ब्लॉग छत्तीसगढ़

05 November, 2011

चीन: ड्रैगन की दुम पर

चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस का प्रसिद्ध कथन है कि ‘‘दूसरों से वैसा व्यवहार न करें, जैसा आप स्वयं के लिए पसंद न करते हो’’ पर आजकल उनके देशवासी याद रखने योग्य सिर्फ कामरेड माओ की उक्तियों को ही मानते है। भारतीय तेल व गैस उत्खनन कम्पनी ओएनजीसी विदेश को वियतनाम के दक्षिण चीन सागर में खनन की मिली अनुमति को चीन के विदेश मंत्रालय ने चीन-वियतनाम के आपसी विवाद में भारत का बेवजह दखल करार दिया है। उनसे पूछा जाना चाहिए कि कि वैधानिक रूप भारत में शामिल पाक अधिकृत काश्मीर पर चीनी सैनिकों द्वारा बनाये जा रहे काराकोरम राजमार्ग पर उनकी क्या राय है। उनकी राय का पता नहीं, पर लगता है कि भारत ने ड्रैगन की दुम पर पैर रख दिया है और यह भारत सरकार का सोच-समझकर उठाया गया कदम है। 

चीन में बुद्ध
चीन-भारत के संबंध पिछले कुछ दशकों से तनावपूर्ण अवश्य है पर इतिहास के पन्नों पर ये काफी मधुर रहे हैं। भारतीय सिन्धु घाटी सभ्यता के ही समकालीन चीन की ह्वांग-हो घाटी की सभ्यता थी। भारत के उपगुप्त व अन्य कई बौद्ध भिक्षुकों ने चीन में धर्म प्रचार किया और बौद्ध धर्म सदियों तक चीन का राजकीय धर्म बना रहा। चीन के फाह्यान व हे्वनसांग जैसे बौद्ध भिक्षुकों ने बुद्ध के देश व बौद्ध धर्म के मूल तत्वों को जानने के लिए भारत भ्रमण किया। चीनी व्यापारिक जहाज भी सदियों तक भारतीय तटों पर आते रहे और भारतीयों ने सदैव उनका स्वागत किया। प्राचीन इतिहास में भारत-चीन के बीच सैनिक संघर्ष का कोई विवरण नहीं है, जिसका कारण शायद हिमालय की विशालता व ऊंचाई है जिसे पार करके सैनिक अभियान चलाना उस समय असंभव था।

आधुनिक चीन एक विशाल देश है जिसमें हान प्रमुख जातीय समूह है। इसके अतिरिक्त हुई मांचू, तिब्बती व उईधुर समूह भी है। जिसमें उईधुर मुस्लिम है जो पश्चिमी चीन में खानाबदोश ढ़ंग से रहते हैं। चीन का मांचू सम्राज्य 1911 में समाप्त कर दिया गया और गणतंत्र की स्थापना हुई, जिसमें कुओं मीन तंग (नेशनल पीपुल्स पार्टी) के डॉ. सनयात सेन राष्ट्राध्यक्ष बने। उन्होंने चीन का आधुनिकीकरण प्रारंभ किया, उनके उत्तराधिकारी च्यांगकाई शेक ने लौकिक कन्फ्यूशियसवाद पर देश चलाने की कोशिश की पर 1937 के जापानी आक्रमण को रोकने के लिए उन्हें जमीन पुनर्वितरण के मुद्दे पर ताकतवर होती, माओत्सेतुंग की साम्यवादी पार्टी से समझौता करना पड़ा। युद्ध के पश्चात सत्ता पर नियंत्रण को लेकर दोनों दल आपस में भिड़ गये और 1949 में माओत्सेतुंग ने मुख्य भूमि पर साम्यवादी सरकार की स्थापना की, जबकि च्यांगकाई शेक ने ताईवान जाकर गणतांत्रिक सरकार बनायी। चीन की नई साम्यवादी सरकार की फौजें 1950 में तिब्बत में घुस आयी और उसे अपना प्रांत घोषित कर दिया। 1958 में तिब्बतियों ने चीनी कब्जे के खिलाफ विद्रोह किया जिसे कुचल दिया गया और तिब्बती धर्मगुरु व प्रमुख नेता दलाईलामा अपने अनुयायी सहित भारत आ गये। भारत द्वारा दलाईलामा को शरण देना चीन को नागवार गुजरा और यही 1962 के भारत-चीन युद्ध का कारण बना। 


थियेनमेन चौंक का छात्र आन्‍दोलन
तिब्बत पर चीन के अवैध कब्जे के बाद भारत से सीमा विवाद प्रारंभ हो गया क्योंकि चीन मैकमोहन रेखा को मान्यता नहीं देता वह अरूणांचल प्रदेश को अपना हिस्सा तथा सिक्किम को स्वतंत्र राष्ट्र बताता रहा है। जबकि भारत 1962 के युद्ध में चीन के कब्जे में गये आक्साई चीन को वापस मंाग रहा है। इस विवादों के बाद भी 1962 के बाद भारत चीन में बड़ा सैनिक संघर्ष नहीं हुआ और हाल के तनाव का कारण भी मुख्यतः आर्थिक है।

दरअसल चीन व भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाएँ है, जिन्हें अपनी तीव्र आर्थिक विकास दर को बनाये रखने के लिए ऊर्जा संसाधनों व तैयार माल के लिए बाजार की जरूरत है, इसीलिए चीन पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को विकसित कर रहा है, ताकि खाड़ी देशों से तेल व गैस को पाईप लाईन से पाक अधिकृत काश्मीर होकर पश्चिमी चीन तक पहुंचाया जा सके और उसके जहाजों को हिन्द महासागर का चक्कर न लगाना पड़े जहां भारत मजबूत स्थिति में है। भारत ओएनजीसी तथा कोल इंडिया, विदेश के माध्यम से कई देशों में तेल व कोयले का खनन कर रहा है, जिसे वह निर्बाध रूप से नौ परिवहन कर भारत पहुचांना चाह रहा है। भारत गंगा-मैकांग परियोजना के तहत पूर्वी एशियाई देशों से अपने संबंध लगातार बढ़ा रहा है और आसियान समूह के देशों की अर्थव्यवस्था में भी अपना हिस्सा लगातार बढ़ा रहा है। अफ्रीकी व लैटिन अमेरिकी देशों के बाजारों पर दोनों ही देशों की नजर है। जैसे-जैसे दोनों अर्थव्यवस्थाएं फैलाती जायेंगी, यह आर्थिक टकराव भी बढ़ेगा, जो सैनिक संघर्ष में भी बदल सकता है। भारत के लिए बेहतर यही होगा कि वह अपने अधिकतम आर्थिक हित वाले क्षेत्रों को रेखांकित कर अपनी सैनिक क्षमता को इतना बढ़ा ले कि अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित रख सके। 

भारत और चीन के बीच एक तीसरा पक्ष अमेरिका भी है। चीन ने जिस दबावपूर्ण ढंग से हांगकांग (बिट्रेन) व मकाओं (पुर्तगाल) को वापस लिया है और पूर्वोत्तर एशिया में दखल देना प्रारंभ किया है, उससे अमेरिका आशंकित है क्योंकि उसके भी सैनिक-आर्थिक हित जापान, ताईवान, दक्षिण कोरिया व फिलीपिन्स तक फैले हैं। 

चीन की लाल सेना
हिन्द महासागर में चीन व भारत की सैनिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है, क्योंकि ये दोनों देशों का प्रमुख व्यापारिक मार्ग है। चीन ग्वादर, श्रीलंका व वर्मा के कोको द्वीप में नौसैनिक अड्डे बनाकर भारत को घेरना चाह रहा है। जबकि भारत द्वारा अंडमान में संयुक्त कमान की स्थापना इस घेरेबंदी को तोड़ने के लिए ही है। ये रक्षा तैयारियां अन्य क्षेत्रों में भी चल रही हैं। भारत अपनी मिसाइलों की क्षमता बढ़ा रहा है 3500 कि.मी. मार करने वाली अग्नि-3 के बाद जल्द ही 5000 कि.मी. तक मार करने वाली ‘‘सूर्या’’ का परीक्षण करने वाला है, जिसकी जद में सभी प्रमुख चीनी शहर आ जायेंगे। 

चीन भी अपनी सेना व भारतीय सीमा से लगे चीनी क्षेत्र में राजमार्गों का नवीनीकरण कर रहा है। वह पाकिस्तान को मिसाइल व परमाणु बम बनाने की तकनीक देकर भारत से उलझना चाहता है। भारत भी शायद वियतनाम लाओस या फिलीपिन्स को मध्यम दूरी की मिसाइलों की तकनीक देकर चीन के खिलाफ खड़ा करना चाहे, पर फिलहाल वह चीन पर ही ध्यान केfन्द्रत किये हुए है और भारतीय रक्षा तैयारियां पहाड़ी युद्धों को ध्यान में रखकर की जा रही है। हाल के वर्षों में भारतीय सेना में माऊंटेन डिविजन लगातार बढ़ रही है। साथ ही दुर्गम क्षेत्रों में उतर कर युद्ध करने में सक्षम एयरबार्न यूनिट भी, जिनके लिए हाल ही में सी-13 हरकुलिस व 130 ग्लोबमास्टर जैसे मालवाही विमान खरीदे गये हैं। 

कारगिल युद्ध में बोफोर्स तोप
भारतीय वायु सेना भी तकनीकी रूप से चीनी वायु सेना से आगे है। चीनी वायु सेना में पुराने विमान ही बड़ी संख्या में है। उनका सुपर-7 विमान भी अमेरिका के एफ-16 की सस्ती नकल है। जो भारत के सुखोई 30-एमकेआई से तकनीकी रूप से बहुत पीछे है। भारतीय वायुसेना में जल्द ही सुखोई 50 तथा यूरोफाईटर शामिल हो जायेगे जो आकाश में भारत को निर्णायक बढ़त दिला देंगे। चीन आर्टलरी में भारत से आगे है पर पहाड़ी युद्धों में इनकी क्षमता सीमित होती है, परन्तु भारत की बोफोर्स व बह्योस जैसी लेजर आधारित शस्त्र प्रणालियां यहां भी कारगर होती हैं, क्योंकि पहाड़ों के पार ढलानों पर छिपे शत्रुओं पर सटीक निशाना लगा सकती हैं, जिसका चीन के पास कोई जवाब नहीं है।

चीन ने यदि 1962 की तरह इस बार फिर आक्रमण किया तो उसे युद्ध के पहले ही दौर में यह पता चल जायेगा कि इस बीच भारत कितना बदल गया है पर यह आर्थिक प्रतिस्पर्धा पूर्णकालिक युद्ध में बदलेगी भी, इसकी संभावना कम है क्योंकि दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं व एक दूसरे के क्षेत्र में भीतर तक घुसकर मार करने की क्षमता भी, जो विनाश को और भी व्यापक बना देगा। चूंकि दोनों देशों का उद्देश्य आर्थिक विकास है सो अंततः समान क्षमता वाले प्रतिद्वंदी से भिड़कर कोई भी विनाश को निमंत्रित नहीं करेगा पर चीन जैसा धूर्त देश भारत को कमजोर करने के लिए पाकिस्तान का उपयोग करना चाहेगा, जबकि अमेरिका उसे रोकने के लिए भारत को मजबूत करेगा। ये कूटनीतियां अभी लगातार चलती रहेंगी और सीधे संघर्ष से बचते हुए दोनों देश अपने-अपने आर्थिक हितों को साधते रहेंगे। पर 1965 की तरह यदि हमने अपनी सैनिक तैयारियों में ढील दी तो हमें अपने महत्वपूर्ण सामरिक व आर्थिक हितों से हाथ धोना पड़ सकता है। हमें चौथी सदी ई.पू. के चीनी विचारक सुनत्सु की पुस्तक ‘‘आर्ट ऑफ वार’’ के कथन को ध्यान में रखना चाहिए कि ‘‘अपने शत्रु के हर कदम पर नजर रखो और उसकी विशेषताओं को कभी नजरअंदाज मत करो।’’

विवेक राज सिंह
समाज कल्‍याण में स्‍नातकोत्‍तर शिक्षा प्राप्‍त विवेकराज सिंह जी स्‍वांत: सुखाय लिखते हैं।अकलतरा, छत्‍तीसगढ़ में इनका माईनिंग का व्‍यवसाय है. 
इस ब्‍लॉग में विवेक राज सिंह जी के पूर्व आलेख - 
अन्तरिक्ष में मानव के पचास साल 
अफगानिस्तान - दिलेर लोगों की खूबसूरत जमीन
काश्मीर- जलते स्वर्ग की कथा
नेपाल एक प्रेम कहानी 

सभी चित्र गूगल सर्च से साभार

7 comments:

  1. भारत को भी समय रहते चेतना होगा।

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  2. व्‍यापक दृष्टिकोण, हालातों की संतुलित समीक्षा, बधाई.

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  3. अच्छी समीक्षा, आभार...

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  4. बढिया विश्‍लेषण!!

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  5. सही दिशा को गति देती लेख और शोधपूर्ण !

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  6. विकसित देशों की श्रेणी में खुद को शामिल करने के लिए बेकरार चीन और भारत की प्रतिद्वन्द्विता और उनके राजनीतिक आर्थिक संबंधों की पृष्‍ठभूमि को बेहतरीन ढंग से लेख में समेटा है। लेखक को बधाई।

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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05 November, 2011

चीन: ड्रैगन की दुम पर

चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस का प्रसिद्ध कथन है कि ‘‘दूसरों से वैसा व्यवहार न करें, जैसा आप स्वयं के लिए पसंद न करते हो’’ पर आजकल उनके देशवासी याद रखने योग्य सिर्फ कामरेड माओ की उक्तियों को ही मानते है। भारतीय तेल व गैस उत्खनन कम्पनी ओएनजीसी विदेश को वियतनाम के दक्षिण चीन सागर में खनन की मिली अनुमति को चीन के विदेश मंत्रालय ने चीन-वियतनाम के आपसी विवाद में भारत का बेवजह दखल करार दिया है। उनसे पूछा जाना चाहिए कि कि वैधानिक रूप भारत में शामिल पाक अधिकृत काश्मीर पर चीनी सैनिकों द्वारा बनाये जा रहे काराकोरम राजमार्ग पर उनकी क्या राय है। उनकी राय का पता नहीं, पर लगता है कि भारत ने ड्रैगन की दुम पर पैर रख दिया है और यह भारत सरकार का सोच-समझकर उठाया गया कदम है। 

चीन में बुद्ध
चीन-भारत के संबंध पिछले कुछ दशकों से तनावपूर्ण अवश्य है पर इतिहास के पन्नों पर ये काफी मधुर रहे हैं। भारतीय सिन्धु घाटी सभ्यता के ही समकालीन चीन की ह्वांग-हो घाटी की सभ्यता थी। भारत के उपगुप्त व अन्य कई बौद्ध भिक्षुकों ने चीन में धर्म प्रचार किया और बौद्ध धर्म सदियों तक चीन का राजकीय धर्म बना रहा। चीन के फाह्यान व हे्वनसांग जैसे बौद्ध भिक्षुकों ने बुद्ध के देश व बौद्ध धर्म के मूल तत्वों को जानने के लिए भारत भ्रमण किया। चीनी व्यापारिक जहाज भी सदियों तक भारतीय तटों पर आते रहे और भारतीयों ने सदैव उनका स्वागत किया। प्राचीन इतिहास में भारत-चीन के बीच सैनिक संघर्ष का कोई विवरण नहीं है, जिसका कारण शायद हिमालय की विशालता व ऊंचाई है जिसे पार करके सैनिक अभियान चलाना उस समय असंभव था।

आधुनिक चीन एक विशाल देश है जिसमें हान प्रमुख जातीय समूह है। इसके अतिरिक्त हुई मांचू, तिब्बती व उईधुर समूह भी है। जिसमें उईधुर मुस्लिम है जो पश्चिमी चीन में खानाबदोश ढ़ंग से रहते हैं। चीन का मांचू सम्राज्य 1911 में समाप्त कर दिया गया और गणतंत्र की स्थापना हुई, जिसमें कुओं मीन तंग (नेशनल पीपुल्स पार्टी) के डॉ. सनयात सेन राष्ट्राध्यक्ष बने। उन्होंने चीन का आधुनिकीकरण प्रारंभ किया, उनके उत्तराधिकारी च्यांगकाई शेक ने लौकिक कन्फ्यूशियसवाद पर देश चलाने की कोशिश की पर 1937 के जापानी आक्रमण को रोकने के लिए उन्हें जमीन पुनर्वितरण के मुद्दे पर ताकतवर होती, माओत्सेतुंग की साम्यवादी पार्टी से समझौता करना पड़ा। युद्ध के पश्चात सत्ता पर नियंत्रण को लेकर दोनों दल आपस में भिड़ गये और 1949 में माओत्सेतुंग ने मुख्य भूमि पर साम्यवादी सरकार की स्थापना की, जबकि च्यांगकाई शेक ने ताईवान जाकर गणतांत्रिक सरकार बनायी। चीन की नई साम्यवादी सरकार की फौजें 1950 में तिब्बत में घुस आयी और उसे अपना प्रांत घोषित कर दिया। 1958 में तिब्बतियों ने चीनी कब्जे के खिलाफ विद्रोह किया जिसे कुचल दिया गया और तिब्बती धर्मगुरु व प्रमुख नेता दलाईलामा अपने अनुयायी सहित भारत आ गये। भारत द्वारा दलाईलामा को शरण देना चीन को नागवार गुजरा और यही 1962 के भारत-चीन युद्ध का कारण बना। 


थियेनमेन चौंक का छात्र आन्‍दोलन
तिब्बत पर चीन के अवैध कब्जे के बाद भारत से सीमा विवाद प्रारंभ हो गया क्योंकि चीन मैकमोहन रेखा को मान्यता नहीं देता वह अरूणांचल प्रदेश को अपना हिस्सा तथा सिक्किम को स्वतंत्र राष्ट्र बताता रहा है। जबकि भारत 1962 के युद्ध में चीन के कब्जे में गये आक्साई चीन को वापस मंाग रहा है। इस विवादों के बाद भी 1962 के बाद भारत चीन में बड़ा सैनिक संघर्ष नहीं हुआ और हाल के तनाव का कारण भी मुख्यतः आर्थिक है।

दरअसल चीन व भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाएँ है, जिन्हें अपनी तीव्र आर्थिक विकास दर को बनाये रखने के लिए ऊर्जा संसाधनों व तैयार माल के लिए बाजार की जरूरत है, इसीलिए चीन पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को विकसित कर रहा है, ताकि खाड़ी देशों से तेल व गैस को पाईप लाईन से पाक अधिकृत काश्मीर होकर पश्चिमी चीन तक पहुंचाया जा सके और उसके जहाजों को हिन्द महासागर का चक्कर न लगाना पड़े जहां भारत मजबूत स्थिति में है। भारत ओएनजीसी तथा कोल इंडिया, विदेश के माध्यम से कई देशों में तेल व कोयले का खनन कर रहा है, जिसे वह निर्बाध रूप से नौ परिवहन कर भारत पहुचांना चाह रहा है। भारत गंगा-मैकांग परियोजना के तहत पूर्वी एशियाई देशों से अपने संबंध लगातार बढ़ा रहा है और आसियान समूह के देशों की अर्थव्यवस्था में भी अपना हिस्सा लगातार बढ़ा रहा है। अफ्रीकी व लैटिन अमेरिकी देशों के बाजारों पर दोनों ही देशों की नजर है। जैसे-जैसे दोनों अर्थव्यवस्थाएं फैलाती जायेंगी, यह आर्थिक टकराव भी बढ़ेगा, जो सैनिक संघर्ष में भी बदल सकता है। भारत के लिए बेहतर यही होगा कि वह अपने अधिकतम आर्थिक हित वाले क्षेत्रों को रेखांकित कर अपनी सैनिक क्षमता को इतना बढ़ा ले कि अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित रख सके। 

भारत और चीन के बीच एक तीसरा पक्ष अमेरिका भी है। चीन ने जिस दबावपूर्ण ढंग से हांगकांग (बिट्रेन) व मकाओं (पुर्तगाल) को वापस लिया है और पूर्वोत्तर एशिया में दखल देना प्रारंभ किया है, उससे अमेरिका आशंकित है क्योंकि उसके भी सैनिक-आर्थिक हित जापान, ताईवान, दक्षिण कोरिया व फिलीपिन्स तक फैले हैं। 

चीन की लाल सेना
हिन्द महासागर में चीन व भारत की सैनिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है, क्योंकि ये दोनों देशों का प्रमुख व्यापारिक मार्ग है। चीन ग्वादर, श्रीलंका व वर्मा के कोको द्वीप में नौसैनिक अड्डे बनाकर भारत को घेरना चाह रहा है। जबकि भारत द्वारा अंडमान में संयुक्त कमान की स्थापना इस घेरेबंदी को तोड़ने के लिए ही है। ये रक्षा तैयारियां अन्य क्षेत्रों में भी चल रही हैं। भारत अपनी मिसाइलों की क्षमता बढ़ा रहा है 3500 कि.मी. मार करने वाली अग्नि-3 के बाद जल्द ही 5000 कि.मी. तक मार करने वाली ‘‘सूर्या’’ का परीक्षण करने वाला है, जिसकी जद में सभी प्रमुख चीनी शहर आ जायेंगे। 

चीन भी अपनी सेना व भारतीय सीमा से लगे चीनी क्षेत्र में राजमार्गों का नवीनीकरण कर रहा है। वह पाकिस्तान को मिसाइल व परमाणु बम बनाने की तकनीक देकर भारत से उलझना चाहता है। भारत भी शायद वियतनाम लाओस या फिलीपिन्स को मध्यम दूरी की मिसाइलों की तकनीक देकर चीन के खिलाफ खड़ा करना चाहे, पर फिलहाल वह चीन पर ही ध्यान केfन्द्रत किये हुए है और भारतीय रक्षा तैयारियां पहाड़ी युद्धों को ध्यान में रखकर की जा रही है। हाल के वर्षों में भारतीय सेना में माऊंटेन डिविजन लगातार बढ़ रही है। साथ ही दुर्गम क्षेत्रों में उतर कर युद्ध करने में सक्षम एयरबार्न यूनिट भी, जिनके लिए हाल ही में सी-13 हरकुलिस व 130 ग्लोबमास्टर जैसे मालवाही विमान खरीदे गये हैं। 

कारगिल युद्ध में बोफोर्स तोप
भारतीय वायु सेना भी तकनीकी रूप से चीनी वायु सेना से आगे है। चीनी वायु सेना में पुराने विमान ही बड़ी संख्या में है। उनका सुपर-7 विमान भी अमेरिका के एफ-16 की सस्ती नकल है। जो भारत के सुखोई 30-एमकेआई से तकनीकी रूप से बहुत पीछे है। भारतीय वायुसेना में जल्द ही सुखोई 50 तथा यूरोफाईटर शामिल हो जायेगे जो आकाश में भारत को निर्णायक बढ़त दिला देंगे। चीन आर्टलरी में भारत से आगे है पर पहाड़ी युद्धों में इनकी क्षमता सीमित होती है, परन्तु भारत की बोफोर्स व बह्योस जैसी लेजर आधारित शस्त्र प्रणालियां यहां भी कारगर होती हैं, क्योंकि पहाड़ों के पार ढलानों पर छिपे शत्रुओं पर सटीक निशाना लगा सकती हैं, जिसका चीन के पास कोई जवाब नहीं है।

चीन ने यदि 1962 की तरह इस बार फिर आक्रमण किया तो उसे युद्ध के पहले ही दौर में यह पता चल जायेगा कि इस बीच भारत कितना बदल गया है पर यह आर्थिक प्रतिस्पर्धा पूर्णकालिक युद्ध में बदलेगी भी, इसकी संभावना कम है क्योंकि दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं व एक दूसरे के क्षेत्र में भीतर तक घुसकर मार करने की क्षमता भी, जो विनाश को और भी व्यापक बना देगा। चूंकि दोनों देशों का उद्देश्य आर्थिक विकास है सो अंततः समान क्षमता वाले प्रतिद्वंदी से भिड़कर कोई भी विनाश को निमंत्रित नहीं करेगा पर चीन जैसा धूर्त देश भारत को कमजोर करने के लिए पाकिस्तान का उपयोग करना चाहेगा, जबकि अमेरिका उसे रोकने के लिए भारत को मजबूत करेगा। ये कूटनीतियां अभी लगातार चलती रहेंगी और सीधे संघर्ष से बचते हुए दोनों देश अपने-अपने आर्थिक हितों को साधते रहेंगे। पर 1965 की तरह यदि हमने अपनी सैनिक तैयारियों में ढील दी तो हमें अपने महत्वपूर्ण सामरिक व आर्थिक हितों से हाथ धोना पड़ सकता है। हमें चौथी सदी ई.पू. के चीनी विचारक सुनत्सु की पुस्तक ‘‘आर्ट ऑफ वार’’ के कथन को ध्यान में रखना चाहिए कि ‘‘अपने शत्रु के हर कदम पर नजर रखो और उसकी विशेषताओं को कभी नजरअंदाज मत करो।’’

विवेक राज सिंह
समाज कल्‍याण में स्‍नातकोत्‍तर शिक्षा प्राप्‍त विवेकराज सिंह जी स्‍वांत: सुखाय लिखते हैं।अकलतरा, छत्‍तीसगढ़ में इनका माईनिंग का व्‍यवसाय है. 
इस ब्‍लॉग में विवेक राज सिंह जी के पूर्व आलेख - 
अन्तरिक्ष में मानव के पचास साल 
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काश्मीर- जलते स्वर्ग की कथा
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