ब्लॉग छत्तीसगढ़

26 March, 2017

'पहुना संवाद' महानदी और बम्‍हपुत्र का मिलन

असम के छत्‍तीसगढ़ वंशियों नें आज 'पहुना संवाद' के दूसरे दिन सभा में अपना संस्‍मरण सुनाया और उद्गार व्‍यक्‍त किया। उन्‍होंनें कहा कि हम आपके अत्‍यंत आभारी हैं कि आपने अपने संस्कृति विभाग के माध्‍यम से हमसे संपर्क स्थापित करने का महत्वपूर्ण कदम उठाया। संस्कृति संचालनालय के बुलावे पर असम से यहां आने से हम सभी अभिभूत हुए हैं, क्योंकि हमारे पूर्वज सैकड़ो बरस पहले इस धरती से कमाने खाने चले गए थे। इसके इतने दिनों बाद हमको याद किया गया है। हमारे पूर्वजों ने उन दिनों में जो संघर्ष किया है उसकी कहानी दुखद है। उन्‍होंनें कठिन परिश्रम किये, दुख भोगा, दाने-दाने को मोहताज हुए। छत्‍तीसगढ़ वापस आने की तमन्‍ना रहते हुए भी वे अंग्रेजों या चाय बागानों के मालिकों के द्वारा बंधक बना लिए जाने या फिर पैसे नहीं होने के कारण वापस अपनी धरती आ नहीं पाये। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपना जीवन जीया और हम सबको इस काबिल बनाया कि हम असम में अपने पैरों पर खड़े हो सकें। हम उनकी चौथी, पांचवी पीढ़ी हैं हमारे दिलों में आज भी छत्‍तीसगढ़ जीवित है।
इस माटी की सोंधी खुशबू जो हमारे पूर्वजों के हृदय में समयई हुई थी उसे उन्‍होंनें पीढि़यों के अंतराल के बाद भी हमारे दिलों में बसाये रखा। इस बीच पूरे देश की संस्कृति में बहुत बदलाव आए या विकृतियां आई किन्‍तु हमारे पूर्वजों की उस संस्‍कृति और परम्‍पराओं को हमने बनाए रखा। आज भी सैकड़ो साल बाद भी हम छत्‍तीसगढ़ के रीति-रिवाज और परम्‍पराओं को असम में जीवंत बनाये हुए हैं। आज बम्‍हपुत्र के किनारे रहते हुए भी हमारे हृदय में छत्‍तीसगढ़ की महानदी उफान मारती है। हमारा रोम-रोम छत्‍तीसगढ़ को याद करके रोमांचित हो उठता है। हमारे बीच बहुत से ऐसे लोग भी विद्यमान हैं जो यह कहते हैं कि हमें कभी एक बार उस धरती को छूने का अवसर मिले और हमे वहां की एक मुट्ठी मिट्टी लाने का सौभाग्य मिले तो हमे शायद अपने जीवन का सबसे बङा सुख महसूस करेंगे। उद्बोधन देते हुए कई छत्‍तीसगढ़ वंशियों का गला भर आया और खुशी में उनके आंखों से आंसू बहने लगे। संवाद का यह अवसर बेहद भावनात्‍मक एवं आत्‍मीय संबंधों का एक इतिहास बनकर आज हमारे सामने आया।
इन्‍होंनें छत्‍तीसगढ़ के मुख्‍यमंत्री डॉ.रमन सिंह से अनुरोध किया है कि 150-200 साल बीत जाने के बावजूद हमने अपनी छत्‍तीसगढि़या संस्‍कृति को संजोए रखा है यह अपने आप में महत्वपूर्ण बात है किंतु संमय के साथ इसके मूल स्वरूप को खोने का भय भी हमारे मन में व्‍याप्‍त है। हम चाहते हैं यदि आप इस दिशा में प्रयास करें और हमारे लिए आपकी सरकार कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जिससे हम अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को सहेज कर रख सकें। उन्‍होंनें छत्‍तीसगढ़ के मुख्‍यमंत्री डॉ.रमन सिंह को अपनों के बीच असम आने का न्‍यौता भी दिया। उन्‍होंनें कहा कि आप कृपया एक बार समय निकाल कर हमारे बीच असम आएं और हमारी जीवनशैली को देखें कि हम अभी भी किस तरह से अपनी भाषा और संस्कृति से जुडे हुए हैं। आपसे निवेदन है कि आप इसे बचाए रखने के लिए अपना सहयोग दें क्योंकि हम भी छत्तीसगढि़या ही हैं भले ही हम छत्तीसगढ़ से ढाई हजार किलोमीटर दूर रहते हों।
आज के संवाद में छत्‍तीसगढ़ से जी.आर.सोनी, जागेश्‍वर प्रसाद, आशीष ठाकुर, राम पटवा, छलिया राम साहनी और लक्ष्‍मण मस्‍तुरिया नें संबोधित किया। आज के कार्यक्रम में वरिष्‍ठ संगीतकार खुमान लाल साव, ब्‍लॉगर ललित शर्मा, संजीव तिवारी आदि उपस्थित थे। असम से आए छत्‍तीसगढ़ वंशियों नें छत्‍तीसगढ़ी में सुवा गीत, ददरिया, जस और पंथी गाया। असम के विभिन्‍न क्षेत्रों से आए प्रतिनिधिमंडल में चिंताराम साहू, गिरिजा सिंह, सुमाष चन्द्र कोंवर, जगेश्‍वर साहू, दीपचन्द्र सतनामी, धरमराज गोंड, दीपिका साहू, सुजित साहू, भुवन केंवट, गनपत साहू, मदन सतनामी, गुलाब किसान, जनक साहू, पिताम्‍बर लोधी, त्रिलोक कपूर सिंह, कमल तेली, दाताराम साहू, धीरपाल सतनामी, ललित कुमार साहू, दुर्गा साहू, शंकर चन्द्र साहू, पुर्णिमा साहू, तुलसी साहू, रमेश लोधी, अनिल पनिका, अजय पनिका, नितिश कुमार गोंड आदि हैं। 
असम से आए इन छत्‍तीसगढ़ वंशियों की भाषा और इनके द्वारा गाए जाने वाले गीतों पर मैं कल से ध्‍यान लगाए था। उनकी भाषा आज की हमारी भाषा से ज्‍यादा ठेठ है। असम एवं बंगाल का प्रभाव इनके उच्‍चारण में यद्धपि है फिर भी ये धारा प्रवाह रूप से छत्‍तीसगढ़ी बोलते हैं। मुझे लगता है कि बहुत सारे छत्‍तीसगढ़ी शब्‍दों को भी ये संजोए रखे हैं जिसे हम नंदा गया कह रहे हों। इनकी छत्‍तीसगढ़ी भाषा पर हमारे चिंतित साहित्‍यकारों का ध्‍यान जाना चाहिए।
इनके द्वारा गाए कुछ गीत मैनें रिकार्ड किए हैं जिसे आप लोगों के लिए हम यहां प्रस्‍तुत कर रहे हैं, गीतों में इनकी पीड़ा भी सुनिए-    
सुवा गीत ददरिया (लेजा लानि देबे नोनी छेना म आगी, ले जा लानि देबे)

6 comments:

  1. छत्तीसगढ़ के संस्कृति ल कैसे सुंदर संजो के धरे हावैं,कइसन सुग्हर गावत,बजावत अउ थिरकत हावैं । धन्य है छत्तीसगढ़ की संस्कृति ।

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  2. संस्कृति विभाग सिरतोन म सहंराये के ​लइक काम करिन, बधाई। बढ़ सुघर जानकारी भइया। असम म छत्तीसगढ़िया मनके अब तो राजनीति म तको दखल होवत हावय अइसन म उंकर आर्थिक अउ सामाजिक जीवन म कतका बदलाव होय हाबे इहू बात ल जाने के इच्छा हवय। खुशी के बात आए के असम म 200 साल ले रहे के बाद भी छत्तीसगढ़ के संस्कृति ल जिंदा राखे हावय...

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  3. सुवा - गीत म बिकट मिठास हे, शब्द - चयन घला बढ़िया हे, "मंझनिया" अउ "सतनाम" जैसे शब्द के प्रयोग होए हे । मोला तो वोकर बाजा हर पखावज बरोबर लागिस हे अउ गीत संग लय - ताल हर टूटिस भी हे,एहर अभ्यास के कमी के कारण ए, फेर कुल मिला के ए सुवागीत हर सँहराय के लाइक हे ।

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  4. सुवा - गीत म बिकट मिठास हे, शब्द - चयन घला बढ़िया हे, "मंझनिया" अउ "सतनाम" जैसे शब्द के प्रयोग होए हे । मोला तो वोकर बाजा हर पखावज बरोबर लागिस हे अउ गीत संग लय - ताल हर टूटिस भी हे,एहर अभ्यास के कमी के कारण ए, फेर कुल मिला के ए सुवागीत हर सँहराय के लाइक हे ।

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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