ब्लॉग छत्तीसगढ़

07 July, 2015

राज योग की फिरकी

चित्र दैनिक ट्रिब्यून से साभार
हाल ही में राज्य सरकार नें निगम मण्डलों में अध्यक्षों की नियुक्ति की है एवं सरकार के प्रति निष्ठा रखने वालों को उपकृत किया है। राज्य सरकार में मंत्री मण्डल के बाद निगम, मण्डल और आयोग के प्रमुख के पद का अहम स्थान होता है, इनमें से कुछ को तो राज्य मंत्री का दर्जा भी प्राप्त होता है। इनके प्रमुख, अपने आपको अध्यक्ष कहाने से ज्यादा 'राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त' कहाना और लिखाना जादा पसंद करते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि उनकी अहमियत राज्य में कितनी है। राज्य में कुछेक निगम, मण्डल और आयोग को छोड़कर बाकी के प्रमुख, राजनीति से जुड़े व्यक्ति ही बनते हैं। जो कुछेक हैं उनमें छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष का पद भी है जिसमें गैर राजनैतिक व्यक्ति को अध्यक्ष बनाया जाता है। हालांकि अघोषित तौर पर अध्यक्ष के चयन में प्रत्याशी के राजनैतिक सोच एवं निष्ठा की परख की जाती है। आप सबको ज्ञात ही है कि, इस आयोग का गठन, प्रदेश में छत्तीसगढ़ी भाषा को राजकाज की भाषा बनाने के मुख्य उद्देश्य के लिए किया गया है। आयोग के गठन के पिछले दो कार्यकाल की परम्परा को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि, इसमें साहित्यकार को अध्यक्ष बनाया जाता है। साहित्यकार में राजनीतिज्ञ के गुण हो तो उसे अतिरिक्त योग्यता मानी जाती है। छत्तीसगढ़ी राजकाज की भाषा बने ना बने, उसे छत्तीसगढ़ी साहित्यकारों को 'बेंझालना' आना चाहिए यह विशेष योग्यता तय है।

पिछले कई महीनों से साहित्यिक गलियारों में कानाफूसी चल रही है, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के तथाकथित भावी अध्यक्षों और सदस्यों की धड़कने तेज है। अपनी दावेदारी पुख्त़ा कराने के लिए वे हर संभव प्रयास एवं जुगाड़ कर रहे है। वीतरागी बने रहना चाह रहे हैं, 'हंफर' रहे हैं किन्तु धड़कनों को छुपा रहे हैं। बहुत कठिन समय है, दिन फोनियाने में गुजर रहा है एवं रातो को नींद नहीं, स्वप्न आ रहे हैं। जुगाड़तोड़ करवाने वाले लोग राजनैतिक सोच की फर्जी डिग्री एवं निष्ठा के भभूत से बंधा बायोडाटा 'घेरी बेरी' मुख्यमंत्री कार्यालय भिजवा रहे हैं। इधर डाक्टर साहब हैं कि नाम की घोषणा कर ही नहीं रहे हैं।

भावी होने का आनंद व्यक्त होने के लिए उतावला होता है किन्तु प्रत्यक्ष तौर पर सभी भावी यही कहते नजर आ रहे हैं कि वे इस दौड़ में शामिल नहीं हैं। सुनने में यह भी आया है कि कुछ भावी यह बोलते नहीं अघा रहे हैं कि उन्हें 'जोजियाया' जा रहा है। मुख्यमंत्री या विभागीय मंत्री को अध्यक्ष या सदस्य बनने के लिए किसी को 'जोजियाना' पड़ रहा है, यह बात पच नहीं रही है। अब जो भी हो, 'जोजवा' टाईप साहित्यकार लोग बिलीभ कर रहे हैं एवं बेनर पोस्टर की तैयारी में जुट गए हैं। हम तो ठहरे 'आईटम' टाईप साहित्यकार हमें क्या, आदेश जारी होने पर ही 'पतियायेंगें'।
—तमंचा रायपुरी

2 comments:

  1. जोरदरहा गोली छोड़े हव जी। बने लगिस।

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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