ब्लॉग छत्तीसगढ़

04 March, 2015

इस होली में सारे कलुष धो लेना चाहता हूँ

इस सोसल मीडिया और इसके अस्त्र हिन्दी ब्लॉगिंग नें पिछले वर्षों से कुछ ऐसा छद्म और आभासी व्यक्तित्व का निर्माण कर दिया कि, लगने लगा कि मैं भी रचनाकार हूँ और मेरा एक अलग अस्तित्व निर्माण अब हो चुका है। हालाँकि हकीकत यह है कि ये पूर्ण आभासी है और जमीनी तौर पर मेरा लेखन घूरे के स्तर से उठ नहीं पाया है, किन्तु भरम तो भरम है। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकारों को सीट रिजर्वेशन लिस्ट में अपना नाम ढूंढते और झुंझलाते देखने पर कुछ ऐसा लगा कि, कम से कम मुझे तो अपने औकात में रहना चाहिए।
वर्तमान में छत्तीसगढ़ में लोकभाषा में लिखने वाले लगभग एक हजार लोग हैं। जिसमे से एक से ज्यादा किताबों के रचयिता भी पांच सौ से कम नहीं हैं। निश्चित तौर पर ऐसे रचनाकार वरिष्ठता की श्रेणी में आते हैं। इन पांच सौ रचनाकारों के सामने मेरा अस्तित्व कुछ भी नहीं। ये पांच सौ रचनाकार ऊपरी तौर पर भले न स्वीकारें किन्तु ये स्वयं निरंतर मंच की तलाश कर रहे हैं। व्यवहारिक तौर पर महिमा मंडनीय नियत मंचीय कुर्सियों की संख्या कम है। कुर्सियों के लिए पहले से ही जद्दोजहद है। ऐसी स्थिति में बिना प्रचुर लेखन किए, सीटों पर अपना नाम लिखा देखने के लोभ को मुझे छोड़ना होगा। अब लग रहा है कि, अपनी दक्षता क्षेत्र को छोड़ कर अन्यान्य विधाओं में भोथरे ज्ञान के साथ सेंध लगाने की जुगत मूर्खता के सिवा कुछ भी नहीं। अभी तो खड़ा होना सीखा हूँ, बहुत दूर तक चलना है, विश्वास भी है।
इस नए मीडिया के आभासी दुनिया में पांडित्य प्रदर्शन करते हुए यदि मैंने आपके सम्मान को चोट पहुचाया होगा तो मैं आपसे क्षमा मांगता हूँ।
-संजीव तिवारी (🔫 तमंचा रायपुरी)

2 comments:

  1. जो तथाकथित लोग साहित्यकार होने का मुगालता पाल बैठे हैं वह आपके काम के सामने कुछ भी नहीं हैं। बस फ़र्क यह हैं कि उनको आपके काम की समझ नहीं है। जिस दिन समझ हो जाएगी उस दिन कुर्सी तो छोड़िए ये तख्ते ताऊस भी बिछाने को तैयार रहेगें। आप इनसे माफ़ी न मागें। अगर हो सके तो इन्हें माफ़ कर दें क्यों कि ये नादन हैं, इन्हे पुस्तकों के अलावा कुछ भी ज्ञात नहीं।

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  2. सञ्जीव भाई ! तुम्हारा चिन्तन चिन्तनीय है । यही विनम्रता मानव को अपने उद्देश्य तक पहुँचाती है । काश मैं भी तुम्हारी तरह सोच पाती !

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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04 March, 2015

इस होली में सारे कलुष धो लेना चाहता हूँ

इस सोसल मीडिया और इसके अस्त्र हिन्दी ब्लॉगिंग नें पिछले वर्षों से कुछ ऐसा छद्म और आभासी व्यक्तित्व का निर्माण कर दिया कि, लगने लगा कि मैं भी रचनाकार हूँ और मेरा एक अलग अस्तित्व निर्माण अब हो चुका है। हालाँकि हकीकत यह है कि ये पूर्ण आभासी है और जमीनी तौर पर मेरा लेखन घूरे के स्तर से उठ नहीं पाया है, किन्तु भरम तो भरम है। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकारों को सीट रिजर्वेशन लिस्ट में अपना नाम ढूंढते और झुंझलाते देखने पर कुछ ऐसा लगा कि, कम से कम मुझे तो अपने औकात में रहना चाहिए।
वर्तमान में छत्तीसगढ़ में लोकभाषा में लिखने वाले लगभग एक हजार लोग हैं। जिसमे से एक से ज्यादा किताबों के रचयिता भी पांच सौ से कम नहीं हैं। निश्चित तौर पर ऐसे रचनाकार वरिष्ठता की श्रेणी में आते हैं। इन पांच सौ रचनाकारों के सामने मेरा अस्तित्व कुछ भी नहीं। ये पांच सौ रचनाकार ऊपरी तौर पर भले न स्वीकारें किन्तु ये स्वयं निरंतर मंच की तलाश कर रहे हैं। व्यवहारिक तौर पर महिमा मंडनीय नियत मंचीय कुर्सियों की संख्या कम है। कुर्सियों के लिए पहले से ही जद्दोजहद है। ऐसी स्थिति में बिना प्रचुर लेखन किए, सीटों पर अपना नाम लिखा देखने के लोभ को मुझे छोड़ना होगा। अब लग रहा है कि, अपनी दक्षता क्षेत्र को छोड़ कर अन्यान्य विधाओं में भोथरे ज्ञान के साथ सेंध लगाने की जुगत मूर्खता के सिवा कुछ भी नहीं। अभी तो खड़ा होना सीखा हूँ, बहुत दूर तक चलना है, विश्वास भी है।
इस नए मीडिया के आभासी दुनिया में पांडित्य प्रदर्शन करते हुए यदि मैंने आपके सम्मान को चोट पहुचाया होगा तो मैं आपसे क्षमा मांगता हूँ।
-संजीव तिवारी (🔫 तमंचा रायपुरी)
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