित है तो दूसरा लोक में प्रचलित है, लेकिन ऐसा है नहीं। सबल सिंह चौहान विरचित ‘महाभारत’ के पूर्व पंडवानी गायन में ऐसा भेद रहा होगा लेकिन अब वे लोकगाथा गायकों में दोनो का सामंजस्य है, अत: किसी को वेदमति शाखा का प्रतिनिधि कहना गलत होगा। बैठकर और खडे होकर पंडवानी प्रस्तुति के आधार पर भी यह भेद उचित जान नहीं पड़ता।
यह सहीं है कि श्रीमति तीजनबाई के पूर्व के प्राय: सभी पण्डवानी गायक बैठकर गाथा प्रस्तुत करते रहे हैं लेकिन जब तीजन बाई खड़ी होती है, तब पण्डवानी थिरकने लगता है। क्या इसका यह अर्थ हुआ कि कापालिक शैली की जन्म दात्री श्रीमती तीजन बाई है ? इसके पूर्व यह शैली किस रूप में थी, क्या किसी के पास उत्तर है ? स्पष्ट है, ये दोनों शैलियां जरूर प्रचलित हैं लेकिन इसमें शास्त्रीयता दिखलाकर लक्ष्मण रेखा खींचना लोकगाथा के साथ अन्याय करना होगा।
स्पष्ट है, पंडवानी महाभारत का छत्तीसगढ़ी रूपांतरण व यहां के लोक की कल्पनाशीलता का संयोजन है, फलस्वरूप कापालिक शैली से असंपृक्त नहीं है। सबलसिंह चौहान प्रणीत महाभारत के बाद पंडितों की महाभारत पारायण की प्रथा प्राय: शिथिल होने के बाद वेदमति के इसी रूप में दिखी जिसका कालांतर में छत्तीसगढ़ी करण और लोकगायकी करण होने से यह वेदमति शाखा के रूप में जानी गई तथा इससे परे कई युगों से प्रचलित और युगीन तत्वों से जुड़ने के पश्यात महाभारत से सम्य रखते हुए भी अन्यान्यो अर्थों में वैषक्य स्थापित करने वाली घटना व कथा जुड़ती चली गई। तीजन बाई की अंतर्राष्ट्रीय लोकप्रियता नें पंडवानी गायन के प्रति महिलाओं के रूझान को उद्दीप्त किया। इस दृष्टि से झाडूराम देवांगन व पूनाराम निषाद की परंपरा प्राय: लुप्त प्रतीत होती है। इस दृष्टि से वेदमति शैली के संरक्षण का संकट आज की महती आवश्यकता है।’
इसी चिंता के साथ राम हृदय तिवारी जी कहते हैं कि ‘वेदमति शाखा वाली पंडवानी की शैली अब लगभग बिखराव अथवा समाप्ति के कगार पर है, मगर सुविख्यात कापालिक शैली की सलिला आज पूरे वेग से प्रवाहमान है । अपनी संम्पूर्ण सरसता और मधुरता के साथ ।’
आशा है छत्तीसगढ़ की लोकगाथा पंडवानी की वेदमति एवं कापालिक शाखा के संबंध में प्रमुख लेखकों के द्वारा लिखे गए अंशों को पढ़कर पाठक इन दोनों शाखाओं के बीच के अंतर को समझ सकेंगें. अवसर मिला तो पंडवानी पर कुछ और चर्चा के साथ उपस्थित होंगें.

12 comments:

  1. वेदमती कापालिक शैली की विस्तार से चर्चा की , आनंद और ज्ञान प्राप्त हुआ धन्यवाद

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  2. बहुत सार्थक आलेख...वेदमति एवं कापालिक शाखाओं के बीच अंतर जानना रोचक रहा.

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  3. बहुत जानदार जानकारी शानदार तरीके से प्रदान की गई। आभार! यही कारण है कि ब्लोग कितना उपयोगी है। प्रतिभाओं से मिलने का माध्यम, उनकी प्रतिभाओं से वाकिफ़ होने का माध्यम। अचछा लेख अच्छी प्रस्तुति। पुनः आभार!

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  4. तीजनबाई के बारे में बस सुना मात्र था । आज आपने हमारे ज्ञानकोष में एक अध्याय जोड़ दिया । आभार ।

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  5. भाई जी , अच्छी जानकारी है ,कुछ नया जानने-समझने को मिला । धन्यवाद ।

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  6. भाई जी , अच्छी जानकारी है ,कुछ नया जानने-समझने को मिला । धन्यवाद ।

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  7. बहुत ही शानदार-जानदार और धारधार
    पाठकों को यह विस्तार मैं अपने आलेख में नहीं बता पाया था।

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  8. बहुत सार्थक आलेख... रोचक

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  9. संजीव भाई
    टिप्पणी टाइप करते करते पोस्ट बन गई लिहाज़ा आपका लिंक देते हुए अपने ब्लाग में प्रकाशित कर दिया है ! उस आलेख को आपके आलेख की पुरौनी यानि हमारी टिप्पणी माना जाये !
    सस्नेह !

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  10. ye to bahut hi acchi jankari padhne mili bhaiya, shukriya aapka,itna detail me jakar pahli baar padhaa maine pandwani aur dono shailee ko, shukriya, ab jata hu agli kisht ko padhne...

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  11. भाई संजीव जी आपने पंडवानी के बारे में सम्पूर्ण जानकारी दी इसके लिए आप धन्यवाद के पात्र है . आशा करता हूँ की आगे भी आप ऐसी जानकारी देते रहेंगें

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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पंडवानी की वेदमति व कापालिक शैली


छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपराओं से मेरा मोह बचपन से रहा है। इसी मोह से पंडवानी और दूसरे लोकरंजन में मेरी रूचि पैदा हुई है। हम बचपन से विभिन्न लोक कलाकारों से पंडवानी सुनते आये हैं एवं उनकी प्रस्तुतियों को प्रत्यक्षत: या टीवी आदि के माध्यमों से देखते आये हैं। पद्मभूषण श्रीमती तीजन बाई तो अब पंडवानी की पर्याय बन चुकी है और हममें से ज्यादातर लोगों नें तीजन बाई की प्रस्तुति ही देखी हैं, लोक स्मृति के मानस पटल पर जो छवि पंडवानी की उभरती है वो तीजन की ही है। तीजन की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए श्रीमती रितु वर्मा नें भी पंडवानी गायकी को भली भांति साधा है। उसकी प्रसिद्धि भी काफी उंचाईयों पर है, पर इन दोनों की प्रस्तुतिकरण में अंतर है और इसी अंतर को वेदमतिकापालिक शैली का नाम दे दिया गया है। हम पंडवानी के इन शैलियों के संबंध में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपराओं के मर्मज्ञों की लेखनी को पढ़ कर अपने स्वयं की संतुष्टि चाहते रहे हैं कि क्या सचमुच इन शैलियों नें समयानुसार परंपरा का रूप ले लिया है या शैलियों को कतिपय विद्धानों नें पूर्व पीठिका में लिखकर स्थापित कर दिया है।
वाचिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी लोक आनंद की प्रस्तुति की परंपरा में समय का प्रभाव भी पड़ता है और पारंपरिक प्रस्तुति में कुछ अंतर आने लगता है। हमारी समझ के अनुसार छत्तीसगढ़ की जानी पहचानी लोक विधा पंडवानी में भी इसी तरह के समयनुकूल परिवर्तन आये हैं। पंडवानी गायकी की इस परंपरा में आये परिवर्तन को शाखा का नाम दे दिया गया है। इन दोनों शाखाओं के संबंध में उपलब्धं लेखों में कहीं भी अलग से विशिष्‍ठ रूप में कुछ नहीं लिखा गया है। प्रदेश की संस्कृति पर लेखन करने वाले लेखकों नें पंडवानी व पंडवानी के गायकों के संबंध में लिखते हुए संक्षिप्त में वेदमति व कापालिक शाखाओं का उल्लेख किया है, और सतही तौर पर यह स्वीकार किया है कि बैठकर गाने की शैली को वेदमति व खड़े होकर प्रस्तुति देने की शैली को कापालिक कहा जाता है। लोक कलाकारों के संबंध में निरंतर लिखने वाले डॉ. परदेशीराम वर्मा जी नें अपने आलेख में लिखा है कि ‘पंडवानी विधा में दो शैलियां प्रचलित है। एक मंच पर बैठकर गाने की शैली। इसे वेदमती शैली कहते हैं। ..... कापालिक शैली में कलाकार खड़े होकर अभिनय सहित मंच पर कला का जौहर दिखाता है। यह शैली महिलाओं के लिए अनुकूल और प्रभावशाली सिद्ध हुई।’
पंडवानी की इन शैलियों के संबंध में छत्तीसगढ़ के ख्यात लोक कला निदेशक राम हृदय तिवारी जी नें अपने एक लेख में विस्तृत रूप से प्रकाश डाला है यथा ‘वेदमति और कापालिक शाखाओं के नाम से विभक्त इस पंडवानी के जिस स्वरूप से हम सब ज्यादा परिचित हैं – वह कापालिक शाखा की विख्यात शैली है, जो शास्त्रीय कथा को लोकरंग के नये परिधान देकर पूरे आत्म विश्वास के साथ हमारे सामने लाती है। ऐसा कहा जाता है कि कापालिक शाखा का अभ्युदय वेदमति शाखा की पारंपरिकता के विरोध स्वरूप हुआ। कापालिक शाखा के गायकों नें समयानुकूल लोकरूचि के वाद्यों का समावेश अपनी प्रस्तुति में किया। गायकी की नयी आक्रमक शैली का अविष्कार किया। गाथा को अंचल की प्रचलित लोक धुनों में बांधा और पूरी सजधज के साथ प्रसंगानुकूल एकल अभिनय की शुरूआत हुई जिसका चरमोत्ककर्ष आज भी विश्व विख्यात पंडवानी गायिका पद्मभूषण तीजन बाई में देखा जा सकता है। पंडवानी की यह आकर्षक शैली गायन के साथ आंशिक नृत्य नाट्य का भी आनंद देने में पूर्णत: सक्षम है, इसीलिए कुछ विद्वानों नें इसे फोक बेले की संज्ञा से भी विभूषित किया है। इस विधा में संगीत, भावाभिनय और कथा व्याख्या, तीनों का आनुपातिक समिश्रित सौंदर्य सचमुच सम्मोहन पाश में श्रोताओं को बांध लेता है ।’
छत्तीसगढ़ के लोक परंपराओं एवं पंडवानी पर विशद अध्ययन व शोध डॉ.विनय कुमार पाठक के निर्देशन में डॉ. बल्दांउ प्रसाद निर्मलकर जी नें किया है। निर्मलकर जी के शोध ग्रंथ ‘पांडव गाथा पंडवानी और महाभारत’ के नाम से बिलासा कला मंच से प्रकाशित हुआ है। छत्तीसगढ़ के पंडवानी के संपूर्ण अध्ययन के लिए यह ग्रंथ एक अहम दस्तावेज है।
इस ग्रंथ में डॉ.निर्मलकर जी नें वैदिक महाभारत कथा एवं वाचिक परंपरा में गाये जाने वाले महाकाव्य पंडवानी का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है। डॉ. निर्मलकर नें इस ग्रंथ में पंडवानी का वर्गीकरण प्रस्तुत किया है जिसमें इन दोनों शैलियों का उल्लेख है वे लिखते हें ‘वेदमति पंडवानी से आशय उन गीतों से है, जिनकी कथा महाभारत सम्मत है, अर्थात बुद्धिमानों से सम्मत या जो वेद से अनुमोदित हैं, वह कथा गायन इसके अंतर्गत सम्मिलित है। इसे बैठकर गाया जाता है। वेदमति पंडवानी के अंतर्गत आदिपरब, सभापरब, उद्यमपरब, भीष्मपरब, द्रोणपरब, कर्णपरब, सैलपरब, तिलकपरब, अश्वभमेध, स्वर्गारोहण परब, मूलपरब आदि छत्तीसगढ़ी रूपों में समाहित है। संदर्भित शाखा के गायकों का विश्वास है कि सांतपरब की कथा कहने से गायक शांत (मृत) हो जावेगा। इस अंधविश्वास के कारण शांतपरब का गायन वर्जित है। ..... इसके प्रमुख गायक श्री झाडूराम जी देवांगन व श्री पूनाराम जी निषाद हैं।’
और ‘कापालिक गीत वे हैं जो महाभारत के किसी पर्व में नहीं मिलते। केवल छत्तीसगढ़ के गायकों में मिलते हैं। इन गायकों की कथाएं कपोल कल्पित होती है। इसमें लोक विश्वास की इतनी गहरी छाप पड़ी है कि कथाएं कपोल कल्पित होकर भी पाण्डवो से संबंद्ध मानी जाती हैं। इसे खडे़-खडे़ गाया जाता है। इसकी प्रमुख गायिका श्रीमति तीजनबाई है’
डॉ. बल्दाउ प्रसाद निर्मलकर जी नें पंडवानी की शैली के संबंध में पूरे शोध ग्रंथ में इतना ही लिखा है। इस पर पंडवानी के अन्य पहलुओं की भांति उन्होंनें अपना स्वयं का कोई निष्कर्ष नहीं दिया है। किन्तु् पंडवानी के इन दो शाखाओं पर अपनी विस्तृत राय देते हुए इस ग्रंथ के शोध निर्देशक डॉ.विनय कुमार पाठक नें भूमिका में स्पष्ट किया है – ‘छत्तीसगढ़ी में पंडवानी गायन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है लेकिन इसकी उत्पत्ति से लेकर उसकी प्रचलित शैली के संदर्भ में अधिकांश लोगों में भ्रम धारणा घर कर गई है, उसका एक प्रमुख कारण मध्य प्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद से प्रकाशित महंगा मोनोग्राफ और इसी तरह से शोध से दूर अन्य आलेख हैं। जैसा कि देवारों के संदर्भ में प्रकाशित मोनोग्राफ हैं। ये सब सतही सामाग्री ही नहीं परोसते, वरण् गलत प्रचार का आश्रय लेते हैं।
यह धारणा एकदम भ्रांत है कि सबल सिंह चौहान के महाभारत से ‘वेदमतिशाखा’ का पारायण होता है। इससे तो पंडवानी गायन की परंपरा आधुनिक ही निर्दिष्टि होगी जबकि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि ‘वेदमति’ अर्थात् महाभारत वेद के मति से युक्त व प्रमाणित प्रसंग लोक वेद मति ‘मंजूलाकूल’ सदृश्य अत्यं प्राचीन काल से लोक गाथा के रूप में प्रवाहमान है। जबकि इसकी दूसरी शाखा ‘कापालिक’ काल्पनिक छत्तीसगढ़ी मानसिकता और कल्पानाशीलता का संयोजन है। महाभारत की कथा की कपाल क्रिया अर्थात इतिहास में कल्पना का समावेश अथवा महाभारत की जटिल कथा का सरल व छत्तीसगढ़ी परिवेश में लोक के अनुरूप कथ्य व घटना का सामंजस्य कापालिक शैली है।
इस दृष्टि से यदि विवेचना किया जाए तो वेदमति शाखा लोक गाथा की कोटि में नहीं आवेगी। इसका अर्थ भी यही होगा कि यदि पहला शिष्ट वर्ग या शास्त्रीय आधार पर केन्द्रित है तो दूसरा लोक में प्रचलित है, लेकिन ऐसा है नहीं। सबल सिंह चौहान विरचित ‘महाभारत’ के पूर्व पंडवानी गायन में ऐसा भेद रहा होगा लेकिन अब वे लोकगाथा गायकों में दोनो का सामंजस्य है, अत: किसी को वेदमति शाखा का प्रतिनिधि कहना गलत होगा। बैठकर और खडे होकर पंडवानी प्रस्तुति के आधार पर भी यह भेद उचित जान नहीं पड़ता।
यह सहीं है कि श्रीमति तीजनबाई के पूर्व के प्राय: सभी पण्डवानी गायक बैठकर गाथा प्रस्तुत करते रहे हैं लेकिन जब तीजन बाई खड़ी होती है, तब पण्डवानी थिरकने लगता है। क्या इसका यह अर्थ हुआ कि कापालिक शैली की जन्म दात्री श्रीमती तीजन बाई है ? इसके पूर्व यह शैली किस रूप में थी, क्या किसी के पास उत्तर है ? स्पष्ट है, ये दोनों शैलियां जरूर प्रचलित हैं लेकिन इसमें शास्त्रीयता दिखलाकर लक्ष्मण रेखा खींचना लोकगाथा के साथ अन्याय करना होगा।
स्पष्ट है, पंडवानी महाभारत का छत्तीसगढ़ी रूपांतरण व यहां के लोक की कल्पनाशीलता का संयोजन है, फलस्वरूप कापालिक शैली से असंपृक्त नहीं है। सबलसिंह चौहान प्रणीत महाभारत के बाद पंडितों की महाभारत पारायण की प्रथा प्राय: शिथिल होने के बाद वेदमति के इसी रूप में दिखी जिसका कालांतर में छत्तीसगढ़ी करण और लोकगायकी करण होने से यह वेदमति शाखा के रूप में जानी गई तथा इससे परे कई युगों से प्रचलित और युगीन तत्वों से जुड़ने के पश्यात महाभारत से सम्य रखते हुए भी अन्यान्यो अर्थों में वैषक्य स्थापित करने वाली घटना व कथा जुड़ती चली गई। तीजन बाई की अंतर्राष्ट्रीय लोकप्रियता नें पंडवानी गायन के प्रति महिलाओं के रूझान को उद्दीप्त किया। इस दृष्टि से झाडूराम देवांगन व पूनाराम निषाद की परंपरा प्राय: लुप्त प्रतीत होती है। इस दृष्टि से वेदमति शैली के संरक्षण का संकट आज की महती आवश्यकता है।’
इसी चिंता के साथ राम हृदय तिवारी जी कहते हैं कि ‘वेदमति शाखा वाली पंडवानी की शैली अब लगभग बिखराव अथवा समाप्ति के कगार पर है, मगर सुविख्यात कापालिक शैली की सलिला आज पूरे वेग से प्रवाहमान है । अपनी संम्पूर्ण सरसता और मधुरता के साथ ।’
आशा है छत्तीसगढ़ की लोकगाथा पंडवानी की वेदमति एवं कापालिक शाखा के संबंध में प्रमुख लेखकों के द्वारा लिखे गए अंशों को पढ़कर पाठक इन दोनों शाखाओं के बीच के अंतर को समझ सकेंगें. अवसर मिला तो पंडवानी पर कुछ और चर्चा के साथ उपस्थित होंगें.
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